किच्छा हत्याकांड: किरायेदार सुरक्षा पर सवाल, प्रशासनिक जिम्मेदारी कहां है? अवतार सिंह बिष्ट, संपादक, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स / उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी

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रुद्रपुर और किच्छा क्षेत्र से इस समय जो खबर सामने आई है, उसने पूरे उधमसिंह नगर जनपद को झकझोर दिया है। महेन्द्रा एंड महेन्द्रा कंपनी में कार्यरत 23 वर्षीय सृष्टि शर्मा, जो मूलतः उड़ीसा की रहने वाली थी, उसकी बेरहमी से हत्या कर शव को जंगल में फेंक दिया गया। यह सिर्फ एक हत्या नहीं है—यह उस विश्वास की हत्या है, जो एक युवा महिला ने अपने भविष्य, अपने श्रम और अपने किरायेदार जीवन में रखा था।

सृष्टि शर्मा अपने काम और आत्मनिर्भरता से अपनी पहचान बना रही थी। परंतु जिस मकान में वह किराए पर रह रही थी, वहीं उसकी जिंदगी छीन ली गई। यह तथ्य कि सीसीटीवी फुटेज में मकान मालिक के पुत्रों का संदिग्ध रूप से दिखना और रात में ढके हुए सामान के साथ घर से निकलना दिखाई दिया, सवाल उठाता है—क्या हमारी व्यवस्था ने किरायेदार सुरक्षा को कभी गंभीरता से लिया है?

उत्तराखंड जैसे शांत और औद्योगिक रूप से उभरते राज्य में यह घटना इस बात की चेतावनी है कि अपराध अब गांवों और छोटे शहरों में भी गहराई तक पैठ बना चुका है। सृष्टि जैसी युवतियां जो दूर राज्यों से यहां रोजगार की तलाश में आती हैं, वे हमारे औद्योगिक ढांचे की रीढ़ हैं। लेकिन उनके लिए सुरक्षा, पहचान और सामाजिक संरक्षण के क्या उपाय हैं?

यह मामला सिर्फ पुलिस जांच का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रश्न भी है। मकान मालिक और उसके पुत्रों पर संदेह गहरा है, और यह जरूरी है कि पुलिस इस केस को त्वरित और पारदर्शी ढंग से निपटाए। किसी भी निर्दोष को बचने और किसी भी दोषी को छूटने न दिया जाए—यह जनता की पहली अपेक्षा है।

लेकिन इसके साथ ही यह भी विचारणीय है कि प्रशासन ने औद्योगिक क्षेत्रों में आने वाले बाहरी मजदूरों, विशेषकर महिलाओं की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए हैं? क्या प्रत्येक किरायेदार का स्थानीय पुलिस थाने में पंजीकरण अनिवार्य किया गया है? क्या नियोक्ता कंपनियों की जिम्मेदारी तय की गई है कि वे अपने कर्मचारियों के रहने की स्थिति पर निगरानी रखें?

सृष्टि शर्मा की हत्या हमारे समाज के लिए एक दर्पण है, जिसमें झांकने पर हमारी संवेदनहीनता साफ दिखाई देती है। एक बेटी, एक कर्मचारी, और एक किरायेदार—तीनों ही रूपों में उसने व्यवस्था की उपेक्षा झेली।

आज यह आवश्यक है कि—

  1. सख्त किरायेदार सत्यापन कानून लागू किए जाएं।
  2. महिला कर्मियों के लिए औद्योगिक आवासीय सुरक्षा नीति बने।
  3. फास्ट ट्रैक कोर्ट में ऐसे अपराधों की सुनवाई हो।
  4. और सबसे महत्वपूर्ण, समाज में यह चेतना आए कि किरायेदार “अजनबी” नहीं बल्कि “अतिथि” हैं—जिन्हें सुरक्षा और सम्मान दोनों मिलना चाहिए।

सृष्टि शर्मा का नाम अब एक आंकड़ा न बने—यह राज्य और समाज की परीक्षा का क्षण है। उत्तराखंड पुलिस को यह साबित करना होगा कि “देवभूमि” न केवल पूजा-पाठ की भूमि है, बल्कि न्याय की भी भूमि है।



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