रुद्रपुर/देहरादून।अंकिता भंडारी हत्याकांड ने उत्तराखंड के जनमानस को भीतर तक झकझोर कर रख दिया है। पूरे प्रदेश में पीड़ा, आक्रोश और न्याय की मांग गूंज रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा इस संवेदनशील मामले में सीबीआई जांच की घोषणा को आम जनता ने एक निर्णायक और साहसिक कदम के रूप में देखा है। इसके साथ ही प्रदेश के बुद्धिजीवियों, सामाजिक संगठनों और राज्य आंदोलनकारियों की ओर से यह मांग भी सामने आई है कि सीबीआई जांच की निगरानी किसी सिटिंग हाईकोर्ट जज द्वारा की जाए, ताकि जांच निष्पक्ष और प्रभावमुक्त रह सके।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
इसी बीच कांग्रेस पार्टी द्वारा निकाली गई तथाकथित “शव यात्रा” ने पूरे प्रदेश में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो और तस्वीरों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा लगाए गए नारे—
“धामी मर गया है, मर गया है”—ने न केवल राजनीतिक मर्यादाओं को तार-तार किया, बल्कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक और सामाजिक चेतना को भी आहत किया है।
सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया, कांग्रेस के खिलाफ उबाल
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जैसे ही “धामी मर गया है” के नारे और शव यात्रा के दृश्य सामने आए, वैसे ही आम नागरिकों, युवाओं, महिलाओं और वरिष्ठजनों ने कांग्रेस की इस राजनीति पर तीखा विरोध दर्ज कराया। लोगों का कहना है कि यह न तो अंकिता को न्याय दिलाने का रास्ता है और न ही यह किसी लोकतांत्रिक विरोध का स्वरूप।
कई यूजर्स ने इसे
“संवेदनहीन और शर्मनाक राजनीति”
“पीड़िता के नाम पर सस्ती लोकप्रियता”
“उत्तराखंड की संस्कृति का अपमान”
बताया।
राज्य आंदोलनकारियों का पुरजोर विरोध
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स से बातचीत में प्रदेश के विभिन्न जनपदों के प्रमुख राज्य आंदोलनकारियों ने कांग्रेस की शव यात्रा और नारों की कड़े शब्दों में निंदा की। आंदोलनकारियों का कहना है कि—
यह उत्तराखंड राज्य आंदोलन की आत्मा के खिलाफ है
यह मुद्दों की राजनीति नहीं, बल्कि व्यक्तिगत विद्वेष और कुंठा को दर्शाता है
इससे कांग्रेस का वैचारिक दिवालियापन उजागर होता है
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट कहा कि उत्तराखंड की राजनीति कभी भी व्यक्ति विरोध पर आधारित नहीं रही, बल्कि यहां हमेशा जल, जंगल, जमीन, रोजगार और न्याय जैसे मुद्दों पर संघर्ष हुआ है।
मुख्यमंत्री धामी के पक्ष में जनभावना
प्रदेश में बड़ी संख्या में लोग यह कहते नजर आए कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस मामले में सीबीआई जांच का फैसला लेकर राजनीतिक जोखिम उठाया, जो यह दर्शाता है कि सरकार दोषियों को बचाने के बजाय न्याय की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है।
लोगों का मानना है कि जांच की निगरानी हाईकोर्ट के सिटिंग जज से कराने की मांग भी पूरी तरह तार्किक और संवैधानिक है, लेकिन इसके नाम पर शव यात्रा और आपत्तिजनक नारे लगाना न्याय की मांग को कमजोर करता है।
सवाल जो कांग्रेस से पूछे जा रहे हैं
प्रदेश की जनता अब यह सवाल पूछ रही है—
क्या “धामी मर गया है” जैसे नारे लगाने से अंकिता को न्याय मिलेगा?
क्या शव यात्रा निकालने से दोषियों को सजा होगी?
क्या यही कांग्रेस की 2027 की राजनीति है?
जनता का साफ कहना है कि उत्तराखंड को
विकास, कानून व्यवस्था, महिलाओं की सुरक्षा, रोजगार और पारदर्शी शासन चाहिए—
न कि शव यात्रा और नफरत की राजनीति।
निष्कर्ष
अंकिता भंडारी को न्याय चाहिए, राजनीतिक तमाशा नहीं।
उत्तराखंड को जवाब चाहिए, नारे नहीं।
कांग्रेस की शव यात्रा और आपत्तिजनक नारों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रदेश की जागरूक जनता अब संवेदनहीन, असंस्कृत और व्यक्ति-आधारित राजनीति को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के पक्ष में उभरती जनभावना और कांग्रेस के खिलाफ बढ़ता विरोध इस बात के संकेत हैं कि आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति का फैसला संयम, संस्कृति और विकास के आधार पर होगा—
न कि “शव यात्रा” और “मर गया है” जैसे नारों पर।

