


रुद्रपुर तहसील अंतर्गत ग्राम जयनगर की कृषि भूमि से जुड़ा एक पुराना मामला अब सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर रहा है। स्व. चेतराम पुत्र सेवाराम को फसली वर्ष 1361 में खसरा संख्या 54, खाता संख्या 18 की कृषि भूमि सरकार द्वारा पट्टे पर दिए जाने का दावा है, लेकिन जब उनके पुत्र रामकुमार ने आरटीआई के तहत जानकारी मांगी तो तहसील प्रशासन ने अधिकांश बिंदुओं पर जवाब दिया— “रिकॉर्ड कार्यालय में उपलब्ध नहीं है।”

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस भूमि के संबंध में वर्षों तक खेती होने की बात कही जा रही है, उसी भूमि के दस्तावेज आज तहसील रिकॉर्ड में नहीं मिल रहे। सवाल यह है कि क्या रिकॉर्ड वास्तव में नष्ट हो गया है, या फिर जानबूझकर अनुपलब्ध बताया जा रहा है?
आरटीआई के जवाब में यह भी कहा गया कि ग्राम जयनगर की वर्तमान खतौनी में चेतराम के नाम कोई भूमि दर्ज नहीं है, जबकि 1369 फसली की खतौनी के लिए आवेदक को जिला राजस्व अभिलेखागार भेज दिया गया। सवाल उठता है कि जब पट्टा सरकारी स्तर पर दिया गया था, तो उसके निरस्तीकरण या नामांतरण से जुड़े आदेश कहां हैं?
आवेदक का आरोप है कि उनके पिता को दस्तावेजों में “फरार” दिखाकर अन्य लोगों के नाम भूमि दर्ज करा दी गई, जिसकी जानकारी परिवार को कभी नहीं दी गई। बाद में जब भूमि पर कब्जा जताया गया तो कथित रूप से दबंगों द्वारा मारपीट और जान से मारने की धमकी दी गई।
अब बड़ा सवाल यह है कि
पट्टा निरस्तीकरण का आदेश किस आधार पर हुआ?
फाइलें और अभिलेख आखिर गए कहां?
क्या आरटीआई के तहत जानबूझकर अधूरी या भ्रामक सूचना दी जा रही है?
यह मामला न सिर्फ एक परिवार की जमीन का है, बल्कि राजस्व व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि सरकारी रिकॉर्ड ही “उपलब्ध नहीं” हैं, तो आम नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा कैसे करेगा?
अब निगाहें प्रशासन और अपीलीय अधिकारी पर टिकी हैं—
क्या सच सामने आएगा, या फाइलों के गायब होने की कहानी यूँ ही चलती रहेगी?




