

इनकी तलाश में उत्तराखंड, यूपी, बिहार, झारखंड में पुलिस टीमें दबिश दे रही हैं। हत्या को अंजाम देने वाले शूटरों के नाम आकाश प्रसाद, आशुतोष कुमार सिंह और विशाल हैं। इनका संबंध झारखंड के कुख्यात राजा, विशाल सिंह से होने की संभावना है। पुलिस जांच में शूटरों के बेहद शातिर मूवमेंट का पता चला है।

झारखंड के गैंगस्टर विक्रम शर्मा की देहरादून के सिल्वर सिटी मॉल में शुक्रवार को गोली मारकर की गई हत्या के बाद उसका स्टोन क्रशर काफी चर्चा में है। बाजपुर स्थित इस स्टोन क्रशर की अनुमति को लेकर भी तरह-तरह के सवाल खड़े किए जा रहे हैं। अब इसका जवाब के आदेश के रूप में बाहर आया है। यह आदेश विक्रम के भाई अरविंद शर्मा की कंपनी को स्टोन क्रशर की अनुमति देने का है। जिसके संचालन का जिम्मा विक्रम की पत्नी सोनिया शर्मा के पास हैं।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
हत्या से दो दिन पहले 11 जनवरी को शूटर झारखंड से फ्लाइट लेकर दिल्ली पहुंचे। वहां से वे हरिद्वार आए। हरिद्वार से उन्होंने किराये पर एक दोपहिया वाहन लिया और देहरादून पहुंचे। लेकिन वारदात को अंजाम देने के लिए उन्होंने दूसरी बाइक का इस्तेमाल किया। पुलिस ने भागते वक्त इस्तेमाल की गई बाइक को सहस्रधारा रोड इलाके से बरामद कर लिया है, जिसे शूटरों ने फेंक दिया था। पुलिस की 10 से ज्यादा टीमें यूपी, बिहार और झारखंड की खाक छान रही हैं। सीसीटीवी सर्विलांस में पता चला है कि हत्या के बाद शूटर हरिद्वार होते हुए यूपी की सीमा में दाखिल हुए थे। इसके बाद उनकी लोकेशन पहेली बनी हुई है। शूटर यूपी के रास्ते बिहार होते हुए या तो झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों में छिपे हैं या फिर नेपाल सीमा पार कर सुरक्षित ठिकाने पर निकल गए हैं। जमशेदपुर पुलिस भी इस इनपुट पर काम कर रही है। — विक्रम के भाई अरविंद से पुलिस ने की घंटों पूछताछ विक्रम शर्मा की हत्या महज बाहरी शूटरों का काम नहीं, बल्कि इसके पीछे एक गहरी और सोची-समझी स्थानीय मिलीभगत भी है। पुलिस की जांच अब विक्रम के अपने ही दायरे पर टिक गई है। रविवार को पुलिस ने विक्रम के भाई अरविंद शर्मा को हिरासत में लेकर घंटों पूछताछ की। इस हत्याकांड के बाद देहरादून में तैनात किए गए एसएसपी प्रेमेंद्र डोबाल ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह से गैंगवार और प्री-प्लांड मर्डर है। उन्होंने कहा कि शूटरों को देहरादून में रुकने, रेकी करने और वारदात के बाद सुरक्षित भागने के लिए स्थानीय स्तर पर मदद मिली। पुलिस ने ऐसे कई संदिग्धों को रडार पर लिया है। जल्द ही इस साजिश में शामिल स्थानीय मददगारों के चेहरे बेनकाब किए जाएंगे और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। इसके लिए पुलिस कई कड़ियां जोड़ ली हैं। शूटर हत्थे नहीं चढ़े तो घोषित होगा इनाम दून पुलिस के लिए नाक का सवाल बन चुके विक्रम हत्याकांड में पुलिस गिरफ्तारी के लिए हर प्रक्रिया को अपनाने में लगी है। एसएसपी ने बताया कि पुलिस और एसटीएफ की टीमें दिन-रात शूटरों की तलाश में जुटी हैं। अगर अगले 24 से 48 घंटों के भीतर आरोपी गिरफ्तार नहीं होते हैं, तो उन पर नकद इनाम घोषित किया जाएगा। फिलहाल, पुलिस तकनीकी सर्विलांस और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर ही गिरफ्तारी में लगी हुई है।
बताया जा रहा है कि यह वही दौर है, जब झारखंड में कई कांड करने और पुलिस का दबाव बढ़ने के बाद विक्रम ने उत्तराखंड की राह पकड़ी। ताकि नए सिरे और सुरक्षित ढंग से अपने पांव पसार सके। संभव है कि इसी तरह के धंधों के लिए अनुमति प्राप्त करके विक्रम में उत्तराखंड और राजधानी देहरादून में भी अपनी जड़ें गहरी की। वर्तमान में वह परिवार के साथ सहस्रधारा रोड स्थित ग्रीन व्यू रेजिडेंसी में रह रहा था।
विक्रम शर्मा का आपराधिक इतिहास
विक्रम शर्मा को झारखंड के गैंगस्टर अखिलेश सिंह का आपराधिक गुरु माना जाता था। अपराध जगत में विक्रम दिमाग था और अखिलेश उसकी ताकत। विक्रम योजनाकार था, जबकि अखिलेश उन योजनाओं को अंजाम देता था। 2 नवंबर 2007 को साकची आमबागान के पास श्रीलेदर्स के मालिक आशीष डे की हत्या के बाद विक्रम का नाम खुलकर सामने आया। इसके बाद पुलिस का शिकंजा कसता गया और वह भूमिगत हो गया। उसने अखिलेश को गिरोह का चेहरा बनाकर खुद पर्दे के पीछे से संचालन शुरू कर दिया।
2008 का खूनी दौर
2008 में जमशेदपुर में सिलसिलेवार अपराधों ने शहर में दहशत फैला दी थी। टाटा स्टील के सुरक्षा अधिकारी जयराम सिंह की हत्या ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा की हत्या कई कारोबारियों और नेताओं पर फायरिंग पूर्व जज आरपी रवि पर हमला इन घटनाओं के पीछे गुरु-शिष्य की जोड़ी का नाम जुड़ता रहा। विरोध करने वालों को रास्ते से हटाना इस गिरोह की रणनीति बन चुकी थी।
विक्रम शर्मा को अपराध जगत में ‘मैनेजमेंट मास्टर’ कहा जाता था। बताया जाता है कि उसने “थ्री पी” पुलिस, पॉलिटिशियन और प्रेस को साधने की रणनीति अपनाई। 2004 से 2009 के बीच कई स्थानीय स्तर के अफसरों और नेताओं से उसकी निकटता की चर्चा रही। राजनीतिक गलियारों तक उसकी पहुंच बताई जाती थी। झारखंड की राजनीति के बड़े नामों से संपर्क होने की चर्चाएं आम थीं।




