रुद्रपुर दिनेशपुर के मोतीपुर नंबर एक स्थित श्री कृष्ण मंदिर में निकली भव्य कलश शोभा यात्रा ने जहां पूरे क्षेत्र को भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया, वहीं दूसरी ओर रुद्रपुर में “विजय उत्सव” के राजनीतिक रंग ने माहौल को पूरी तरह अलग दिशा दे दी। एक ओर धर्म, आस्था और सामाजिक एकता का संदेश था, तो दूसरी ओर राजनीति की सक्रियता और शक्ति प्रदर्शन का मंच।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
दिनेशपुर में मंदिर के स्वामी कृष्णानंद ब्रह्मचारी महाराज के सानिध्य में निकली कलश यात्रा में सैकड़ों श्रद्धालु शामिल हुए। महिलाएं सिर पर कलश धारण कर आगे बढ़ रही थीं, जबकि पुरुष और युवा भक्ति गीतों और संकीर्तन के साथ पूरे वातावरण को भक्तिमय बना रहे थे। यात्रा मोतीपुर नंबर एक से शुरू होकर जाफरपुर मार्ग स्थित श्री हरि मंदिर तक पहुंची। यह आयोजन केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता का प्रतीक भी बनकर उभरा। इस अवसर पर पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल की उपस्थिति ने कार्यक्रम को राजनीतिक महत्व भी दे दिया। उन्होंने इसे समाज में भाईचारा और आध्यात्मिक चेतना बढ़ाने वाला आयोजन बताया। साथ ही, सात मई तक चलने वाले अखंड महानाम संकीर्तन में विभिन्न राज्यों की कीर्तन मंडलियों के आने की जानकारी ने आयोजन की व्यापकता को और बढ़ा दिया।
इसके ठीक उलट, रुद्रपुर में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े “विजय उत्सव” का आयोजन राजनीतिक संदेश देने के उद्देश्य से किया जा रहा है। शहीद भगत सिंह मंडल द्वारा महापौर विकास शर्मा के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम में पार्टी की हालिया पश्चिम बंगाल की जीत को ऐतिहासिक बताते हुए जश्न मनाने की तैयारी है। भगत सिंह चौक पर आयोजित इस कार्यक्रम में कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और जनसंपर्क के जरिए राजनीतिक माहौल को मजबूत करने का प्रयास साफ नजर आता है। कार्यक्रम में आकर्षण के तौर पर “झाल मूरी” वितरण जैसे तत्व भी जोड़े गए हैं, जो आम जनता को जोड़ने का एक साधन बनते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम में दिलचस्प बात यह है कि एक ही क्षेत्र में दो अलग-अलग धाराएं समानांतर चल रही हैं। एक ओर राजकुमार ठुकराल धार्मिक आयोजनों के माध्यम से जनसंपर्क और अपनी सामाजिक छवि को मजबूत करते नजर आते हैं, वहीं दूसरी ओर भाजपा के वर्तमान विधायक शिव अरोड़ा और उनके संगठनात्मक तंत्र द्वारा राजनीतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश की जा रही है।
यह द्वंद केवल दो कार्यक्रमों का नहीं, बल्कि दो रणनीतियों का भी है—एक आस्था के माध्यम से जनमानस तक पहुंचने की, और दूसरी राजनीतिक उपलब्धियों के जरिए समर्थन मजबूत करने की। आने वाले 2027 के चुनावी परिदृश्य को देखते हुए यह स्पष्ट संकेत है कि रुद्रपुर और आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक सरगर्मियां अब सामाजिक और धार्मिक मंचों तक भी गहराई से पहुंच चुकी हैं।
अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि जहां एक ओर मंदिरों की घंटियां समाज को जोड़ने का काम कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक मंचों से उठती आवाजें भविष्य की सत्ता की बिसात बिछा रही हैं।

