

भीमताल विधानसभा क्षेत्र इन दिनों सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति में उभरते संघर्ष बनाम विरासत के विमर्श का केंद्र बनता जा रहा है। पहाड़-पानी के तोक कफरोली से लेकर ओखलकांडा के टकुरा, जून स्टेट के कुआंताल से लेकर भीमताल थाने की चारदीवारी तक—एक नाम लगातार जनता की चर्चाओं में है: हरीश पनेरु।
यह वही हरीश पनेरु हैं, जिन्हें जनता सिर्फ एक कांग्रेसी नेता या पूर्व राज्य मंत्री के रूप में नहीं देख रही, बल्कि एक मैदानी संघर्षशील चेहरे के रूप में पहचानने लगी है। सवाल यही है—क्या यह बढ़ती सक्रियता और जनसंपर्क 2027 में भीमताल विधानसभा सीट का राजनीतिक रुख बदल सकती है?

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
संघर्ष की राजनीति बनाम सत्ता की राजनीति
बीते समय में भीमताल की राजनीति अपेक्षाकृत शांत मानी जाती रही है, लेकिन हाल के महीनों में जो घटनाक्रम सामने आए हैं, उन्होंने इस शांति को वैचारिक उथल-पुथल में बदल दिया है।
हरीश पनेरु का क्षेत्रीय भ्रमण केवल औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहा। ग्राम पहाड़ पानी के तोक कफरोली में ग्रामीणों की समस्याएं सुनना हो, ओखलकांडा के टकुरा में सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों में सहभागिता हो, या फिर जून स्टेट कुआंताल में बाघ आतंक से पीड़ित परिवार के घर पहुंचकर संवेदनाएं व्यक्त करना—यह सब एक सक्रिय जनप्रतिनिधि की भूमिका को दर्शाता है, भले ही वह वर्तमान में विधायक न हों।
जब भीमताल क्षेत्र में बाघ द्वारा गंगा देवी को निवाला बनाए जाने की घटना सामने आई, तब हरीश पनेरु सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहे। पीड़ित परिवार को 12 महीने की नौकरी, सोलर लाइट, रास्ता निर्माण जैसी मांगों को लेकर उन्होंने उच्च अधिकारियों से सीधी बातचीत की। यही वह राजनीति है जो जनता को दिखाई देती है—और याद रहती है।
नजरबंदी: राजनीति का टर्निंग पॉइंट
भीमताल की प्रमुख जनसमस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री से मिलने जा रहे हरीश पनेरु और उनके साथियों को जब पुलिस ने नजरबंद कर दिया, तो यह घटना सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रही। सुबह 12 बजे से शाम तक थाने में नजरबंद रहना, लोकतांत्रिक राजनीति में एक प्रतीकात्मक मोड़ बन गया।
जनता के बीच यह संदेश गया कि जो नेता जनता की बात लेकर सत्ता के दरवाजे तक जाता है, वही सत्ता को असहज करता है।
यहीं से हरीश पनेरु की छवि एक संघर्षशील विपक्षी नेता की बनती चली गई।
मनरेगा, भ्रष्टाचार और ग्रामीण असंतोष
केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा को कमजोर या बंद किए जाने के विरोध में भीमताल में वरिष्ठ कांग्रेसजनों के साथ एक दिवसीय धरना प्रदर्शन में सहभागिता—यह बताता है कि हरीश पनेरु की राजनीति सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि नीतिगत सवालों से भी जुड़ी है।
विकास कार्यों में अनियमितता, भ्रष्टाचार, बुनियादी सुविधाओं की कमी—ये मुद्दे आज भीमताल के गांवों में गूंज रहे हैं। और इन मुद्दों को उठाने वाला चेहरा अगर लगातार गांव-गांव दिखाई दे, तो उसका राजनीतिक असर होना स्वाभाविक है।
राम सिंह कैडा बनाम हरीश पनेरु: दो पीढ़ियों की राजनीति
वर्तमान विधायक राम सिंह कैडा, जो कभी छात्र संघ अध्यक्ष रह चुके हैं और एमबीपीजी डिग्री कॉलेज से जुड़ी छात्र राजनीति का चेहरा रहे हैं, उनकी अपनी एक पहचान है। लेकिन राजनीति में पहचान को निरंतरता चाहिए।
कैडा की राजनीति अपेक्षाकृत संस्थागत रही है, जबकि हरीश पनेरु की राजनीति आज मैदानी, भावनात्मक और संघर्ष आधारित दिखाई देती है।
जहां एक ओर वर्तमान विधायक का संपर्क सीमित दायरे में सिमटा दिखता है, वहीं दूसरी ओर हरीश पनेरु का ग्रामीण क्षेत्रों में निरंतर संपर्क, शोक-संवेदना से लेकर विवाह समारोह तक उपस्थिति—एक जीवंत जननेता की छवि गढ़ रहा है।
दोनों के बीच आमना-सामना और राजनीतिक टकराव की स्थिति यह संकेत देती है कि 2027 की लड़ाई सिर्फ चुनावी नहीं, बल्कि राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई होगी।
संस्कृति और पहचान की राजनीति
उत्तरायणी कौतिक महोत्सव जैसे आयोजनों में सक्रिय सहभागिता यह दर्शाती है कि हरीश पनेरु राजनीति को सिर्फ सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और सामाजिक एकता का मंच भी मानते हैं।
“हमारी संस्कृति हमारी पहचान”—यह नारा आज पहाड़ की राजनीति में गहराई से असर करता है।
क्या जनता देगी टिकट?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है—“जनता द्वारा मिलेगा टिकट, लड़ेंगे चुनाव”। यह कथन सिर्फ नारा नहीं, बल्कि जमीनी संकेत है कि अगर किसी नेता की स्वीकार्यता पार्टी से पहले जनता में बन जाए, तो राजनीतिक समीकरण बदलते देर नहीं लगती।
कुर्सी विरासत में मिल सकती है, लेकिन जुनून, संघर्ष और जनता का प्यार—वह सिर्फ जमीन पर उतरकर ही मिलता है। और यही वह बिंदु है जहां हरीश पनेरु वर्तमान समय में बढ़त लेते नजर आते हैं।
फैसला वक्त और वोटर करेगा
भीमताल विधानसभा की राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है। हरीश पनेरु का बढ़ता जनसंपर्क, संघर्ष, नजरबंदी, आंदोलनों में भागीदारी और संवेदनशील मुद्दों पर सक्रियता—यह सब संकेत देता है कि अगर यह रफ्तार 2027 तक बनी रही, तो विधायक की सीट का समीकरण बदलना असंभव नहीं।
हालांकि अंतिम फैसला समय और मतदाता के हाथ में है।
लेकिन इतना तय है—भीमताल की राजनीति अब स्थिर नहीं रही।
पटकथा लिखी जा रही है…
और इसका अंतिम दृश्य जनता तय करेगी।




