संपादकीय“महापौर बनाम विधायक : श्रेय की राजनीति में रुद्रपुर की सियासत का बमंडर (महाभारत)

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रुद्रपुर की राजनीति आज केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि आकाशीय ग्रह-नक्षत्रों के संतुलन से भी प्रभावित होती दिखाई दे रही है। वर्तमान समय में महापौर विकास शर्मा के सितारे प्रबल हैं। ग्रहों की अनुकूल स्थिति और मुख्यमंत्री का आशीर्वाद उन्हें निरंतर सक्रिय बनाए हुए है। यही कारण है कि उनके कार्यक्रमों में भीड़ और उनकी लोकप्रियता में इजाफा दिखाई देता है। दूसरी ओर, विधायक शिव अरोड़ा की कुंडली में आने वाले वर्षों में शुभ ग्रहों का प्रभाव बढ़ने वाला है। ज्योतिषीय दृष्टि से 2027 तक उनका समय अत्यंत उज्ज्वल हो सकता है, जिससे चुनावी मैदान में वे और मजबूत होकर उभर सकते हैं। आज जो संघर्ष दोनों नेताओं के बीच दिखाई दे रहा है, वह केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं बल्कि ग्रह-नक्षत्रों की स्वाभाविक चाल का परिणाम है। आने वाले समय में स्थिति बदल सकती है और सत्ता का पलड़ा किस ओर झुकेगा, यह जनता के साथ-साथ नियति और नक्षत्र भी तय करेंगे।

रुद्रपुर, उत्तराखंड का सबसे चर्चित औद्योगिक और राजनीतिक केंद्र, इन दिनों एक अजीबोगरीब सियासी संघर्ष का गवाह बना हुआ है। यहाँ सत्ता और संगठन, दोनों ही स्तर पर भाजपा के दो बड़े चेहरे—महापौर विकास शर्मा और विधायक शिव अरोड़ा—एक-दूसरे के खिलाफ ‘श्रेय’ की राजनीति में आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।
हालात ऐसे बन चुके हैं कि शहर का हर चौराहा और नुक्कड़ अब केवल विकास कार्यों की चर्चा का नहीं बल्कि इस सवाल का मंच बन चुका है—“रुद्रपुर में बड़ा कौन—महापौर या विधायक?”

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सत्ता संघर्ष की जड़ें?यह संघर्ष किसी एक फैसले या घटना का नतीजा नहीं है। इसकी जड़ें तब पनपीं, जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सत्ता में आए और उनके करीबी माने जाने वाले विकास शर्मा ने संगठन और नगर राजनीति में तेज़ी से जगह बनाई।
विधायक शिव अरोड़ा लंबे समय से भाजपा की जमीनी राजनीति में सक्रिय रहे हैं और खुद को “रुद्रपुर का असली जनप्रतिनिधि” मानते हैं।
दूसरी ओर, महापौर विकास शर्मा ने निकाय चुनाव में बड़ी जीत दर्ज कर अपनी पकड़ मजबूत की और जनता के बीच लगातार मौजूदगी बनाए रखी।
यहीं से दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा की बुनियाद रखी गई, जो आज खुले संघर्ष का रूप ले चुकी है।
श्रेय लेने की राजनीति : त्रिशूल से लेकर हाईवे तक?रुद्रपुर की राजनीति में हाल ही के उदाहरण इस नूरा-कुश्ती को सबसे साफ़ दिखाते हैं।
त्रिशूल और डमरू विवाद: इंदिरा चौक और डीडी चौक पर धार्मिक प्रतीकों की स्थापना की घोषणा दोनों नेताओं ने अलग-अलग मौकों पर की। महापौर का दावा था कि यह उनकी चुनावी घोषणा थी, जबकि विधायक ने मुख्यमंत्री से मिलकर इसका श्रेय लेने की कोशिश की।
हाईवे चौड़ीकरण और गांधी पार्क सौंदर्यीकरण: जब गृहमंत्री अमित शाह ने इनका शिलान्यास किया तो पत्थरों पर विधायक का नाम उभरा, जिससे महापौर के समर्थकों में नाराज़गी बढ़ी। इसके बाद महापौर ने भी अलग से शुभारंभ कर दिया और काम चालू करा दिया।
पोस्टर पॉलिटिक्स: नगर निगम में महिला स्वयं सहायता समूहों के पोस्टरों पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और महापौर की तस्वीरें तो छपीं, मगर विधायक का नाम नदारद रहा। यह भी इस खींचतान का ताज़ा उदाहरण है।
हर परियोजना में जनता से ज्यादा इस बात पर ध्यान दिया जा रहा है कि फीता कौन काटेगा और नारियल किसके हाथ से फूटेगा।
संगठन में असमंजस : दो पाटन के बीच पिसते कार्यकर्ता
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका अनुशासन और संगठनात्मक एकजुटता मानी जाती है। मगर रुद्रपुर में स्थिति उलट है।
एक तरफ विधायक समर्थक हैं, जो खुद को “अनुभवी और वरिष्ठ” खेमे का हिस्सा मानते हैं।
दूसरी ओर महापौर समर्थक हैं, जो खुद को “युवा नेतृत्व और मुख्यमंत्री की पसंद” बताकर आगे बढ़ते हैं।
बीच में फंसे जिला अध्यक्ष कमल जिंदल जैसे नेता, जो कभी विधायक के करीबी माने जाते थे, अब डगमगाते दिख रहे हैं। कार्यकर्ताओं में यह असमंजस साफ है कि किसके कार्यक्रम में शामिल हों और किसके साथ दूरी बनाएँ।
सच तो यह है कि “दो पाटन के बीच” भाजपा कार्यकर्ता चूरनुमा हो रहे हैं।
जनता का नजरिया : कौन भारी, कौन हल्का?
रुद्रपुर की जनता इस सियासी खींचतान को बड़ी दिलचस्पी से देख रही है।
मोहल्लों और चौराहों पर चर्चा है कि महापौर हर जगह मौजूद रहते हैं, सीधे जनता से संवाद करते हैं, जबकि विधायक जनता से दूर होते जा रहे हैं।
लोग यह भी कहते हैं कि विकास कार्यों से ज्यादा समय अब ‘कौन श्रेय लेगा’ वाली राजनीति में खर्च हो रहा है।
आमजन के बीच यह धारणा गहराती जा रही है कि महापौर “ज़मीन से जुड़े और सक्रिय” हैं, जबकि विधायक “संगठन और सत्ता पर पकड़ रखने वाले मगर जनता से कटे हुए”।
गुडबाजी का चरम : 2027 के चुनाव पर असर
भाजपा के भीतर यह संघर्ष केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भविष्य के चुनावी समीकरणों पर भी गहरे असर के संकेत हैं।

यदि यह गुडबाजी इसी तरह जारी रही तो 2027 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
विपक्ष इस आपसी फूट को “भाजपा के भीतर सत्ता की भूख” के रूप में पेश कर सकता है।
कार्यकर्ता अगर दो हिस्सों में बंट गए तो चुनाव में बूथ स्तर तक संगठन की एकजुटता प्रभावित होगी।
इतिहास गवाह है कि भाजपा तब सबसे ज्यादा नुकसान झेलती है, जब उसके अपने ही अंदरूनी झगड़े जनता के सामने उजागर होते हैं।
जनता के लिए सवाल, पार्टी के लिए चेतावनी
आज रुद्रपुर की राजनीति एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां महापौर और विधायक के बीच की नूरा-कुश्ती ने भाजपा की साख और कार्यकर्ताओं की निष्ठा दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या जनता को विकास मिलेगा या केवल राजनीतिक पोस्टरों और नारियल-फोड़ प्रतियोगिता का तमाशा?
क्या भाजपा नेतृत्व इस गुडबाजी को समय रहते सुलझा पाएगा?और सबसे बड़ा सवाल—क्या 2027 में जनता भाजपा को ‘एकजुट पार्टी’ के रूप में देखेगी या ‘आपस में लड़ते नेताओं’ के रूप में?
फिलहाल तो यही लगता है कि रुद्रपुर की राजनीति में असली विकास सड़क पर नहीं, बल्कि श्रेय की कुर्सी पर कुश्ती लड़ रहे नेताओं के अहंकार में अटका हुआ है।



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