नया UGC बिल: समानता के नाम पर संभावित दुरुपयोग की आशंका

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देश में उच्च शिक्षा को अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण बनाने के उद्देश्य से लाया गया नया UGC बिल अपने इरादों से अधिक, आशंकाओं के कारण चर्चा में है। सवाल यह नहीं है कि सामाजिक न्याय जरूरी है या नहीं—सवाल यह है कि क्या बिना पर्याप्त सुरक्षा प्रावधानों के बनाए गए कानून न्याय के बजाय अन्याय का माध्यम बन सकते हैं?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


आलोचकों का कहना है कि नए UGC नियमों में यदि शिकायतों की निष्पक्ष और प्राथमिक जांच की मजबूत व्यवस्था नहीं हुई, तो इसका दुरुपयोग संभव है। व्यक्तिगत असहमति, सामाजिक टकराव या निजी संबंधों से जुड़े विवादों को जातिगत उत्पीड़न का रूप देकर शैक्षणिक और सामाजिक जीवन को नष्ट किया जा सकता है।
किसी भी छात्र या छात्रा पर यदि झूठे आरोप लगते हैं, तो केवल कानूनी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि समाज की नजर में उसकी छवि, परिवार की प्रतिष्ठा और भविष्य की संभावनाएं भी दांव पर लग जाती हैं। बाद में अदालत से राहत मिल भी जाए, तो उस मानसिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षति की भरपाई कौन करेगा?
यह चिंता किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि कानून के संभावित दुरुपयोग के खिलाफ है। इतिहास गवाह है कि जब-जब कानूनों में संतुलन और जवाबदेही नहीं रखी गई, तब-तब वे न्याय के बजाय भय का औजार बने।
UGC जैसे संवैधानिक संस्थान से अपेक्षा है कि वह नियम बनाते समय केवल भावनाओं या राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाइयों और संभावित दुरुपयोग को ध्यान में रखकर ठोस गाइडलाइंस तय करे। सामाजिक न्याय तभी सार्थक होगा, जब वह सभी के लिए न्यायपूर्ण हो—न कि कुछ के लिए हथियार और कुछ के लिए अभिशाप।
कानून सशक्तिकरण का माध्यम बने, प्रतिशोध का नहीं—यही इस समय की सबसे बड़ी मांग है।


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