

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से तत्काल सुनवाई की मांग पर विचार किया।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यूजीसी द्वारा अधिसूचित यह नया नियम सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव को बढ़ावा दे सकता है। उन्होंने बताया कि यह मामला ‘राहुल दीवान एवं अन्य बनाम भारत सरकार’ से जुड़ा हुआ है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा, “हमें पता है कि क्या हो रहा है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी तरह की खामियां दूर की जाएं।” इसके साथ ही अदालत ने याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आश्वासन दिया।
याचिका में यह भी कहा गया है कि नए नियमों के तहत जाति-आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि भेदभाव के अन्य स्वरूपों को पर्याप्त रूप से परिभाषित नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे समानता के संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन होता है। इन नियमों के खिलाफ देश के कई हिस्सों में छात्र संगठनों और विभिन्न समूहों द्वारा विरोध प्रदर्शन भी किए जा रहे हैं, जहां इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग उठ रही है।
गौरतलब है कि यूजीसी ने ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ से जुड़े रेगुलेशन, 2026 को 13 जनवरी को अधिसूचित किया था। यह नियम देश के सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होता है। इसका उद्देश्य धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म स्थान, जाति या दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करना और संस्थानों में समावेशन को बढ़ावा देना बताया गया है। नए नियमों के तहत गठित की जाने वाली समितियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य किया गया है। हालांकि, इन्हीं प्रावधानों को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में कानूनी चुनौती दी गई है, जिस पर जल्द सुनवाई होने की संभावना है।




