रुपये में गिरावट और एशियाई मुद्राओं की मजबूती पर बड़ा सवाल
भारत में लगातार गिरते रुपये को लेकर आर्थिक बहस तेज हो गई है। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब एक अमेरिकी डॉलर की कीमत करीब 58.94 रुपये थी। जून 2024 में तीसरे कार्यकाल की शुरुआत तक रुपया 83.38 प्रति डॉलर पहुंच गया और अब दो वर्षों बाद यह लगभग 96 रुपये प्रति डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है। इस तरह मोदी सरकार के 12 वर्षों में भारतीय मुद्रा में करीब 62 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड
हालांकि रुपये में गिरावट का सिलसिला केवल मौजूदा सरकार तक सीमित नहीं रहा। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान भी भारतीय मुद्रा कमजोर हुई थी। लेकिन अब सवाल इसलिए गहरा रहा है क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था तेज़ वृद्धि दर का दावा कर रही है, फिर भी रुपया लगातार दबाव में बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी टैरिफ़ नीतियों, पश्चिम एशिया में तनाव, ऊर्जा संकट और विदेशी निवेश की निकासी ने रुपये पर दबाव बढ़ाया है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने बाजार में हस्तक्षेप कर मुद्रा को संभालने की कोशिश की, लेकिन सीमित राहत ही मिल सकी।
दिलचस्प बात यह है कि इसी दौरान एशिया के कई देशों की मुद्राएं मजबूत हुई हैं।
मलेशिया की मुद्रा रिंगिट में मजबूती दर्ज की गई है। मजबूत विदेशी निवेश, करंट अकाउंट सरप्लस और बेहतर औद्योगिक नीतियों ने वहां की मुद्रा को सहारा दिया। थाईलैंड की मुद्रा बाट भी निर्यात और व्यापार अधिशेष के कारण मजबूत बनी रही।
चीन की मुद्रा युआन भी अमेरिकी डॉलर के मुकाबले मजबूत स्थिति में पहुंची है। वहीं सिंगापुर डॉलर को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात से मजबूती मिली। यहां तक कि पाकिस्तान का रुपया भी हाल के महीनों में अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है।
रुपये में गिरावट का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है। तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स और उर्वरक जैसे आयात महंगे हो जाते हैं, जिससे महंगाई बढ़ती है। विदेशी निवेशक भी कमजोर मुद्रा वाले बाजारों से दूरी बनाने लगते हैं।
हालांकि कमजोर रुपया भारतीय निर्यातकों और विदेशों से पैसा भेजने वाले भारतीय परिवारों के लिए कुछ राहत भी देता है क्योंकि डॉलर के मुकाबले अधिक रुपये प्राप्त होते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भारत दुनिया की तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, तो फिर भारतीय रुपया लगातार कमजोर क्यों हो रहा है, जबकि कई एशियाई देशों की मुद्राएं मजबूत होती जा रही हैं।
— अवतार सिंह बिष्ट
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स
