

गौ रक्षा सम्मेलन और ‘चयनात्मक सेकुलरिज्म’ का शोर

रुद्रपुर में हुए गौ रक्षा दल के महासम्मेलन से कुछ लोगों को इतनी तकलीफ क्यों हो गई, यह समझ से परे नहीं है। हजारों युवाओं की शांतिपूर्ण उपस्थिति, गौ माता के जयकारे और राष्ट्रभक्ति के नारों से जिनकी “सेकुलर नसें” फड़क उठीं, उनका इतिहास चयनात्मक विरोध का रहा है। जब समुदाय विशेष खुले मंच से जनसंख्या वृद्धि, मजहबी वर्चस्व और बाबर-औरंगजेब का महिमामंडन करता है, तब यही लोग मौन साध लेते हैं। लेकिन जब हिंदू समाज अपनी आस्था और संस्कृति की बात करता है, तब इन्हें “सांप्रदायिकता” याद आ जाती है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
गौ रक्षा सम्मेलन किसी राजनीतिक दल का मंच नहीं, बल्कि जनभावना का स्वर था। इसे नफरत फैलाने का ठप्पा लगाने वाले वही लोग हैं, जो दशकों से हिंदुओं को असंगठित देखना चाहते रहे हैं। रुद्रपुर का यह जनसैलाब बता गया—अब हिंदू समाज केवल सहन नहीं, जवाब भी देना जानता है।
रुद्रपुर में आयोजित गोरखा सम्मेलन केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि सत्ता, समाज और राजनीति को आईना दिखाने वाला मंच बनकर उभरा। वर्षों से अपने अधिकार, पहचान और सम्मान के लिए संघर्ष करती आ रही गोरखा समाज की पीड़ा इस सम्मेलन में खुलकर सामने आई। मंच से उठी आवाज़ें केवल भाषण नहीं थीं, बल्कि उन वादों की याद दिलाने वाली थीं, जो हर चुनाव में किए जाते हैं और बाद में भुला दिए जाते हैं।
सम्मेलन ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि सीमाओं की रक्षा करने वाला, हर आपदा में सबसे पहले खड़ा होने वाला गोरखा समाज आज भी मूलभूत अधिकारों के लिए क्यों जूझ रहा है। राजनीतिक दलों की मौजूदगी और उनके बड़े-बड़े दावों के बीच समाज की वास्तविक ज़रूरतें कहीं दबती हुई दिखीं।
यह सम्मेलन चेतावनी भी था और अवसर भी—चेतावनी उन नेताओं के लिए जो गोरखा समाज को केवल वोट बैंक समझते हैं, और अवसर समाज के लिए कि वह अपनी एकजुटता को राजनीतिक ताकत में बदले। सवाल अब यह है कि क्या यह सम्मेलन केवल फोटो, पोस्टर और भाषणों तक सीमित रहेगा या सच में नीति और नियत दोनों बदलेगी।




