

उत्तरकाशी / चमोली।
प्रदेश के पर्वतीय जनपदों में भालू शीतनिद्रा भूलकर मानव बस्तियों तक पहुंच रहे हैं। बीते पांच महीनों में केवल उत्तरकाशी जनपद में ही भालू के हमलों की 11 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं, जिनमें दो महिलाओं की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग गंभीर रूप से घायल हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि जहां पहले भालू शाम के बाद सक्रिय होते थे, अब दिन के उजाले में भी हमला कर रहे हैं। इससे वन क्षेत्र से लगे गांवों में ग्रामीण दहशत के साये में जीने को मजबूर हैं।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सामान्यतया भालू अगस्त से अक्टूबर तक भोजन इकठ्ठा कर नवंबर से मार्च तक शीतनिद्रा (Hibernation) में प्रवेश कर जाते हैं, लेकिन पिछले चार–पांच वर्षों से भालुओं के व्यवहार में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। वन विभाग के अनुसार जलवायु परिवर्तन और पर्याप्त बर्फबारी न होने से भालू शीतनिद्रा में नहीं जा रहे और भोजन की तलाश में मानव बस्तियों तक पहुंच रहे हैं।
खेत-खलिहानों तक जोखिम
पहले भालू फसलों, विशेषकर सेब को नुकसान पहुंचाते थे, लेकिन अब इंसानों पर भी हमला कर रहे हैं। ग्रामीण महिलाओं के लिए चारापत्ती लाने और खेतों में काम करना जोखिमभरा हो गया है। कई गांवों में पशुपालक रातभर पहरा देने को मजबूर हैं।
उत्तरकाशी में हमलों की घटनाएं
6 जुलाई — मोरी, जखोल गांव: एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल
20 सितंबर — भटवाड़ी, सालंग: महिला गंभीर रूप से घायल
17 अक्टूबर — मोरी, मौंडा: नेपाली मूल का चौकीदार घायल
26 अक्टूबर — भटवाड़ी, औंगी: हमले से बचते हुए महिला पहाड़ी से गिरकर मृत
31 अक्टूबर — मोरी, थुनारा: अधेड़ व्यक्ति घायल
6 नवंबर — भटवाड़ी, हीना: भालू के हमले में महिला की मौत
11 नवंबर — भटवाड़ी, सेकू: महिला पर हमला
18 नवंबर — मंगलपुर: दो नेपालियों पर हमला
22 नवंबर — हर्षिल घाटी: नेपाली मूल के व्यक्ति पर हमला
23 नवंबर — मोरी, ओसला: महिला घायल
27 नवंबर — रैथल: युवक पर हमला
वन विभाग के अनुसार 1500 से 3500 मीटर ऊंचाई तक काला भालू पाया जाता है, और इन्हीं क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है।
डीएफओ डीपी बलूनी के अनुसार:
“जलवायु परिवर्तन और बर्फबारी न होने के कारण भालू सक्रिय हैं। ग्रामीणों को लगातार सतर्क रहने को जागरूक किया जा रहा है। एनाइडर सिस्टम सहित अन्य सुरक्षा संसाधन मंगाए गए हैं।”
चमोली में भी भालू का आतंक — गौशाला तोड़कर गाय को मार डाला।इधर चमोली के दूरस्थ गांव लिंगड़ी- में भालू का आतंक चरम पर है। बीती रात भालू ने गौशाला में घुसकर एक गाय को मार डाला, जिसके बाद पूरे गांव में दहशत फैल गई है। ग्रामीणों के अनुसार गौशाला में लगे 6 इंच मोटे तख्तों और लोहे की सीट पर लगे बोल्ट तक भालू ने उखाड़ दिए, जिससे उसकी शक्ति और आक्रामकता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
अब गांव के लोग रात-रात भर पहरा देने को मजबूर हैं।
पीड़ित गोपालक को अभी तक सरकार या वन विभाग की ओर से किसी भी तरह की आर्थिक सहायता नहीं दी गई है, जिसके चलते ग्रामीण बेहद नाराज हैं। उनका कहना है कि सरकार और वन विभाग केवल कागजी आश्वासन दे रहे हैं, जबकि गांव के लोग रोज खतरे में जी रहे हैं।
ग्रामीणों की मांग
गांवों में तत्काल रात्रि गश्त और सर्च अभियान
भालुओं को दूर रखने के लिए सुरक्षा उपकरण और प्रकाश व्यवस्था
प्रभावित लोगों को तत्काल आर्थिक सहायता और मुआवजा
मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकथाम नीति को मजबूत करने की जरूरत
ग्रामीणों का साफ कहना है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो स्थिति और भयावह हो सकती है। पहाड़ी गांवों में लोग प्राकृतिक आपदाओं से ज्यादा अब भालू के खौफ में जी रहे हैं।




