स्वर्गीय प्रकाश पंत की स्मृतियों में राज्य आंदोलनकारी गोपू महर – जनसरोकारों के प्रहरी की नजर से उत्तराखंड की रजत जयंती”

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उत्तराखंड राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने के इस ऐतिहासिक अवसर पर, जब पूरा पर्वतीय प्रदेश अपने सपनों, संघर्षों और उपलब्धियों का लेखा-जोखा कर रहा है, वहीं पिथौरागढ़ से एक भावनात्मक स्वर उभरा — राज्य आंदोलनकारी गोपू महर का।
गोपू महर ने एक वीडियो संदेश के माध्यम से स्वर्गीय प्रकाश पंत को श्रद्धांजलि दी और राज्य की रजत जयंती पर प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उनके शब्दों में, यह न केवल एक उत्सव का समय है, बल्कि आत्ममंथन और समर्पण का भी क्षण है — “हमने जिस उत्तराखंड का सपना देखा था, क्या वह आज भी वैसा ही जीवंत है?”


प्रकाश पंत: एक युग का नाम, एक आदर्श की पहचान

पिथौरागढ़ के सुपुत्र, पूर्व मंत्री स्वर्गीय प्रकाश पंत केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे एक विचार, एक संवेदना और एक अनुशासन का प्रतीक थे।
गोपू महर उन्हें याद करते हुए कहते हैं —

“प्रकाश पंत जी जैसे लोग राजनीति में नहीं, लोकनीति में जीते हैं। उनकी सादगी, उनके निर्णयों की पारदर्शिता, और जनता से उनका गहरा जुड़ाव आज भी पिथौरागढ़ के हर नागरिक के दिल में बसता है।”

वास्तव में, प्रकाश पंत का व्यक्तित्व हिमालय की तरह ऊँचा और गंगोत्री के जल की तरह निर्मल था। वे चाहे विधानसभा में हों या अपने क्षेत्र में, उनके निर्णय हमेशा जनहित और विकास के संतुलन पर आधारित होते थे।

उनके निधन के बाद पिथौरागढ़ की जनता आज भी उन्हें श्रद्धा से याद करती है — जैसे कोई परिवार अपने मुखिया को याद करता है।


गोपू महर: जनसरोकारों के सच्चे प्रहरी

राज्य आंदोलन से लेकर आज तक, गोपू महर पिथौरागढ़ के उन कुछ नामों में से हैं जो न किसी सत्ता से डरे, न किसी पद की लालसा में झुके।
उन्होंने हमेशा जनता के अधिकारों, शिक्षा, पारदर्शिता और सामाजिक न्याय के लिए आवाज उठाई।

एक उदाहरण खुद पिथौरागढ़ की जनता आज भी याद करती है —
जब जिले के प्राइवेट स्कूल अभिभावकों से मनमानी फीस और किताबों के दाम वसूल रहे थे, तब गोपू महर ने अभिभावक मंच बनाकर गांधी चौक पर एक ऐतिहासिक धरना-प्रदर्शन का नेतृत्व किया।
रात के 9 बजे तक प्रशासनिक अफसर, स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे।
गोपू महर की दृढ़ता और जनता के समर्थन से मीटिंग में स्कूल प्रबंधन ने अपनी गलती स्वीकार की और जिला प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई की।

यह सिर्फ एक आंदोलन नहीं था, बल्कि जनशक्ति की जीत थी — जो दिखाती है कि अगर संकल्प हो, तो एक व्यक्ति भी व्यवस्था को झुका सकता है।


उत्तराखंड की रजत जयंती: आत्ममंथन का अवसर

गोपू महर अपने संदेश में कहते हैं —

“उत्तराखंड 25 साल का हो गया, पर यह जरूरी है कि हम यह देखें कि इन 25 वर्षों में हमने अपने पहाड़ों, अपनी नदियों, अपनी मातृभूमि के सपनों के साथ कितना न्याय किया है।”

उनका यह सवाल हर जागरूक उत्तराखंडी के मन में गूंजता है।
उन्होंने कहा कि स्वर्गीय प्रकाश पंत जैसे ईमानदार जनप्रतिनिधियों की कमी आज गहराई से महसूस होती है।
राज्य को जरूरत है नए प्रकाश पंतों की — जो सत्ता से नहीं, सेवा से प्रेरित हों; जो योजनाओं की घोषणा नहीं, उनके धरातल पर क्रियान्वयन को प्राथमिकता दें।


पिथौरागढ़ का जनमानस: एक प्रेरणादायक केंद्र

पिथौरागढ़ न केवल उत्तराखंड के सीमांत का प्रतीक है, बल्कि यह आंदोलन और जनजागरूकता की भूमि रही है।
यहां के आंदोलनकारियों ने राज्य निर्माण से लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय की हर लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई है।
गोपू महर जैसे लोग इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं —
वे मानते हैं कि “राज्य केवल सीमाओं से नहीं बनता, बल्कि नागरिकों की सजगता और ईमानदारी से मजबूत होता है।”


रजत जयंती पर संदेश

गोपू महर ने अपने वीडियो संदेश में कहा —

“हम सबको इस रजत जयंती पर प्रण लेना चाहिए कि हम उत्तराखंड को फिर उस मार्ग पर लाएंगे, जिसका सपना स्वर्गीय प्रकाश पंत जैसे लोगों ने देखा था। एक ऐसा उत्तराखंड — जहाँ शिक्षा महंगी न हो, रोजगार अवसरों से भरा हो, और जनता का सम्मान सर्वोपरि हो।”


अंतिम शब्द: स्मृतियों से प्रेरणा तक

स्वर्गीय प्रकाश पंत की स्मृतियाँ पिथौरागढ़ की हर गली में हैं — किसी के आशीर्वाद की तरह।
और गोपू महर जैसे आंदोलनकारी उनकी उस जनसेवा की मशाल को आगे बढ़ा रहे हैं।

रजत जयंती के इस पावन अवसर पर, यह लेख न केवल एक श्रद्धांजलि है, बल्कि एक संकल्प पत्र भी —
कि उत्तराखंड की अगली पीढ़ी अपने इन नायकों के आदर्शों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ेगी।


“राज्य बनाना आसान था, पर उसे संवेदनशील बनाना कठिन है।
स्वर्गीय प्रकाश पंत ने वह राह दिखाई थी — और गोपू महर जैसे लोग अब भी उस दीप को जलाए हुए हैं।”

— ✍️ अवतार सिंह बिष्ट
संपादक, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
रजत जयंती विशेषांक – पिथौरागढ़ से विशेष रिपोर्ट


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