संपादकीय | आस्था के नाम पर लापरवाही या सत्ता का संरक्षण? बदरी-केदार मंदिर समिति पर उठते सवाल और जवाबदेही का संकट

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उत्तराखंड देवभूमि है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु भगवान के दर्शन के साथ व्यवस्था पर भी भरोसा करता है। लेकिन जब आस्था के केंद्रों पर ही पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठने लगें, तब मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का नहीं रह जाता, बल्कि जनता के विश्वास से जुड़ा विषय बन जाता है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड


बदरी-केदार मंदिर समिति (बीकेटीसी) को लेकर सामने आए टेंपो ट्रैवलर प्रकरण ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। दावा किया जा रहा है कि ज्योतिर्मठ के तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा वृद्ध, दिव्यांग और बीमार श्रद्धालुओं की निःशुल्क सेवा के लिए दान किया गया वाहन वर्षों तक अपने मूल उद्देश्य के लिए उपयोग में नहीं लाया गया। यदि यह आरोप तथ्यात्मक रूप से सही हैं,  दानदाता की भावना और श्रद्धालुओं के अधिकारों की अनदेखी का मामला है।
बदरीनाथ धाम में स्थानीय सार्वजनिक परिवहन की कमी लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। चार किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैले धाम में बुजुर्ग और दिव्यांग श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यदि दान में मिला वाहन वास्तव में जरूरतमंदों की सेवा के बजाय वीआईपी अथवा अन्य प्रशासनिक उपयोग में लगाया गया, तो इसकी निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है।
यह भी आरोप है कि वाहन लंबे समय तक खड़ा-खड़ा निष्प्रयोज्य हो गया और वर्तमान अध्यक्ष द्वारा जानकारी लेने के बाद ही उसे मरम्मत के लिए भेजा गया। दूसरी ओर समिति के मुख्य कार्याधिकारी का कहना है कि वाहन मरम्मत के लिए देहरादून में है और उसका दुरुपयोग नहीं हुआ। इसी प्रकार एंबुलेंस और लैपटॉप गायब होने के आरोपों को भी समिति ने पूरी तरह निराधार बताया है तथा कहा है कि सभी अभिलेख सुरक्षित हैं।
यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित अभिलेख, वाहन के उपयोग का पूरा रिकॉर्ड, लॉगबुक, चालक की ड्यूटी, जीपीएस विवरण तथा सेवा प्राप्त करने वाले श्रद्धालुओं का विवरण सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? और यदि आरोप सही हैं तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
देवस्थानों में आने वाला प्रत्येक दान जनता की आस्था का प्रतीक होता है। उसका उपयोग केवल उसी उद्देश्य के लिए होना चाहिए जिसके लिए वह दिया गया है। यदि किसी दान की वस्तु का उपयोग अलग उद्देश्य से किया जाता है, तो कम से कम उसकी विधिवत अनुमति और पारदर्शी रिकॉर्ड होना चाहिए।
यह मामला केवल बीकेटीसी तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड में कई विभागों पर संसाधनों के दुरुपयोग, कार्यों में देरी और जवाबदेही की कमी के आरोप लगते रहे हैं। सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की बात करती है, लेकिन जब धार्मिक संस्थानों पर सवाल उठते हैं तो जांच की गति अक्सर धीमी दिखाई देती है। इससे जनता के मन में संदेह पैदा होता है।
यदि किसी अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए दान में मिले संसाधनों का उपयोग निर्धारित उद्देश्य से हटकर किया है, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि सार्वजनिक विश्वास के साथ अन्याय माना जाएगा। ऐसे मामलों में स्वतंत्र जांच, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई आवश्यक है।
इस पूरे प्रकरण की सबसे दुखद बात यह है कि जिन वृद्ध, दिव्यांग और बीमार श्रद्धालुओं के लिए यह सुविधा उपलब्ध कराई गई थी, वही उससे वंचित रहे। दूसरी ओर यदि वीआईपी संस्कृति को प्राथमिकता मिली, तो यह समानता के सिद्धांत के भी विपरीत है।
उत्तराखंड सरकार को चाहिए कि वह इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराए। वाहन की खरीद से लेकर वर्तमान स्थिति तक का पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो जनता के सामने तथ्य रखे जाएं। यदि कहीं गड़बड़ी हुई है तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई हो।
देवभूमि की पहचान केवल मंदिरों से नहीं, बल्कि उन मंदिरों की पारदर्शी व्यवस्था से भी होती है। आस्था पर प्रश्नचिह्न लगने देना किसी भी सरकार या संस्था के हित में नहीं है। श्रद्धालुओं का विश्वास सबसे बड़ी पूंजी है और उसकी रक्षा करना सरकार तथा मंदिर समिति दोनों की समान जिम्मेदारी है।


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