उत्तराखंड में SIR के दौरान 1.73 लाख Form-7, 95 हजार से ज्यादा मतदाता ‘अपात्र’ चिह्नित… दूसरी ओर CEC ज्ञानेश कुमार के मेरठ-वाराणसी कार्यक्रम 21 सितंबर को ही स्थगित—क्या महज प्रशासनिक प्रक्रिया है या चुनावी व्यवस्था से जुड़े सवालों का बढ़ता दबाव?
उत्तराखंड,नई दिल्ली। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सामने आए नए आंकड़ों ने बहस को और तेज कर दिया है। चुनाव कार्यालय के मुताबिक प्रदेश में नाम हटाने से संबंधित करीब 1.73 लाख Form-7 आवेदन सामने आए हैं। इनमें 95 हजार से ज्यादा आवेदन ऐसे मतदाताओं से जुड़े हैं, जिन्हें सत्यापन प्रक्रिया के दौरान ‘अपात्र’ श्रेणी में चिह्नित किया गया है। हालांकि चुनाव कार्यालय ने साफ किया है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि इन 95 हजार से ज्यादा मतदाताओं के नाम अंतिम रूप से मतदाता सूची से हट चुके हैं।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल उठता है—अगर 95 हजार से अधिक मतदाताओं को ‘अपात्र’ दर्ज किया गया है, तो क्या इन सभी मामलों की व्यक्तिगत और पर्याप्त जांच हो चुकी है? और जिन मतदाताओं ने निर्धारित समय पर दस्तावेज या सुनवाई में उपस्थिति नहीं दी, उनके लिए अंतिम अवसर की व्यवस्था कितनी प्रभावी होगी?
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
Form-7 का विवाद आखिर क्यों?
चुनाव कार्यालय के अनुसार, SIR के दौरान जब किसी मतदाता को सत्यापन में मांगे गए दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने या सुनवाई में स्वयं अथवा परिवार के किसी सदस्य के माध्यम से उपस्थित नहीं होने के कारण ‘अपात्र’ चिह्नित किया जाता है, तो संबंधित ERO/AERO उसे चुनाव आयोग की ऑनलाइन व्यवस्था में दर्ज करता है। इसके बाद उसी प्रक्रिया में Form-7 तैयार होता है, जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है।
लेकिन सवाल यह है कि Form-7 की इतनी बड़ी संख्या क्या केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का परिणाम है, या इसमें ऐसे मतदाता भी शामिल हो सकते हैं जिन्हें प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं मिल पाई?
चुनाव आयोग का कहना है कि Form-7 की संख्या को अकेले देखकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है। अलग-अलग इलाकों में मतदाता सूची की जांच की सक्रियता के कारण भी आंकड़ों में अंतर हो सकता है।
चार जिलों से 85 प्रतिशत से ज्यादा आवेदन क्यों?
SIR के दौरान पहले सामने आए आंकड़ों के मुताबिक 1,30,382 Form-7 आवेदनों में 85 प्रतिशत से ज्यादा आवेदन केवल चार जिलों—उधम सिंह नगर, हरिद्वार, देहरादून और नैनीताल—से आए थे। अंतिम मतदाता सूची 3 अक्टूबर को प्रकाशित होनी है और दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया 28 सितंबर तक जारी है।
इन चार जिलों में राज्य के बड़े मैदानी और अपेक्षाकृत अधिक आबादी वाले क्षेत्र आते हैं। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर Form-7 की इतनी बड़ी संख्या इन्हीं जिलों में क्यों केंद्रित हुई?
भाजपा की ओर से इसका एक कारण आबादी का पलायन बताया गया है, जबकि कांग्रेस ने जनसांख्यिकीय संरचना को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि निर्वाचन अधिकारियों ने आंकड़ों के आधार पर सीधे राजनीतिक या सामाजिक निष्कर्ष निकालने से सावधान किया है।
3 अक्टूबर के बाद भी नाम जुड़ सकता है
इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 3 अक्टूबर को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित होने के बाद भी पात्र मतदाता नाम जुड़वाने के लिए Form-6 दाखिल कर सकता है। इसके लिए निर्धारित दस्तावेज देने होंगे। यानी अंतिम सूची प्रकाशित होना नाम जुड़वाने की प्रक्रिया का पूर्ण अंत नहीं है।
लेकिन सवाल फिर वही—क्या आम मतदाता को यह जानकारी पर्याप्त रूप से दी जा रही है? क्या जिन लोगों को ‘अपात्र’ दर्ज किया गया है, वे समय रहते अपने अधिकार और अगली प्रक्रिया समझ पाएंगे?
दूसरी तरफ CEC ज्ञानेश कुमार के मेरठ-वाराणसी कार्यक्रम पर सवाल
इसी बीच उत्तर प्रदेश में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मेरठ और वाराणसी के प्रस्तावित कार्यक्रमों के स्थगित होने को लेकर भी सवाल उठे हैं।
मेरठ में 25 सितंबर और वाराणसी में 28 सितंबर को निर्वाचक साक्षरता क्लब यानी ELC 2.0/ECI-Net से जुड़े क्षेत्रीय सम्मेलन तथा युवाओं के साथ संवाद कार्यक्रम प्रस्तावित थे। बाद में दोनों कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए।
शुरुआती खबरों में कार्यक्रम स्थगित होने को लेकर अलग-अलग अटकलें सामने आईं। लेकिन चुनाव आयोग की ओर से अब यह स्पष्ट किया गया है कि दोनों कार्यक्रमों को स्थगित करने का फैसला 21 सितंबर को ही लिया गया था। आयोग के अनुसार, कार्यक्रमों की तारीखों में बदलाव कोई असामान्य बात नहीं है। कार्यक्रम स्थल की उपलब्धता, वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यक्रम, स्थानीय परिस्थितियों और प्राकृतिक परिस्थितियों जैसे कारणों से तारीखों में बदलाव किया जा सकता है।
क्या संयोग है कि SIR विवाद के बीच कार्यक्रम टले?
यही वह बिंदु है जहां सवाल और गहरे होते हैं।
एक तरफ उत्तराखंड में SIR के दौरान 1.73 लाख Form-7 और 95 हजार से अधिक ‘अपात्र’ मतदाताओं का आंकड़ा सामने आया है। दूसरी तरफ चुनाव आयोग के प्रमुख अधिकारी का उत्तर प्रदेश के दो बड़े शहरों में युवाओं से संवाद और चुनावी साक्षरता से जुड़े कार्यक्रम स्थगित हो गए।
क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई संबंध है?
इसका कोई आधिकारिक प्रमाण सामने नहीं आया है। चुनाव आयोग का कहना है कि यूपी के दोनों कार्यक्रमों को 21 सितंबर को ही स्थगित करने का फैसला लिया गया था। इसलिए केवल समय के मेल के आधार पर दोनों घटनाओं को जोड़ना उचित नहीं होगा।
फिर भी सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सार्वजनिक बहस तेज है।
आयोग के सामने सबसे बड़ा सवाल—विश्वास का
मतदाता सूची किसी भी लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी व्यवस्था है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि कितने Form-7 आए और कितने मतदाता ‘अपात्र’ चिह्नित हुए।
असल सवाल यह है—
क्या हर नाम हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी है?
क्या हर मतदाता को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिला?
क्या जिन लोगों को ‘अपात्र’ माना गया, उन्हें समय पर इसकी जानकारी मिली?
चार जिलों में 85 प्रतिशत से अधिक Form-7 आने के पीछे स्थानीय प्रशासनिक कारणों का पूरा विश्लेषण हुआ है?
और क्या 3 अक्टूबर के बाद Form-6 के जरिए नाम जोड़ने की सुविधा आम मतदाता तक प्रभावी ढंग से पहुंच पाएगी?
दूसरी तरफ, CEC ज्ञानेश कुमार के मेरठ और वाराणसी कार्यक्रमों के स्थगन को लेकर भी यही सवाल है कि क्या यह सामान्य प्रशासनिक कार्यक्रम परिवर्तन है, जैसा आयोग कह रहा है, या इसके पीछे कोई अन्य कारण है? उपलब्ध आधिकारिक स्पष्टीकरण के आधार पर फिलहाल किसी अन्य कारण को तथ्य के रूप में स्थापित नहीं किया जा सकता।
उत्तराखंड की अंतिम मतदाता सूची 3 अक्टूबर को सामने आएगी। उससे पहले 28 सितंबर तक दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया जारी है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं।
क्योंकि सवाल केवल 95 हजार ‘अपात्र’ मतदाताओं का नहीं है—सवाल यह है कि अंतिम सूची में कौन रहेगा, कौन बाहर होगा और हर पात्र नागरिक का नाम लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सुरक्षित कैसे रहेगा?
