अंकिता के नाम पर राजनीति:जब न्याय नहीं, सत्ता की सुरक्षा प्राथमिकता बन जाए

Spread the love


रुद्रपुर। अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे अत्यंत संवेदनशील और दर्दनाक मामले को लेकर राजनीति किए जाने के विरोध में भाजपा महिला मोर्चा द्वारा रुद्रपुर के अंबेडकर पार्क में विरोध प्रदर्शन किया गया। महिला मोर्चा की कार्यकर्ताओं ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह इस जघन्य हत्याकांड को न्याय का विषय बनाने के बजाय राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रही है, जो निंदनीय है। प्रदर्शन के दौरान महिलाओं ने हाथों में तख्तियां लेकर नारेबाजी की और दोषियों को कड़ी सजा दिलाने की मांग की। महिला मोर्चा की नेताओं ने कहा कि अंकिता को न्याय दिलाने के लिए प्रदेश की जनता एकजुट है और इस मामले में राजनीति करना पीड़ित परिवार के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा महिला मोर्चा किसी भी स्तर पर न्याय की लड़ाई को कमजोर नहीं होने देगा। प्रदर्शन के माध्यम से महिला मोर्चा ने यह संदेश दिया कि संवेदनशील मामलों में राजनीतिक बयानबाजी से बचते हुए न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा रखा जाना चाहिए।

उत्तराखंड की चेतना में आज भी वह प्रश्न गूंज रहा है, जो सितंबर 2022 में वनंत्रा रिज़ॉर्ट की रिसेप्शनिस्ट अंकिता भंडारी की निर्मम हत्या के बाद उठा था—

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड)
क्या इस राज्य में सत्ता से जुड़े लोगों के लिए कानून अलग है?
और आज, ढाई वर्ष बाद भी, यह प्रश्न उतना ही जीवित है, जितना उस दिन था।
अंकिता भंडारी हत्याकांड कोई सामान्य आपराधिक मामला नहीं है। यह वह घटना है जिसने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया, सड़कों पर उतार दिया और सत्ता के गलियारों में बैठे “वीआईपी सिस्टम” को कटघरे में खड़ा कर दिया। लेकिन आज जब राज्य के कोने-कोने से सीबीआई जांच की मांग उठ रही है, तब सत्ता पक्ष इसे राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करने में जुटा है।
भाजपा महिला मोर्चा का विरोध: सवाल किस पर, निशाना किस पर?
भाजपा महिला मोर्चा द्वारा कांग्रेस पर “अंकिता प्रकरण में राजनीति करने” का आरोप लगाते हुए धरना-प्रदर्शन और पुतला दहन किया गया। मंच से यह संदेश दिया गया कि जो भी सीबीआई जांच की मांग कर रहा है, वह कांग्रेस का एजेंट है।
यहां पहला और सबसे अहम सवाल उठता है—
क्या उत्तराखंड की जनता, सामाजिक संगठन, पूर्व सैनिक, मातृशक्ति, छात्र, बच्चे, बुजुर्ग—सब कांग्रेस हो गए हैं?
रुद्रपुर से लेकर देहरादून, हल्द्वानी से लेकर पौड़ी तक—जो भी आवाज़ उठ रही है, उसे “कांग्रेसी” ठहराना सत्ता की घबराहट नहीं तो और क्या है?
सीबीआई से डर क्यों?
अगर भारतीय जनता पार्टी को अपने नेताओं, अपने सिस्टम और अपने “वीआईपी” पर इतना ही विश्वास है, तो फिर—
सीबीआई जांच से परहेज क्यों?
यह सवाल अब कांग्रेस का नहीं रहा।
यह सवाल अब उत्तराखंड की जनता का है।
राज्य सरकार बार-बार कहती है कि एसआईटी और स्थानीय जांच निष्पक्ष है। लेकिन क्या जनता का भरोसा जीता जा सका?
क्या आरोपी वीआईपी की भूमिका पर सभी सवालों के जवाब मिले?
क्या गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई?
क्या फास्ट-ट्रैक न्याय दिखाई दिया?
अगर इन सभी का उत्तर “हाँ” होता, तो सड़कों पर आज भी लोग न्याय की मांग लेकर खड़े न होते।
महिला न्याय या महिला मोर्चा की राजनीतिक ढाल?
यह अत्यंत विडंबनापूर्ण है कि एक महिला की हत्या के मामले में सत्ता पक्ष की महिला आइकाई ही सबसे पहले यह तय कर रही है कि—
कौन न्याय की मांग कर सकता है
कौन सवाल उठा सकता है
और कौन “राजनीति” कर रहा है
यह कैसा महिला-सशक्तिकरण है, जहां महिला के न्याय की आवाज़ को ही राजनीतिक घोषित कर दबाने की कोशिश की जा रही है?
क्या महिला मोर्चा का दायित्व सत्ता की रक्षा करना है, या अंकिता जैसी बेटियों को न्याय दिलाना?
आज भाजपा महिला मोर्चा का आंदोलन कांग्रेस के खिलाफ नहीं, बल्कि सीबीआई जांच की मांग को कुचलने का प्रतीक बनता दिख रहा है।
विपक्ष की भूमिका पर सवाल क्यों?
लोकतंत्र में विपक्ष का धर्म होता है सवाल पूछना।
अगर कांग्रेस, उत्तराखंड क्रांति दल या अन्य दल इस मुद्दे पर आवाज़ उठा रहे हैं, तो इसमें गलत क्या है?
क्या विपक्ष की चुप्पी सत्ता के लिए ज्यादा सुविधाजनक होती?
दरअसल, सत्ता पक्ष की परेशानी कांग्रेस नहीं है।
सत्ता पक्ष की असली परेशानी है—
सीबीआई जांच का वह दरवाज़ा, जो वीआईपी कमरों तक पहुंच सकता है।
सामाजिक संगठनों को बदनाम करने की साजिश
आज उत्तराखंड के अनेक सामाजिक संगठन, समाजसेवी, पूर्व व वर्तमान जनप्रतिनिधि, मातृशक्ति और आम नागरिक सड़क पर हैं।
लेकिन सत्ता की भाषा में ये सब “कांग्रेसी” हैं।
यह वही रणनीति है, जिसमें जनता को राजनीतिक रंग देकर उसकी विश्वसनीयता खत्म करने की कोशिश की जाती है।
लेकिन सवाल यह है—
क्या सच में जनता इतनी भोली है कि वह यह नहीं समझेगी कि उसे कौन मोड़ने की कोशिश कर रहा है?
असली राजनीतिकरण कौन कर रहा है?
भाजपा महिला मोर्चा यह आरोप लगा रहा है कि कांग्रेस अंकिता के नाम पर राजनीति कर रही है।
लेकिन हकीकत यह है कि—
सत्ता पक्ष सीबीआई जांच से बच रहा है
जनता की मांग को राजनीतिक बताकर खारिज कर रहा है
और महिला न्याय को सत्ता-संरक्षण का हथियार बना रहा है
तो फिर असली राजनीतिकरण कौन कर रहा है?
अंकिता सिर्फ नाम नहीं, प्रतीक है
अंकिता भंडारी आज सिर्फ एक नाम नहीं है।
वह उत्तराखंड की हर उस बेटी का प्रतीक है, जो सत्ता-संरक्षित अपराधों के सामने असहाय हो जाती है।
जब-जब अंकिता का नाम लिया जाता है, सत्ता असहज हो जाती है।
जब-जब सीबीआई जांच की बात होती है, आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाते हैं।
जनता फैसला करेगी
भाजपा महिला मोर्चा के आंदोलन पर सवाल इसलिए जरूरी हैं, क्योंकि—
यह आंदोलन न्याय के पक्ष में नहीं दिखता
यह आंदोलन सत्ता की ढाल बनता दिखता है
और यह आंदोलन महिला-न्याय को राजनीतिक हथियार बनाता है
अंततः फैसला अदालत या सत्ता नहीं करेगी—
फैसला जनता करेगी।
जनता देख रही है कि—
कौन सवालों से भाग रहा है
कौन जांच से डर रहा है
और कौन न्याय के नाम पर राजनीति का आरोप लगाकर खुद को बचा रहा है
निष्कर्ष
अगर भाजपा को अपने वीआईपी पर भरोसा है—
तो सीबीआई जांच कराइए।
अगर महिला मोर्चा सच में महिलाओं के साथ है—
तो सत्ता से सवाल पूछिए, न कि सवाल पूछने वालों को चुप कराइए।
और अगर यह लड़ाई राजनीति की नहीं है—
तो फिर जांच से डर कैसा?
अंकिता को न्याय चाहिए।
उत्तराखंड को जवाब चाहिए।
और अब जनता को सच्चाई चाहिए—
राजनीति नहीं।


Spread the love