

उत्तराखंड की आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक चेतना का जीवंत प्रतीक श्रीनंदा देवी की जात–यात्राएं एक बार फिर स्पष्ट दिशा में आगे बढ़ती दिख रही हैं। वसंत पंचमी के पावन अवसर पर सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा द्वारा इसी वर्ष कैलाश जाने की इच्छा जताए जाने के साथ ही न केवल बड़ी जात की तिथि घोषित हुई, बल्कि हिमालयी समाज की सदियों पुरानी परंपराओं को भी एक नई ऊर्जा मिली है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
5 सितंबर 2026 से नंदा सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर से प्रारंभ होने वाली मां नंदा की बड़ी जात 21 दिनों तक चलेगी और 20 सितंबर को होमकुंड में अपने चरम बिंदु पर पहुंचेगी। दशोली, बधाण और बंड क्षेत्र की डोलियों का कैलाश की ओर प्रस्थान केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि सामूहिक सांस्कृतिक संकल्प है, जिसमें देव परंपरा, लोक विश्वास, हक–हकूक और सामाजिक सहभागिता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। मां नंदा का अवतरण और मुख्य अवतारी पुरुष के माध्यम से व्यक्त इच्छा, इस आयोजन को और भी आध्यात्मिक प्रामाणिकता प्रदान करती है।
दूसरी ओर, हिमालयी महाकुंभ के रूप में प्रतिष्ठित श्रीनंदा देवी राजजात को लेकर भी स्थिति स्पष्ट हो गई है। नौटी में राजकुंवरों और राजजात समिति द्वारा वर्ष 2027 में राजजात आयोजन की घोषणा दूरदर्शिता का परिचायक है। 12 वर्षों के चक्र के पूर्ण होने के बावजूद, मलमास, बुग्याली क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाएं और अधूरी तैयारियों को देखते हुए राजजात को आगे बढ़ाने का निर्णय न केवल धार्मिक विवेक, बल्कि प्रशासनिक और सामाजिक जिम्मेदारी को भी दर्शाता है।
राजजात के हर पड़ाव पर लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति यह बताती है कि यह आयोजन केवल आस्था तक सीमित नहीं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान, पर्यटन, लोकसंस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी गहराई से जुड़ा है। ऐसे में 2027 को लक्ष्य बनाकर यात्रा मार्गों का सुधारीकरण, पड़ावों पर आधारभूत सुविधाएं, स्वास्थ्य, संचार और सुरक्षा इंतजाम समय रहते सुनिश्चित किए जाना आवश्यक है। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज, मंदिर समितियों और स्थानीय हक–हकूकधारियों का साझा दायित्व भी है।
कुरुड़ की बड़ी जात और नौटी की राजजात—दोनों यात्राएं मिलकर यह संदेश देती हैं कि उत्तराखंड की देवसंस्कृति आज भी जीवंत है, निर्णय सामूहिक परंपराओं से होते हैं और आस्था के साथ विवेक का संतुलन ही इस हिमालयी समाज की सबसे बड़ी ताकत है। यदि तैयारी, समन्वय और संवेदनशीलता के साथ इन आयोजनों को आगे बढ़ाया गया, तो नंदा राजजात न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी उत्तराखंड के लिए एक ऐतिहासिक अध्याय सिद्ध होगी।
पंचमी के अवसर पर सिद्धपीठ कुरुड़ में मां नंदा द्वारा इसी वर्ष कैलाश जाने की इच्छा व्यक्त किए जाने के साथ ही बड़ी जात 2026 की तिथि घोषित हो गई, वहीं नौटी में श्रीनंदा देवी राजजात को 2027 में आयोजित करने की घोषणा ने एक ओर स्पष्टता दी है, तो दूसरी ओर कुछ परंपरागत और वैचारिक मतभेदों को भी जन्म दिया है।
बड़ी जात 2026 : परंपरा का निर्वाह
5 सितंबर 2026 से सिद्धपीठ कुरुड़ मंदिर से मां नंदा की बड़ी जात का शुभारंभ होगा। यह यात्रा दशोली, बधाण और बंड क्षेत्र की डोलियों के साथ 21 दिनों तक चलेगी और 20 सितंबर को होमकुंड में संपन्न होगी।
यह यात्रा गौड़ ब्राह्मणों, 14 सयानों, हक–हकूकधारी गांवों और मंदिर समितियों की सामूहिक सहमति से तय की गई है। मुख्य अवतारी पुरुष पर मां नंदा का अवतरण और कैलाश जाने की इच्छा व्यक्त होना परंपरा के अनुसार दैवी संकेत माना जाता है, जिसके बाद दिनपट्टा जारी किया गया।
इस बड़ी जात का स्वरूप सीमित क्षेत्रीय है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह राजजात से पूर्व की एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है, जो देव परंपरा की निरंतरता को बनाए रखती है।
नौटी में राजकुंवरों और श्रीनंदा देवी राजजात समिति द्वारा वर्ष 2027 में राजजात आयोजन की घोषणा को प्रशासनिक और व्यावहारिक दृष्टि से उचित माना जा रहा है। मलमास, बुग्याली क्षेत्रों में मौसम की कठिनाइयों, मार्गों की स्थिति और अधूरी तैयारियों को देखते हुए राजजात को आगे बढ़ाना विवेकपूर्ण निर्णय प्रतीत होता है।
लेकिन यहीं से मतभेद की रेखा उभरती है।
कुछ परंपराविदों और लोक आस्थावान वर्ग का मानना है कि 12 वर्ष पूर्ण होने पर राजजात का आयोजन होना चाहिए था और देवी परंपरा में तिथि से अधिक महत्व दैवी संकेतों और लोक सहमति का होता है। उनके अनुसार बार-बार प्रशासनिक कारणों से तिथि आगे बढ़ना परंपरा की आत्मा को कमजोर करता है।
वहीं दूसरी ओर, राजजात समिति और राजकुंवरों का पक्ष है कि आधी-अधूरी तैयारियों के साथ यात्रा कराना लाखों श्रद्धालुओं की सुरक्षा, पर्यावरण और व्यवस्था—तीनों के लिए जोखिमपूर्ण होता।
मतभेद का मूल कारण
यह मतभेद आस्था बनाम व्यवस्था का नहीं, बल्कि
परंपरा बनाम व्यावहारिक तैयारी का है।
एक पक्ष परंपरागत समयचक्र को सर्वोपरि मानता है
दूसरा पक्ष आधुनिक चुनौतियों, भीड़, संसाधन और सुरक्षा को
यह मतभेद टकराव नहीं, बल्कि उत्तराखंड की देवसंस्कृति के भीतर चल रहे संवाद का संकेत है।
सरकार और समाज की जिम्मेदारी
राजजात के हर पड़ाव पर लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति यह स्पष्ट करती है कि यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़ा महापर्व है।
2027 को लक्ष्य बनाकर:
यात्रा मार्गों का स्थायी सुधारीकरण
बुग्याल संरक्षण
चिकित्सा, संचार और आपदा प्रबंधन
स्थानीय हक–हकूकधारियों की भूमिका सुनिश्चित करना
अब अनिवार्य हो गया है।
यदि तैयारी समय रहते नहीं हुई, तो भविष्य में ऐसे मतभेद और गहरे हो सकते हैं।
कुरुड़ की बड़ी जात और नौटी की राजजात—दोनों यात्राएं यह संदेश देती हैं कि उत्तराखंड की देवसंस्कृति आज भी जीवंत है, लेकिन उसे निभाने के लिए केवल आस्था नहीं, संवेदनशील प्रशासन, सामाजिक संवाद और परंपरा के प्रति सम्मान भी जरूरी है।
मतभेद इस परंपरा की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण हैं। आवश्यकता इस बात की है कि ये मतभेद संवाद से सुलझें, ताकि नंदा राजजात आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल स्मृति नहीं, बल्कि प्रेरणा बनी रहे।




