पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि वो चुनाव नहीं हारी हैं इसलिए इस्तीफ़ा नहीं देंगीउन्होंने मंगलवार को चुनाव हारने के बाद अपनी पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस बीजेपी पर बेईमानी से चुनाव जीतने का आरोप लगाया..

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
वहीं बीजेपी ने कहा है कि संवैधानिक प्रक्रिया में विश्वास करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी बात नहीं कर सकता है.
ममता और बीजेपी क्या बोले?
ममता बनर्जी ने इस्तीफ़े के बारे में कहा, ”मैं क्यों जाऊंगी. हम तो हारे नहीं हैं कि जाएंगे. हार का सुबूत देते तो इस्तीफ़ा देते. ज़ोर-ज़बरदस्ती करके कोई बोले कि इस्तीफ़ा देना होगा तो नहीं. अभी इस्तीफ़ा नहीं दूंगी. मैं ये कहना चाहती हूं कि हम चुनाव नहीं हारे हैं.”
उन्होंने पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी की हार के लिए चुनाव आयोग को ज़िम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग मुख्य विलेन है.
ममता बनर्जी ने कहा, ”पार्टी सदस्यों के साथ आगे की स्ट्रैटजी पर चर्चा की जाएगी. मैं अब बीजेपी के अत्याचारों को और बर्दाश्त नहीं करूंगी. मैं सड़कों पर लौटूंगी.”
वहीं पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने ममता बनर्जी के इस्तीफ़ा न देने वाले बयान पर प्रतिक्रिया दी है.
बीजेपी के प्रवक्ता देबजीत सरकार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “जैसी बातें वो बोल रही हैं, उनसे वो खुद को ही हास्यास्पद बना रही हैं. वो कुछ दिनों तक प्रचार की रोशनी में रहना चाहती हैं, इसलिए वो ऐसी बातें कर रही हैं. इस तरह की हास्यास्पद बातों का कोई उत्तर भारतीय जनता पार्टी या संविधान में विश्वास करने वाली कोई पार्टी नहीं दे सकती.”
उन्होंने कहा, “संवैधानिक प्रक्रिया में विश्वास करने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसी बात नहीं कर सकता है.”
ANI
संविधान क्या कहता है?
संविधान का अनुच्छेद 164 राज्य के मंत्रिपरिषद के गठन और इसमें राज्यपाल की शक्तियों से जुड़ा हुआ है.
हर चुनाव के बाद राज्यपाल विधानसभा में दलों की संख्या का आकलन करते हैं और बहुमत वाली पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं. इसके बाद शपथ ग्रहण होता है.
अगर कोई मंत्री उस सदन का सदस्य नहीं है तो उसे छह महीने के अंदर सदन की सदस्यता लेनी होती है.
अगर मौजूदा मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा नहीं देते हैं, तो राज्यपाल अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए मंत्रिपरिषद को बर्ख़ास्त कर सकते हैं, जिसका हिस्सा मुख्यमंत्री भी होते हैं.
इसके अलावा छह महीने तक सदन की सदस्यता हासिल न करने पर भी राज्यपाल उस मंत्री या मुख्यमंत्री बर्ख़ास्त कर सकते हैं.
इसके अलावा भारतीय संविधान का अनुच्छेद 172 राज्य विधानमंडलों (विधानसभा और विधान परिषद) के कार्यकाल से जुड़ा हुआ है.
इसके मुताबिक़, उस विधानसभा का कार्यकाल पहली बैठक की तारीख़ से पांच वर्ष का होता है. पांच साल का वक़्त पूरा होते ही यह ख़ुद ब ख़ुद भंग हो जाएगी.
अनुच्छेद 172 कहता है, “हर राज्य की विधानसभा यदि पहले ही विघटित नहीं कर दी जाती है तो, अपने प्रथम अधिवेशन के लिए नियत तारीफ़ से पांच वर्ष तक बनी रहेगी, इससे अधिक नहीं. और पांच वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति का परिणाम विधानसभी का विघटन होगा.”
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
MINISTRY OF LAW AND JUSTICE
विधि सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी के सेंटर फ़ॉर कंस्टीट्यूशनल लॉ के प्रमुख स्वप्निल त्रिपाठी टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहते हैं, “हमारे संवैधानिक ढांचे के मुताबिक़, अनुच्छेद 164 के तहत मुख्यमंत्री राज्यपाल की इच्छा पर पद धारण करते हैं लेकिन यह इच्छा व्यक्तिगत नहीं होती, यह इस बात से जुड़ी होती है कि मुख्यमंत्री को विधानसभा का विश्वास हासिल है या नहीं.”
“चुनाव ख़त्म होने और विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद एक नई विधानसभा का गठन होता है, और इसके साथ ही विश्वास का केंद्र नव निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास चला जाता है.”
उन्होंने कहा कि संविधान में ये स्थापित परंपरा है कि निवर्तमान मुख्यमंत्री इस्तीफ़ा देते हैं और नई सरकार के शपथ ग्रहण तक कार्यवाहक मुख्यमंत्री के रूप में कुछ समय के लिए पद पर बने रहते हैं.
स्वप्निल त्रिपाठी ने बताया, “अगर परंपरा का पालन नहीं किया जाता है तो इसके क़ानूनी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता. राज्यपाल अपनी इच्छा वापस ले सकते हैं और नई विधानसभा में बहुमत प्राप्त नेता को आमंत्रित कर सकते हैं. इसलिए इस्तीफ़ा देने से इनकार करना कानून से अधिक राजनीति का मामला है.”
“संविधान ये सुनिश्चित करता है कि जिस मुख्यमंत्री के पास अब बहुमत का समर्थन नहीं है, वह पद पर बने नहीं रह सकता. चुनाव जनादेश को ख़त्म कर देता है. इस्तीफ़ा इसे केवल मान्यता देता है.”
संवैधानिक क़ानून के विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य इंडिया टुडे से कहते हैं कि फ़िलहाल ऐसा कुछ नहीं है जो ममता बनर्जी को पद पर बने रहने की अनुमति देता हो.
उन्होंने कहा, “अगर वह इस्तीफा नहीं भी देती हैं, तब भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. राज्यपाल उनसे अगले मुख्यमंत्री के शपथ लेने तक पद पर बने रहने को कह सकते हैं. लेकिन संवैधानिक प्रावधान कहता है कि कोई सरकार पांच साल से अधिक जारी नहीं रह सकती.”
आचार्य ने कहा कि अगर बनर्जी आज इस्तीफा भी दे दें, तब भी राज्यपाल उनसे नए मुख्यमंत्री के शपथ लेने तक पद पर बने रहने को कहेंगे.
आचार्य कहते हैं, “तकनीकी रूप से उन्हें इस्तीफ़ा देने की जरूरत ही नहीं है. वह भारत के संविधान के प्रावधानों के तहत केवल मौजूदा विधानसभा के कार्यकाल तक ही मुख्यमंत्री रह सकती हैं. उस तारीख़ के बाद वह स्वतः मुख्यमंत्री नहीं रहेंगी.”ममता बनर्जी ने कहा है कि उन्हें हार का सुबूत मिलता तो वो इस्तीफ़ा देतीं ममता बनर्जी
हालांकि भारतीय राजनीति में ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी मुख्यमंत्री ने बढ़ते दबाव या फिर किसी दूसरी वजह से पद छोड़ने से इनकार किया हो. आइए जानते हैं कि इतिहास में ऐसा पहले कब हो चुका है.
अरविंद केजरीवाल का इस्तीफा
सबसे हालिया उदाहरणों में से एक दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का है. 2024 में कथित शराब नीति मामले के सिलसिले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद केजरीवाल ने इस्तीफा ना देने का फैसला किया. आम आदमी पार्टी ने तर्क दिया कि संविधान में ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है जो किसी मौजूदा मुख्यमंत्री को हिरासत में रहते हुए भी अपने पद पर बने रहने से रोकना हो. यह एक कानूनी लेकिन विवादास्पद रुख था.
बिहार में सत्ता संघर्ष
2015 में बिहार में जीतन राम मांझी से जुड़ा एक ऐसा ही राजनीतिक गतिरोध देखने को मिला था. 2014 के लोकसभा चुनावों में JD(U) की हार के बाद नीतीश कुमार ने इस्तीफा देकर जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था. इसके बाद 2015 में नीतीश कुमार वापस मुख्यमंत्री बनना चाहते थे मगर मांझी ने इस्तीफा देने से साफ इनकार कर दिया. इसके बाद उन्हें उन्हीं की पार्टी से निकाल दिया गया. काफी खींचतान के बाद फ्लोर टेस्ट से ठीक पहले उन्होंने 20 फरवरी 2015 को इस्तीफा दे दिया.
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एच डी कुमारस्वामी का मामला
ऐसा ही कुछ मामला 2007 का भी है. यह मामला कर्नाटक में एच डी कुमारस्वामी से जुड़ा है. JD(S) और बीजेपी के बीच हुए सत्ता साझाकरण समझौते के तहत कुमारस्वामी को 20 महीने बाद मुख्यमंत्री का पद B.S.Yediyurappa को सौंपना था. जब वह समय सीमा आई तो उन्होंने सत्ता छोड़ने से साफ इनकार कर दिया. इसके चलते भाजपा ने अपना समर्थन वापस ले लिया. इसका नतीजा यह निकला कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया.
अब ममता बनर्जी वाले मामले में क्या होगा?
संवैधानिक रूप से यह स्थिति राजनीतिक बयानों से कम और संस्थागत समय सीमाओं से ज्यादा नियंत्रित होती है. 17वीं बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 7 मई 2026 को खत्म हो जाएगा. इसके बाद सदन अपने आप ही भंग हो जाएगा. यानी कि इस्तीफा देने या फिर ना देने से कोई फर्क ही नहीं पड़ता. विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होते ही मुख्यमंत्री के तौर पर उनका पद अपने आप समाप्त हो जाएगा और साथ ही नई सरकार का गठन करना अनिवार्य हो जाएगा.

