स्पा, सिस्टम और सत्ता: क्या जीएसटी के नाम पर अनैतिक धंधे को वैधता मिल गई है?

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उत्तराखंड,एसएसपी मणिकांत मिश्रा के निर्देशानुसार ऊधमसिंहनगर पुलिस द्वारा मेट्रोपोलिस मॉल, पंतनगर क्षेत्र में 10 से अधिक अवैध स्पा सेंटरों पर की गई छापेमारी पहली नजर में एक बड़ी कार्रवाई लगती है। एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट द्वारा ताले लगाए गए, चालान किए गए और संदेश दिया गया कि पुलिस अवैध गतिविधियों के खिलाफ सख्त है। लेकिन सवाल यह है—क्या यह कार्रवाई वास्तविक सफाई है या केवल सांकेतिक?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


उत्तराखंड के मैदानी जिलों, विशेषकर रुद्रपुर, काशीपुर, हरिद्वार और देहरादून में बीते वर्षों में स्पा सेंटरों की बाढ़ आ चुकी है। कागजों में ये “वेलनेस”, “थैरेपी” और “रिलैक्सेशन” के केंद्र हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट बताई जाती रही है। सूत्रों के अनुसार 80 प्रतिशत से अधिक स्पा सेंटरों में अनैतिक गतिविधियाँ खुले या छिपे रूप में संचालित होती हैं।
वैध लाइसेंस, अवैध काम—यह कैसा विरोधाभास?
पूर्व एसएसपी मंजूनाथ टीसी से हुई व्यक्तिगत बातचीत में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया था—सरकार द्वारा लाइसेंस प्राप्त, जीएसटी अदा करने वाले स्पा सेंटर सिद्धांततः वैध हैं, बशर्ते वे गाइडलाइनों का पालन करें। होटल रेडिसन, ताज जैसे बड़े प्रतिष्ठानों में चलने वाले स्पा सेंटर इसी दायरे में आते हैं। अधिकारी का साफ कहना था—नियम तोड़ोगे तो कार्रवाई तय है, चाहे कोई भी हो।
यहीं से असली सवाल जन्म लेता है—जब सरकार लाइसेंस देती है, जीएसटी वसूलती है, तो क्या वह यह सुनिश्चित भी करती है कि वहां वास्तव में “स्पा” ही चल रहा है?
या फिर जीएसटी के नाम पर सिस्टम ने आंखें मूंद ली हैं?
मेट्रोपोलिस मॉल: मॉल या रेड-लाइट हब?
सूत्रों के हवाले से यह बात बार-बार सामने आई है कि मेट्रोपोलिस मॉल के भीतर कई स्पा सेंटर लंबे समय से संदिग्ध गतिविधियों के केंद्र रहे हैं। यहां तक कि पूर्व में विदेश, विशेषकर थाईलैंड से युवतियों के बुलाए जाने की चर्चाएं भी सामने आईं। ये दावे जांच का विषय हैं, लेकिन लगातार उठते सवाल खुद सिस्टम की चुप्पी पर उंगली उठाते हैं।
स्थानीय लोग बताते हैं कि मॉल का मेंटेनेंस स्पा सेंटरों से होने वाली कमाई पर निर्भर हो चुका है। शाम ढलते ही महंगे वाहनों में आने वाले “धनाढ्य युवाओं” की भीड़, संदिग्ध आवाजाही और बंद कमरों की संस्कृति—यह सब किसी सामान्य शॉपिंग मॉल की तस्वीर नहीं लगती।
‘रोटेशन सिस्टम’: देह व्यापार का संगठित नेटवर्क?
सबसे गंभीर पहलू वह है जिसे स्थानीय स्तर पर “रोटेशन सिस्टम” कहा जाता है। सूत्रों के अनुसार—
रुद्रपुर की युवतियाँ कुछ समय बाद देहरादून भेज दी जाती हैं
देहरादून से हरिद्वार
हरिद्वार से मुंबई
यूपी, राजस्थान, दिल्ली—हर जगह से अदला-बदली
इसका उद्देश्य साफ बताया जाता है—ग्राहकों को “नई चीज” मिलती रहे। अगर यह सच है, तो यह केवल अनैतिकता नहीं, बल्कि मानव तस्करी के संगठित संकेत हैं।
उत्तराखंड की बेरोजगार युवतियाँ: सपनों से शोषण तक
इस पूरे तंत्र का सबसे कड़वा सच यह है कि इसमें स्थानीय बेरोजगार युवतियाँ भी फंसाई जा रही हैं। बड़े-बड़े सपने, जल्दी पैसा, लग्जरी लाइफ—और फिर धीरे-धीरे दलदल। शुरुआत में ऊंचे रेट, बाद में मजबूरी। यह सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, सामाजिक और नैतिक विफलता का प्रश्न है।
छापा पड़ा, लेकिन सवाल बाकी हैं
मेट्रोपोलिस मॉल में हुई छापेमारी को मीडिया ने बड़ी कार्रवाई बताया, लेकिन ज़मीनी सवाल जस का तस है—
क्या सभी अवैध स्पा बंद हुए?
क्या लाइसेंस देने वाली एजेंसियों पर कार्रवाई होगी?
क्या जीएसटी और नगर निगम की भूमिका की जांच होगी?
क्या यह नेटवर्क सिर्फ  कुछ सेंटरों तक सीमित है या बड़े नाम भी घेरे में आएंगे?
कार्रवाई नहीं, इच्छाशक्ति चाहिए
उत्तराखंड पुलिस की कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन जब तक नीति, लाइसेंसिंग और राजस्व व्यवस्था की ईमानदार समीक्षा नहीं होगी, तब तक छापे केवल दिखावा बनकर रहेंगे।
सरकार को यह तय करना होगा—वह वेलनेस को बढ़ावा देना चाहती है या अनैतिक धंधे को टैक्स के दायरे में लाकर वैधता देना?
अगली कड़ी में अगर स्पा सेंटरों के “रेट कार्ड” और अंदरूनी व्यवस्था का खुलासा होता है, तो यह बहस और भी तीखी होगी। सवाल यह है—क्या सिस्टम जवाब देने को तैयार है?

लाइसेंस किसी का, धंधा किसी और का
पूर्व में की गई पड़ताल में यह तथ्य सामने आया है कि रुद्रपुर और आसपास संचालित कई स्पा सेंटर वास्तव में स्थानीय प्रभावशाली और धनाढ्य लोगों के नियंत्रण में हैं, लेकिन चालाकी यह है कि लाइसेंस राजस्थान या अन्य राज्यों से आए गरीब कर्मचारियों के नाम पर लिया गया है। इन लोगों को मामूली तनख्वाह और थोड़ा-बहुत कमीशन देकर आगे कर दिया जाता है, जबकि पर्दे के पीछे से पूरा अनैतिक कारोबार रसूखदार चेहरे संचालित करते हैं।
जब कार्रवाई होती है तो यही गरीब नामधारी लाइसेंसधारी पुलिस और प्रशासन के सामने खड़े कर दिए जाते हैं। असली संचालक या तो साफ बच निकलते हैं या फिर 10–15 हजार के नाममात्र जुर्माने से मामला रफा-दफा हो जाता है। यह न्याय नहीं, बल्कि सिस्टम का मज़ाक है।
उत्तराखंड पुलिस को अब केवल ताले और चालान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन प्रभावशाली चेहरों को भी बेनकाब करना चाहिए जो गरीब मजदूरों की आड़ लेकर अनैतिक धंधा चला रहे हैं। वरना कार्रवाई केवल दिखावा बनकर रह जाएगी।


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