

श्रीनगर/पौड़ी गढ़वाल।उत्तराखण्ड राज्य के गठन के 25 वर्ष पूरे होने पर पहाड़ों के विकास, संसाधनों के उपयोग और पलायन जैसे मुद्दों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हिमालय क्रांति पार्टी के नेता और श्रीनगर विधानसभा से प्रस्तावित प्रत्याशी रवींद्र जुयाल (रवि बोडा) ने राज्य की विकास नीतियों पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि उत्तराखण्ड आज भी अपने मूल उद्देश्य से भटका हुआ दिखाई देता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
उन्होंने कहा कि उत्तराखण्ड की नदियाँ देशभर की प्यास बुझाती हैं, लेकिन पहाड़ का नागरिक अपने ही गांव में पानी के लिए संघर्ष कर रहा है। यह केवल प्राकृतिक संकट नहीं, बल्कि नीति निर्धारण और प्राथमिकताओं की विफलता का परिणाम है। इसी तरह राज्य में बने बड़े-बड़े बांधों से देश को बिजली मिलती है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों को महंगे बिजली बिल चुकाने पड़ रहे हैं।
रवींद्र जुयाल ने पलायन को उत्तराखण्ड की सबसे गंभीर समस्या बताते हुए कहा कि रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में युवा लगातार पहाड़ छोड़ने को मजबूर हैं। इसके उलट बाहरी आबादी का पहाड़ों में बसना सामाजिक संतुलन और भविष्य के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
उन्होंने पलायन के प्रमुख कारणों में राजधानी के देहरादून में केंद्रीकरण को भी जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि यदि राजधानी पहाड़ी क्षेत्र में स्थापित होती, तो प्रशासनिक ढांचा, रोजगार और विकास के अवसर पहाड़ तक पहुंचते। पिछले 25 वर्षों में राजधानी का मैदान में सीमित रहना पलायन को बढ़ाने वाला बड़ा कारण बना है।
अपने बयान में उन्होंने जंगली जानवरों के बढ़ते हमलों, कृषि संकट, बेरोजगारी, सड़कों पर आवारा पशुओं की समस्या और व्यापक भ्रष्टाचार की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि यह किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही केंद्रीकृत और संकीर्ण सोच की देन है।
रवींद्र जुयाल ने कहा कि अब सवाल केवल सरकारों से नहीं, बल्कि जनता से है कि क्या आने वाले 25 वर्षों में भी वही समस्याएं दोहराई जाती रहेंगी या पहाड़ अपने हक़ के लिए संगठित होकर लोकतांत्रिक निर्णय लेगा। उन्होंने पानी, बिजली और प्रशासन में पहाड़ को प्राथमिकता देने तथा पलायन रोकने की नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने यह भी कहा कि बड़ी संख्या में उत्तराखण्डी राज्य से बाहर रह रहे हैं, जिनका दिल पहाड़ में है, लेकिन वोट बाहर दर्ज है। जब तक राजनीतिक भागीदारी पहाड़ में मजबूत नहीं होगी, तब तक नीतियां भी पहाड़ के हित में नहीं बनेंगी।
अपने बयान के माध्यम से उन्होंने जनता से सोचने, निर्णय लेने और जिम्मेदारी निभाने का आह्वान करते हुए सवाल उठाया—क्या पहाड़ सिर्फ़ देता रहेगा, या अब अपना हक़ भी पाएगा?




