

चमोली के मेलखेत लिगड़ी में निर्माणाधीन हिम ऊर्जा पावर परियोजना पर उठे आरोप बेहद चिंताजनक हैं। बिना पारदर्शी जनसुनवाई, संदिग्ध एनओसी, अवैध खनन और प्रशासनिक दबाव लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न हैं। 2013 आपदा पीड़ितों को अब तक पूरा मुआवजा न मिलना सरकारी संवेदनहीनता दर्शाता है। यदि विकास के नाम पर ग्रामीणों का शोषण होगा, तो यह पलायन और आपदा को आमंत्रण देने जैसा होगा। निष्पक्ष जांच अनिवार्य है।

चमोली जनपद के मेलखेत लिगड़ी क्षेत्र में निर्माणाधीन हिम ऊर्जा पावर परियोजना को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ग्राम लिगड़ी एवं ऊनीबगढ़ तोक के ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर परियोजना प्रबंधन पर नियमों की अनदेखी, बिना जनसुनवाई कार्य शुरू करने, अवैध खनन और प्रशासनिक दबाव जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना शुरू होने से पहले न तो विधिवत ग्राम सभा की बैठक बुलाई गई और न ही सार्वजनिक जनसुनवाई कराई गई। आरोप है कि कुछ चुनिंदा व्यक्तियों एवं पूर्व प्रधान के माध्यम से कथित तौर पर एनओसी प्राप्त कर ली गई, जो पूरे गाँव की सहमति का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इससे ग्रामीणों में आक्रोश व्याप्त है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
सबसे बड़ा मुद्दा मुआवजे को लेकर सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि चारा-पत्ती (वन उपज) और भूमि का उचित मुआवजा नहीं दिया गया। कई स्थानों पर बिना स्पष्ट सहमति खनन कार्य चल रहा है। विरोध करने पर कंपनी द्वारा प्रशासनिक दबाव बनाया जाता है, पटवारी और पुलिस को मौके पर बुलाकर ग्रामीणों को डराया-धमकाया जाता है। कुछ मामलों में मारपीट की घटनाओं का भी आरोप लगाया गया है।
ग्राम लिगड़ी और ऊनीबगढ़ तोक पहले से ही भूस्खलन की मार झेल रहे हैं। वर्ष 2013 की आपदा में लगभग 12 परिवारों के मकान बह गए या असुरक्षित हो गए थे। ग्रामीणों का कहना है कि केवल दो-तीन परिवारों को ही मुआवजा मिला, जबकि 8-9 परिवार आज भी उचित मुआवजे और पुनर्वास के इंतजार में हैं। दो बार गाँव का पुल बह चुका है, लेकिन अब तक स्थायी सुरक्षा दीवार या ठोस सुरक्षात्मक उपाय नहीं किए गए।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि परियोजना के तहत नदी की धारा को गाँव की ओर मोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, जिससे भविष्य में बड़ी आपदा का खतरा बढ़ सकता है। गाँव का विद्यालय और कॉलेज भी परियोजना गतिविधियों से प्रभावित हो रहा है, जिससे बच्चों के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है।
एक ओर सरकार पलायन रोकने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय हितों की अनदेखी कर परियोजनाओं को अनुमति देना ग्रामीणों को अपने ही गांव से पलायन के लिए मजबूर कर रहा है — ऐसा आरोप ज्ञापन में लगाया गया है।
ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच, विधिवत जनसुनवाई, पारदर्शी मुआवजा, अवैध खनन पर रोक और भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षा दीवार निर्माण की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो वे शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
लिगड़ी के मनोज भंडारी ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि परियोजना की मनमानी और बढ़ते खतरे के कारण उनका आधा परिवार पहले ही पलायन कर चुका है। गांव के कई अन्य परिवार भी उजड़ चुके हैं। जो बचे हैं, वे भय और असुरक्षा में जी रहे हैं। आवाज उठाने पर धमकाने और डराने के आरोप लग रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो पूरा लिगड़ी खौफ में खाली हो जाएगा।
अब देखना यह होगा कि शासन-प्रशासन इन गंभीर आरोपों पर क्या रुख अपनाता है और क्या ग्रामीणों को न्याय मिल पाता है या नहीं।




