उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चढ़ने लगा है। सभी राजनीतिक दलों की नजरें टिकट बंटवारे के गणित पर टिकी हैं। इसी बीच सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) को लेकर एक बड़ा सियासी अपडेट सामने आया है। सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भाजपा इस बार उत्तर प्रदेश में करीब 100 मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है।

पार्टी द्वारा कराए गए कई राउंड के गोपनीय आंतरिक सर्वे में कई विधायकों का रिपोर्ट कार्ड संतोषजनक नहीं पाया गया है। ऐसे में सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इनकंबेंसी) की काट के लिए भाजपा यूपी में भी अपना बहुचर्चित ‘गुजरात मॉडल’ लागू करने की रूपरेखा तैयार कर रही है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

क्या है भाजपा का ‘गुजरात मॉडल’ और क्यों है चर्चा?

गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर को पूरी तरह खत्म करने के लिए कई मौजूदा मंत्रियों और विधायकों के टिकट काटकर नए व युवा चेहरों को मौका दिया था। यह प्रयोग राजनीतिक रूप से बेहद सफल साबित हुआ था।

उत्तर प्रदेश में लगातार दो बार से सरकार चला रही भाजपा 2027 के महामुकाबले में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। पार्टी का मानना है कि लंबे समय तक पद पर रहने के कारण कुछ विधायकों के प्रति स्थानीय स्तर पर नाराजगी पनप सकती है, जिसे केवल ‘चेहरा बदलकर’ ही निष्प्रभावी किया जा सकता है।

किन विधायकों के टिकटों पर मंडरा रहा है खतरा?

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, करीब 100 विधायकों के टिकट रडार पर हैं। टिकट काटने के मुख्य आधार इस प्रकार हैं:

  • स्थानीय संगठन से टकराव: जिन विधायकों का जिला या ब्लॉक स्तर के संगठन और पदाधिकारियों के साथ तालमेल खराब है।
  • जन आक्रोश व निष्क्रियता: क्षेत्र की जनता के बीच जिनकी उपलब्धता कम रही है और विकास कार्यों को लेकर असंतोष है।
  • गंभीर एंटी-इनकंबेंसी: आंतरिक सर्वे में जिन विधायकों की व्यक्तिगत छवि और जीत की संभावनाओं को कमजोर आंका गया है।
  • कई सिटिंग विधायकों की सीटें बदलने (सीट शिफ्टिंग) पर भी विचार किया जा रहा है।

हारी हुई 50 सीटों पर नए चेहरों और ‘Gen-Z’ पर दांव

मौजूदा विधायकों के टिकट काटने के अलावा, भाजपा की नजर उन सीटों पर भी है जहां उसे 2022 के विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था।

  • 50 सीटों पर बदलाव: 2022 में हारी हुई सीटों में से कम से कम 50 सीटों पर पार्टी अपने पुराने प्रत्याशियों को बदलकर पूरी तरह नए उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की तैयारी में है।
  • युवाओं को प्राथमिकता: पार्टी नई पीढ़ी (Gen-Z) और युवा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए युवा चेहरों को प्राथमिकता देगी, जिससे कैडर में नया उत्साह भरा जा सके।

आरएसएस और कई दौर के सर्वे से तैयार हो रहा है रिपोर्ट कार्ड

टिकट वितरण की यह पूरी प्रक्रिया केवल किसी एक रिपोर्ट पर आधारित नहीं है। भाजपा नेतृत्व इसके लिए त्रिस्तरीय मूल्यांकन प्रणाली अपना रहा है:

  1. पेशेवर सर्वे एजेंसियां: मतदाताओं के बीच गुप्त सर्वे कराकर विधायक की लोकप्रियता और कमजोरियों का डेटा जुटाया जा रहा है।
  2. संगठनात्मक समीक्षा: प्रदेश और क्षेत्रीय प्रभारियों से जमीनी हकीकत का फीडबैक लिया जा रहा है।
  3. आरएसएस (RSS) का इनपुट: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थानीय प्रचारकों और कार्यकर्ताओं से विधायकों के आचरण, छवि और सामाजिक स्वीकार्यता को लेकर स्वतंत्र फीडबैक लिया जा रहा है।

आंतरिक सर्वे से मिले इन अलार्मिंग संकेतों के बाद भाजपा संगठन जल्द ही बड़े नीतिगत और संगठनात्मक बदलावों का खाका पेश कर सकता है, जिससे पार्टी के भीतर टिकट के दावेदारों की धड़कनें तेज हो गई हैं।