

उत्तराखंड राज्य की स्थापना का उद्देश्य केवल प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं, बल्कि पहाड़ की आत्मा और अस्मिता को स्वर देना था। उस आंदोलन में जिन राज्य आंदोलनकारियों ने अपने रक्त, तप और त्याग से इस धरती को गौरव दिया — वही आज उपेक्षा का अनुभव कर रहे हैं।

कभी रुद्रपुर की पुलिस लाइन में राज्य स्थापना दिवस का आयोजन एक जन-उत्सव के रूप में मनाया जाता था। वहां हजारों लोग, जनप्रतिनिधि, आंदोलनकारी, छात्र, शिक्षक, सैनिक परिवार, और आम नागरिक एकजुट होकर “गौरवशाली अतीत, सशक्त वर्तमान और सुनहरे भविष्य” का संकल्प दोहराते थे। प्रशासनिक विभागों के स्टॉल— शिक्षा, स्वास्थ्य, फायर ब्रिगेड, आंचल दूध, और सामाजिक कल्याण से जुड़े जागरूकता अभियान— उस आयोजन को एक जीवंत प्रदर्शनी बना देते थे। शानदार परेड और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बीच राज्य की उपलब्धियों का उत्सव मनाया जाता था।
परंतु इस वर्ष, जब उत्तराखंड अपनी रजत जयंती मना रहा है — 25 वर्षों का यह पड़ाव एक लोक उत्सव नहीं, बल्कि औपचारिक कार्यक्रम बनकर रह गया। जिला प्रशासन द्वारा कलेक्ट सभागार के बरामदे में सीमित जनसंख्या के बीच “राज्य स्थापना दिवस” मनाना, उस आंदोलन की आत्मा के साथ अन्याय जैसा प्रतीत होता है। जिन राज्य आंदोलनकारियों ने इस पर्व को जनभावनाओं से जोड़ा, वे अब निराश हैं।
उनका एक स्वर में कहना है कि आने वाले वर्षों में यह आयोजन पुनः पुलिस लाइन में, जन-सहभागिता के साथ किया जाए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से भी इस मांग को लेकर आंदोलनकारी प्रतिनिधिमंडल मुलाकात करेगा।
दरअसल, राज्य की रजत जयंती केवल स्मरण दिवस नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है। यह वह समय है जब हमें यह देखना चाहिए कि क्या हम अपने उन आदर्शों पर टिके हैं जिनके लिए यह राज्य बना था — समान विकास, पारदर्शी शासन और जन-सहभागिता।
यदि रजत जयंती का उत्सव जनता से कटकर, सीमित दीवारों में सिमट जाएगा, तो यह केवल प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह जाएगा — न कि जनता का पर्व। राज्य के गौरवशाली इतिहास का सम्मान तभी होगा जब उसका उत्सव जनता के बीच, जनता के साथ मनाया जाए।
उत्तराखंड का गौरव तभी अक्षुण्ण रहेगा, जब स्थापना दिवस केवल भाषण नहीं, बल्कि जनता की भागीदारी का प्रतीक बने।
क्रमशः




