(रिकॉर्ड-बुक का बलात्कार) तालाब में मॉल का डूबा सच: जब शासन–प्रशासन बना दलाल, तब हाईकोर्ट बना अंतिम पहरेदार — 500 करोड़ के घोटाले ने खोली उत्तराखंड की बदहाल आत्मा!”

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रुद्रपुर के दिल में स्थित 4.07 एकड़ तालाब की वह जमीन सिर्फ एक तालाब नहीं थी —
वह उत्तराखंड के अस्तित्व, उसके स्वाभिमान और उसकी प्रकृति की धड़कन थी।
लेकिन सत्ता के गलियारों में कुछ चुने हुए अधिकारी, नेता और भू-माफिया आज़ादी के इस देवभूमि के संसाधनों को गोश्त की तरह बांटने पर तारू हो चुके हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

और यही कारण रहा कि अंततः हाईकोर्ट को सामने आकर जनता की जमीन का पहरेदार बनना पड़ा।
जिस काम के लिए शासन–प्रशासन खड़ा होना चाहिए था, उस काम के लिए अदालत को तलवार उठानी पड़ी—
यही उत्तराखंड के दुर्भाग्य की सबसे घातक तस्वीर है।

घोटाले की पटकथा — सत्ता की नज़र में तालाब नहीं, माल था! वर्ष 1988 — दो साल के लिए मछली पालन हेतु नीलामी,लेकिन कोई लीज नहीं, कोई सहमति नहीं, कोई दस्तावेज नहीं,
कानूनी रूप से यह नीलामी शून्य, यानी अस्तित्वहीन।
फिर भी 1995 में वही बोलीदाता हाईकोर्ट से स्टे हथियाने में सफल
और वहीं घोटाले का पहला दरवाज़ा खुल गया।
सत्रह वर्ष तक चुप्पी—
फिर अचानक 2005 में शपथपत्रों की राजनीति, सचिव पी.सी. शर्मा की सांठगांठ
और तीन असंवैधानिक शासनादेश:

  1. 1803/वी-आ0-2005 — 04.08.2005
  2. 2818/वी-आ0-2005 — 03.10.2005
  3. 2301/वी-आ0-2005 — 30.10.2006

इन कागजों ने वह किया
जिस पर उत्तराखंड के हर सच्चे नागरिक का दिल रोना चाहिए:
सरकारी तालाब — जलमग्न क्षेत्र,
महायोजना में “WETLAND — NO FREEHOLD” दर्ज
फ्री-होल्ड पूर्णतः प्रतिबंधित

फिर भी —जमीन को निजी नामों में दर्ज कराना,परिवारिक बंटवारे के नाम पर दस्तावेज़ बदलना,
ग्राम लमरा, खसरा 02 को गायब कर नकली रूप से ग्राम रम्पुरा, खसरा 156 बनाना।
यह सिर्फ घोटाला नहीं, रिकॉर्ड-बुक का बलात्कार है।

असली विस्फोट — जब भ्रष्टाचार ने अपना मॉल बनाया,
500 करोड़ का मॉल,
ज़मीन मुफ्त में लेकर 8 करोड़ 66 लाख दिखाने का खेल,
BJP नेता का नाम,
Savana Infra की 58% हिस्सेदारी,

  • हिस्सेदारी का 03 जुलाई 2025 समझौता
  • और डेवलपमेंट का ढोंग बनाम लूट का खुला नाटक,
    मुनाफा?
    हजारों करोड़।
    किसकी कीमत पर?
    उत्तराखंड की आत्मा की कीमत पर। रामबाबू — आखिरी उम्मीद?जब चारों तरफ सत्ता-प्रशासन-बिल्डर गठजोड़ का कब्जा था,
    तब एक पूर्व सभासद रामबाबू अकेला खड़ा हुआ। RTI,जांच,घोटाले की पुष्टि,जिलाधिकारी की रिपोर्ट शासन को भेजी गई!
    लेकिन यहाँ कहानी हॉलीवुड थ्रिलर जैसी हो गई —शासन के अपर सचिव अतर सिंह ने कार्रवाई कराने के बजाए
    जांच को प्रभावित करने के लिए नए सिरे से जांच का आदेश दे दिया।

फिर प्रकट होते हैं नए तपस्वी —निवर्तमान DM उदयराज सिंह — सत्ता के बेहद करीबी।
उनकी जांच में —
ना भ्रष्टाचार दिखा, ना जमीन की कैटेगरी, ना Wetland, ना Free-hold का प्रतिबंध।

बल्कि — इसी दिन NOC और मानचित्र स्वीकृत — रिकॉर्ड स्पीड में।

और फिर — हाईकोर्ट का ऐतिहासिक प्रहार

रामबाबू की जनहित याचिका
और अदालत ने समझ लिया —कि देवभूमि की सुरक्षा सत्ता की प्राथमिकता नहीं,
वह अदालत का धर्म बन चुका है।
हाईकोर्ट ने निर्माण पूर्णतः रोक दिया, खरीद-फरोख्त पर प्रतिबंध लगाया।
पूरी डील पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया,यानी
जिसका मालिक जनता थी, उस जमीन के हत्यारों को अदालत ने पहली बार सजा का स्वाद चखाया।

सबसे बड़ा सवाल — क्या यह उत्तराखंड 2000 में लिए गए बलिदानों का उत्तराखंड है?राज्य आंदोलनकारियों ने लड़ाई लड़ी थी —विकास के लिए, संसाधनों के संरक्षण के लिए,आत्मनिर्भर पहाड़ के लिए, भ्रष्टाचार-मुक्त प्रणाली के लिए,
लेकिन आज की सच्चाई:

अधिकारी व्यवसायी बन गए? नेता बिल्डर बन गए? और जनता तमाशबीन बन गई!

अवतार सिंह बिष्ट (संपादक — Hindustan Global Times) ने क्या कहाथा,सुनिए:उत्तराखंड को सुरक्षित रखने के नाम पर शासन का गठन हुआ था,लेकिन आज उत्तराखंड को बेचने के लिए शासन चलाया जा रहा है।तालाब पर मॉल, वनभूमि पर रिसॉर्ट, नदी पर होटल — यह विकास नहीं,यह Devbhoomi का अंतिम संस्कार है।”

और यही वजह रही कि
Hindustan Global Times ने प्रारंभ से ही इस घोटाले को प्राथमिकता देकर लगातार प्रकाशित किया।हम आज वही खबर पुनः दोहरा रहे हैं —
ताकि सत्ता को याद दिलाया जा सके कि
सच को कागजों में दफनाया नहीं जा सकता।?यह घोटाला सिर्फ एक मॉल का संघर्ष नहीं —
यह जनता बनाम सत्ता की लड़ाई है।यह उत्तराखंड बनाम भू-माफिया की लड़ाई है।
यह आम आदमी बनाम सत्ता में बैठे दलालों की लड़ाई है।और अगर अदालतें जाग रही हैं —
तो इसका मतलब अब भी उम्मीद जिंदा है।
जब देवभूमि के पहरेदार सो जाते हैं,
तब न्यायालयों को पहरेदार बनना पड़ता है।
अगर सरकार सच में जाग जाए —तो उत्तराखंड बिकेगा नहीं —
उत्तराखंड बचेगा।”


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