द्वाराहाट (अल्मोड़ा), 2 अक्टूबर 2026। उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के इतिहास के सबसे पीड़ादायक अध्याय मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा कांड की बरसी पर शुक्रवार को द्वाराहाट में राज्य आंदोलनकारियों ने त्रिमूर्ति चौक पर धरना देकर काला दिवस मनाया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रातः 11 बजे राज्य आंदोलनकारी त्रिमूर्ति चौक पर एकत्र हुए और उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले आंदोलनकारियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
धरना स्थल पर मुजफ्फरनगर रामपुर तिराहा कांड के शहीदों के साथ खटीमा और मसूरी गोलीकांड के बलिदानियों को भी श्रद्धा-सुमन अर्पित किए गए। उपस्थित आंदोलनकारियों ने दो मिनट का मौन रखकर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि दी तथा उनके संघर्ष और बलिदान को याद किया।
अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड
उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास का काला अध्याय
उत्तराखंड राज्य आंदोलन 1994 में अलग पर्वतीय राज्य की मांग को लेकर व्यापक जनआंदोलन के रूप में सामने आया। गांवों से लेकर शहरों तक बड़ी संख्या में महिलाएं, युवा, कर्मचारी, छात्र और आम नागरिक आंदोलन से जुड़े। आंदोलनकारियों की मांग थी कि पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों और विकास की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अलग उत्तराखंड राज्य का गठन किया जाए।
आंदोलन के दौरान 1 सितंबर 1994 को खटीमा में पुलिस गोलीबारी में आंदोलनकारी शहीद हुए। इसके अगले दिन 2 सितंबर 1994 को मसूरी के झूलाघर में गोलीकांड हुआ, जिसमें बेलमती चौहान, हंसा धनाई सहित आंदोलनकारी बलिदान हुए। इन घटनाओं ने आंदोलन को और व्यापक बना दिया। �
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इसके बाद 2 अक्टूबर 1994, गांधी जयंती के दिन, बड़ी संख्या में आंदोलनकारी दिल्ली में प्रस्तावित रैली में शामिल होने के लिए उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से रवाना हुए। मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर आंदोलनकारियों को रोका गया। वहां हुई पुलिस कार्रवाई और गोलीबारी में कई आंदोलनकारी मारे गए और अनेक घायल हुए। उपलब्ध अभिलेखों के अनुसार इस घटना में रविंद्र रावत उर्फ गोलू, सतेंद्र चौहान, गिरीश भदरी, राजेश लखेड़ा, सूर्य प्रकाश थपलियाल, राजेश नेगी और अशोक कुमार सहित आंदोलनकारियों की मृत्यु हुई। �
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रामपुर तिराहा गोलीकांड को लेकर बाद के वर्षों में जांच और अभियोजन की प्रक्रिया भी चली। संसद में दर्ज एक सरकारी उत्तर के अनुसार सीबीआई ने तत्कालीन मुजफ्फरनगर जिलाधिकारी के विरुद्ध अभियोजन की अनुमति मांगी थी, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने अस्वीकार कर दिया था। �
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त्रिमूर्ति चौक पर आंदोलनकारियों ने दोहराया संघर्ष का संकल्प
द्वाराहाट में आयोजित धरने के दौरान राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि उत्तराखंड राज्य का निर्माण हजारों आंदोलनकारियों के संघर्ष, त्याग और बलिदान का परिणाम है। इसलिए राज्य आंदोलन के शहीदों की स्मृति को सुरक्षित रखना और उनके संघर्ष को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना समाज की जिम्मेदारी है।
आंदोलनकारियों ने कहा कि 2 अक्टूबर उनके लिए केवल गांधी जयंती का दिन नहीं, बल्कि उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में एक ऐसी तारीख भी है, जब रामपुर तिराहा पर आंदोलनकारियों के साथ हुई घटना ने पूरे उत्तराखंड को झकझोर दिया था। इसी कारण प्रत्येक वर्ष इस दिन विभिन्न स्थानों पर राज्य आंदोलनकारी शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए काला दिवस मनाते हैं। 2026 में भी प्रदेश के विभिन्न स्थानों पर रामपुर तिराहा कांड के शहीदों को याद करते हुए श्रद्धांजलि और धरने के कार्यक्रम आयोजित किए गए। �
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ये आंदोलनकारी रहे मौजूद
त्रिमूर्ति चौक द्वाराहाट में आयोजित कार्यक्रम में वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी चंदन सिंह नेगी, महेश चंद्र पंत, दान सिंह राणा, गोविंद सिंह अधिकारी, सुरेश लाल शाह, वीरेंद्र सिंह बजेठा, भुवन चौधरी, सुशील कुमार शाह, गोपाल सिंह राणा, गजेंद्र रावत, विपिन चंद्र पंत, जीवन सिंह किरौला, हरि दत्त फुलारा, यूकेडी जिला अध्यक्ष जगदीश रौतेला, नवीन आर्य, वीरेंद्र सिंह रौतेला, परमानंद कांडपाल, महेंद्र सिंह रौतेला, देवेंद्र सिंह बिष्ट, कुंदन सिंह बिष्ट, श्रीमती पदमा देवी और जयंत रौतेला सहित दर्जनों राज्य आंदोलनकारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने शहीदों के चित्रों एवं स्मृति को नमन करते हुए पुष्प अर्पित किए। इसके बाद सभी ने दो मिनट का मौन रखकर उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन के सभी ज्ञात-अज्ञात बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
राज्य आंदोलनकारियों ने कहा कि उत्तराखंड की वर्तमान पीढ़ी को राज्य आंदोलन के इतिहास, खटीमा, मसूरी और रामपुर तिराहा जैसी घटनाओं तथा आंदोलनकारियों के संघर्ष से परिचित कराना जरूरी है। शहीदों का बलिदान उत्तराखंड की राज्य स्थापना की नींव का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
द्वाराहाट का यह कार्यक्रम इसी संकल्प के साथ संपन्न हुआ कि राज्य आंदोलन के शहीदों की स्मृति को जीवित रखा जाएगा और उनके संघर्ष तथा बलिदान की कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाई जाएगी।
