


रुद्रपुर। शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान (डायट) रुद्रपुर इन दिनों उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, मातृभाषा और साहित्यिक चेतना का केंद्र बना हुआ है। कुमाऊँनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति, कसारदेवी (अल्मोड़ा) तथा पहरू कुमाऊँनी मासिक पत्रिका के तत्वावधान में और उत्तराखंड भाषा संस्थान एवं संस्कृति विभाग के सहयोग से आयोजित 17वां राष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन के दूसरे दिन बौद्धिकता, भावनाओं और लोकगौरव का अद्भुत संगम देखने को मिला।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
इस दिन का विषय था — “कुमाऊँनी भाषा का मानकीकरण”, जिसके इर्द-गिर्द वक्ताओं ने गहराई से चर्चा की। भाषा के स्वरूप, उच्चारण, लिपि, शब्दावली और अभिव्यक्ति के विविध आयामों पर मंथन हुआ। पूरे परिसर में कुमाऊँनी बोली की मिठास और लोककला की सादगी का सम्मोहक वातावरण व्याप्त रहा।
पहले सत्र में बौद्धिक संवाद और भाषाई चेतना की गूंज?प्रथम सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर उमा भट्ट ने की, जबकि संचालन डॉ. हयात सिंह रावत ने अत्यंत गरिमापूर्ण ढंग से किया। सत्र के मुख्य अतिथि प्रोफेसर देव सिंह पोखरिया ने अपने उद्बोधन में कहा — “भाषा किसी क्षेत्र की आत्मा होती है। जब तक कुमाऊँनी भाषा को शिक्षण, प्रशासन और तकनीकी माध्यमों में स्थान नहीं मिलेगा, तब तक उसका वास्तविक विकास संभव नहीं।” उन्होंने कहा कि कुमाऊँनी को राजकीय शिक्षा नीति में संस्थागत रूप से शामिल करना आज की ऐतिहासिक आवश्यकता है।
मुख्य वक्ता डॉ. पीतांबर अवस्थी ने कहा कि कुमाऊँनी शब्दों की संरचना में अत्यंत प्राचीनता है, जो संस्कृत और प्राकृत दोनों की जीवंत विरासत को समेटे हुए है। उन्होंने भाषा के ध्वनि-विज्ञान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “कुमाऊँनी का उच्चारण यदि लिप्यंतरण के साथ मानकीकृत नहीं किया गया, तो समय के साथ ध्वन्यात्मक पहचान खो सकती है।”
प्रोफेसर प्रीति आर्या और प्रोफेसर गीता खोलिया ने भाषा और समाज के अंतर्संबंधों पर विचार रखते हुए कहा कि मातृभाषा व्यक्ति के आत्मसम्मान से जुड़ी होती है। उन्होंने कहा कि “भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि विचार, मूल्य और स्मृति की श्रृंखला है।”
वहीं, डॉ. तारा चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि “आज आवश्यकता है कि हम अपनी बोलियों के बीच विभाजन नहीं, बल्कि सामंजस्य तलाशें। कुमाऊँनी के मानकीकरण के लिए यह जरूरी है कि उसकी सभी उपभाषाओं को एक सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया जाए।”
दूसरा सत्र: नए विचारों, नई आवाजों का मंच?दूसरे सत्र की अध्यक्षता प्रोफेसर जगत सिंह बिष्ट ने की। इस सत्र के मुख्य वक्ता प्रोफेसर दीपा गोबाड़ी, नीलम नेगी, प्रोफेसर के.सी. जोशी, डॉ. नेहा पालनी और डॉ. शशि पांडेय रहीं।
प्रोफेसर दीपा गोबाड़ी ने कहा कि “भाषा को बचाने की लड़ाई केवल शब्दों की नहीं, बल्कि भावनाओं और अस्मिता की है।” उन्होंने बच्चों को मातृभाषा सिखाने की पारिवारिक जिम्मेदारी पर बल दिया।
नीलम नेगी ने कहा कि कुमाऊँनी की ध्वन्यात्मक संरचना इतनी समृद्ध है कि उसे देवनागरी में अभिव्यक्त करने के लिए विशेष चिन्ह और ध्वनि चिह्न विकसित करने होंगे।
प्रोफेसर के.सी. जोशी ने कहा कि कुमाऊँनी भाषा में वैज्ञानिक शब्दावली विकसित करने की आवश्यकता है, ताकि इसे आधुनिक विषयों — विज्ञान, समाजशास्त्र, तकनीक — के साथ जोड़ा जा सके।
डॉ. नेहा पालनी और डॉ. शशि पांडेय ने अपने विचारों में कहा कि भाषा का मानकीकरण तभी सार्थक होगा जब समाज उसे अपनाने को तैयार हो। उन्होंने कहा कि “कुमाऊँनी को सम्मान देना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर परिवार की भूमिका है।”
सम्मान समारोह: समर्पण को सलाम?कार्यक्रम में कुमाऊँनी साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया।
- रमेश चंद्र सोनी को बहादुर सिंह बनोला कुमाऊँनी साहित्य सेवी सम्मान प्रदान किया गया।
- दयाल पांडे और मुन्नी पांडे को पुष्पलता जोशी कुमाऊँनी साहित्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
- प्रोफेसर दीपा गोबाड़ी को मुन्नी जोशी कुमाऊँनी साहित्य पुरस्कार से अलंकृत किया गया।
सम्मानित विभूतियों ने कहा कि यह पुरस्कार केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि पूरी कुमाऊँनी भाषा की प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
साहित्य विमोचन से सजी संध्या?सम्मेलन के दौरान तीन महत्वपूर्ण कृतियों का लोकार्पण भी किया गया —
- माया रावत के कुमाऊँनी निबंध संग्रह “बौड़ि”,
- डॉ. कीर्ति बल्लभ शक्टा के महाकाव्य “घटकुकि प्राण प्रतिष्ठा” और “शक्टावाग्विलास”,
- तथा खुशाल सिंह खनी के कहानी संग्रह “बरयात” का विमोचन हुआ।
इन पुस्तकों ने सम्मेलन को साहित्यिक गरिमा और गहराई प्रदान की। वक्ताओं ने कहा कि ऐसी रचनाएँ लोकभाषा के संवर्धन में नए मील के पत्थर साबित होंगी।
उपस्थित जनों की सहभागिता ने बनाया आयोजन को ऐतिहासिक?सम्मेलन में उपस्थित रहे प्रमुख प्रतिभागियों में पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डी, एस बिष्ट, डॉ LM उप्रेती,कौस्तुभ चंदोला, नीरज पंत, भारत लाल शाह, दो किशोर चंदोला,शशि शेखर जोशी, महेंद्र ठकुराठी, डॉ. पीतांबर अवस्थी, दिनेश भट्ट, डॉ. नीरज चंद्र जोशी, ललित तुलेरा, एडवोकेट डी.के. शर्मा, दीक्षा जोशी, जनार्दन चिलकोटी, पंडित त्रिलोचन पनेरू, लक्ष्मी चंद्र पंत, पूर्व पुलिस उपाध्यक्ष आनंद सिंह धामी,हेम पंत, प्रवीण प्रकाश, और टीम घुघुती जागर के राजेंद्र ढेला, घनश्याम अंडोला, कृपाल सिंह शीला, महेश बराल, ओम श्री जैसे नाम शामिल थे।
इसके अलावा डॉ. किशोर चंदोला, नीलम नेगी, प्रवीण प्रकाश, डॉ. पुष्पलता जोशी, तारा दत्त तिवारी, शंकर जोशी, लीलांबर जोशी, शिवदत्त पांडे की उपस्थिति ने आयोजन को सामाजिक और बौद्धिक दोनों स्तरों पर समृद्ध किया।
सभी प्रतिभागियों ने एक स्वर में कहा कि यह सम्मेलन केवल एक भाषाई आयोजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक पुनर्जागरण है — जो उत्तराखंड की आत्मा को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहा है।
कुमाऊँनी भाषा – पहचान, संघर्ष और स्वाभिमान की प्रतीक?दिन भर के इन सत्रों का सार यही रहा कि भाषा का मानकीकरण केवल अकादमिक कार्य नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न है। वक्ताओं ने कहा कि कुमाऊँनी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान दिलाने के साथ-साथ इसे प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाना चाहिए।
डॉ. के.सी. चंदोला ने कहा कि “आज रुद्रपुर में जो वातावरण बना है, वह आने वाले समय में कुमाऊँनी भाषा के पुनर्जागरण की दिशा तय करेगा।”
सम्मेलन का यह दूसरा दिन इस संदेश के साथ समाप्त हुआ कि कुमाऊँनी भाषा केवल पहाड़ों की बोली नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा की आवाज़ है। इस भाषा को संरक्षित करना, आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ना है।
(रुद्रपुर से अवतार सिंह बिष्ट, संवाददाता / हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स) उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी




