

देवभूमि उत्तराखंड की तराई, विशेषकर रुद्रपुर और उधम सिंह नगर की धरती इन दिनों आस्था, तपस्या और सूर्य आराधना के दिव्य प्रकाश से आलोकित है। छठ पूजा—सूर्य देव और छठी मइया को समर्पित यह पर्व—अब केवल एक पारंपरिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और आध्यात्मिक अनुशासन का सशक्त प्रतीक बन चुका है।

रुद्रपुर के घाटों पर आज की सुबह और शाम दोनों ही अद्भुत दृश्य प्रस्तुत करती हैं। महिलाएँ सिर पर बाँस की टोकरी लिए, उसमें ठेकुआ, फल और दीप लिए, डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करती हैं। यह क्षण केवल आराधना का नहीं, बल्कि जीवन के प्रकाश और अंधकार दोनों को स्वीकार करने की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। छठ व्रत की कठिन साधना — चार दिनों का संयम, उपवास और शुद्ध आचरण — मनुष्य को भीतर से पवित्र करने की साधना है।
उत्तराखंड की यह धरती, जो देवभूमि कहलाती है, अब छठ पूजा की भक्ति से भी सराबोर है। रुद्रपुर, किच्छा, गदरपुर, सितारगंज, खटीमा और दिनेशपुर के घाटों पर दीपों की पंक्तियाँ मानो यह संदेश दे रही हैं कि आस्था का प्रकाश कभी सीमाओं में नहीं बंधता। यह पर्व यह भी सिखाता है कि जब मनुष्य प्रकृति के प्रति विनम्र होता है, तभी वह अपने भीतर के सूर्य को पहचान पाता है।
छठ पूजा में सूर्य केवल देवता नहीं, बल्कि जीवनशक्ति का प्रतीक हैं। जल में खड़े होकर सूर्य की ओर folded hands के साथ अर्घ्य देना, व्यक्ति के भीतर की नकारात्मकता को त्यागने का प्रतीकात्मक रूप है। यह पर्व सिखाता है कि सूर्य का प्रकाश सबके लिए समान है, और उसी समानता के भाव में ही धर्म का सार छिपा है।
आज रुद्रपुर के घाटों पर जो दीप जल रहे हैं, वे न केवल श्रद्धा के प्रतीक हैं, बल्कि वे उस एकता और पवित्रता की लौ हैं जो इस शहर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देती है। छठ पूजा के इस पावन अवसर पर देवभूमि उत्तराखंड यह संदेश दे रही है—
जहाँ सूर्य की किरणें हैं, वहीं जीवन की दिशा है; जहाँ आस्था है, वहीं आत्मा का प्रकाश है।”
जय सूर्यदेव! जय छठी मइया!




