“राजस्व का जश्न और नशा मुक्ति का स्वप्न” — धामी सरकार का आबकारी मॉडल या विरोधाभास का महाकाव्य?

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उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प कथा लिखी जा रही है—एक तरफ सरकार “नशा मुक्त उत्तराखंड” का संकल्प दोहरा रही है, वहीं दूसरी तरफ आबकारी विभाग राजस्व के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में यह “विकास और विरोधाभास” का ऐसा संगम है, जो किसी व्यंग्यकार के लिए सोने की खान से कम नहीं।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
राजस्व की बारिश या नीतियों की फिसलन?
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 2604 करोड़ रुपये का लक्ष्य—और आगे 2693 करोड़ तक पहुंचने की योजना। यह आंकड़े सुनकर वित्त विभाग के चेहरे पर मुस्कान आना स्वाभाविक है। आखिरकार, शराब अब राज्य की अर्थव्यवस्था का “संजीवनी बूटी” बन चुकी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वही उत्तराखंड है, जो देवभूमि कहलाता है? या फिर अब इसे “रेवेन्यू भूमि” कहना ज्यादा उचित होगा?
90% दुकानें खुलीं, 100% नैतिकता बंद?
सरकार गर्व से बता रही है कि 90 प्रतिशत से अधिक मदिरा दुकानों का आवंटन पूरा हो चुका है। उधमसिंह नगर, नैनीताल, हरिद्वार और देहरादून जैसे जिलों में तो 100% उपलब्धि हासिल हो गई है।
यानी जहां पहले विकास की रफ्तार धीमी थी, वहां अब शराब की उपलब्धता ने गति पकड़ ली है।
“हर गांव तक सड़क, बिजली और पानी पहुंचे या नहीं—लेकिन ठेका जरूर पहुंचे”—शायद यही नया “विकास मॉडल” है।
प्रोत्साहन: अच्छा काम या अच्छा कारोबार?
बेहतर प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। अब यह तय करना मुश्किल हो गया है कि “अच्छा काम” किसे कहा जाए—राजस्व बढ़ाना या समाज को नशे से बचाना?
अगर राजस्व बढ़ाना ही पैमाना है, तो फिर नशा मुक्ति अभियान केवल पोस्टर और भाषणों तक सीमित क्यों न रह जाए?
नशा मुक्ति बनाम राजस्व वृद्धि: दो नावों की सवारी
सरकार एक तरफ “नशा मुक्त उत्तराखंड” का सपना दिखाती है, दूसरी तरफ शराब की दुकानों का जाल बिछाती है। यह वैसा ही है जैसे—
“एक हाथ से जहर बांटो, दूसरे हाथ से इलाज का वादा करो।”
विशेषज्ञों की मानें तो बढ़ता हुआ राजस्व विकास कार्यों के लिए जरूरी है। लेकिन क्या यह विकास उस सामाजिक कीमत पर हो रहा है, जहां युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में जा रही है?

धामी सरकार का यह मॉडल अद्भुत है—
जितनी ज्यादा शराब बिकेगी,
उतना ज्यादा राजस्व आएगा,
और उतनी ही मजबूती से “नशा मुक्ति” का नारा भी गूंजेगा।
यानी— “शराब भी हमारी, मुक्ति भी हमारी”
अब देखना यह है कि आने वाले समय में उत्तराखंड “आर्थिक रूप से समृद्ध” ज्यादा बनता है या “सामाजिक रूप से संतुलित”।
आखिरी तंज
अगर यही रफ्तार रही तो जल्द ही सरकार नया स्लोगन ला सकती है—
“हर हाथ में रोजगार नहीं, पर हर गली में ठेका जरूर!”
और तब शायद इतिहास लिखेगा—
उत्तराखंड: जहां नशा मुक्ति का सपना, शराब के सहारे पूरा किया गया।


राजस्व की बारिश या नीतियों की फिसलन?
वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 2604 करोड़ रुपये का लक्ष्य—और आगे 2693 करोड़ तक पहुंचने की योजना। यह आंकड़े सुनकर वित्त विभाग के चेहरे पर मुस्कान आना स्वाभाविक है। आखिरकार, शराब अब राज्य की अर्थव्यवस्था का “संजीवनी बूटी” बन चुकी है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वही उत्तराखंड है, जो देवभूमि कहलाता है? या फिर अब इसे “रेवेन्यू भूमि” कहना ज्यादा उचित होगा?
90% दुकानें खुलीं, 100% नैतिकता बंद?
सरकार गर्व से बता रही है कि 90 प्रतिशत से अधिक मदिरा दुकानों का आवंटन पूरा हो चुका है। उधमसिंह नगर, नैनीताल, हरिद्वार और देहरादून जैसे जिलों में तो 100% उपलब्धि हासिल हो गई है।
यानी जहां पहले विकास की रफ्तार धीमी थी, वहां अब शराब की उपलब्धता ने गति पकड़ ली है।
“हर गांव तक सड़क, बिजली और पानी पहुंचे या नहीं—लेकिन ठेका जरूर पहुंचे”—शायद यही नया “विकास मॉडल” है।
प्रोत्साहन: अच्छा काम या अच्छा कारोबार?
बेहतर प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। अब यह तय करना मुश्किल हो गया है कि “अच्छा काम” किसे कहा जाए—राजस्व बढ़ाना या समाज को नशे से बचाना?
अगर राजस्व बढ़ाना ही पैमाना है, तो फिर नशा मुक्ति अभियान केवल पोस्टर और भाषणों तक सीमित क्यों न रह जाए?
नशा मुक्ति बनाम राजस्व वृद्धि: दो नावों की सवारी
सरकार एक तरफ “नशा मुक्त उत्तराखंड” का सपना दिखाती है, दूसरी तरफ शराब की दुकानों का जाल बिछाती है। यह वैसा ही है जैसे—
“एक हाथ से जहर बांटो, दूसरे हाथ से इलाज का वादा करो।”
विशेषज्ञों की मानें तो बढ़ता हुआ राजस्व विकास कार्यों के लिए जरूरी है। लेकिन क्या यह विकास उस सामाजिक कीमत पर हो रहा है, जहां युवा पीढ़ी नशे की गिरफ्त में जा रही है?

धामी सरकार का यह मॉडल अद्भुत है—
जितनी ज्यादा शराब बिकेगी,
उतना ज्यादा राजस्व आएगा,
और उतनी ही मजबूती से “नशा मुक्ति” का नारा भी गूंजेगा।
यानी— “शराब भी हमारी, मुक्ति भी हमारी”
अब देखना यह है कि आने वाले समय में उत्तराखंड “आर्थिक रूप से समृद्ध” ज्यादा बनता है या “सामाजिक रूप से संतुलित”।
आखिरी तंज
अगर यही रफ्तार रही तो जल्द ही सरकार नया स्लोगन ला सकती है—
“हर हाथ में रोजगार नहीं, पर हर गली में ठेका जरूर!”
और तब शायद इतिहास लिखेगा—
उत्तराखंड: जहां नशा मुक्ति का सपना, शराब के सहारे पूरा किया गया।


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