Delhi Anti CEC Protest: लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव के जरिए सरकार का चयन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिकों को अपनी बात कहने, सत्ता की नीतियों पर सवाल उठाने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार भी देता है।

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात से तय होती है कि वह अपने आलोचकों के प्रति कितना सहिष्णु व्यवहार करती है तथा असहमति और सुधार की मांग से जुड़ी जनभावना को कितना सम्मान दिया जाता है।

जाहिर है, इस प्रक्रिया में समस्याओं को समझने और संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की जरूरत होती है। मगर, शनिवार को काकरोच जनता पार्टी (काजपा) के विरोध प्रदर्शन से निपटने के लिए देश की राजधानी को जिस तरह सुरक्षाबलों की छावनी में तब्दील किया गया तथा रेल, मेट्रो और इंटरनेट सेवाओं पर सीमित प्रतिबंध लगाए गए, उससे सरकार की नीति और नीयत पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कानून व्यवस्था के लिए एहतियाती कदम उठना जरूरी हो सकता है, लेकिन अत्यधिक सख्ती बरतने को असहमति के स्वर को दबाने के प्रयास के रूप में ही देखा जाएगा। देश का संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताने और अपनी मांगें रखने का अधिकार है। सरकार की नीतियों पर असहमति जताने के लिए पहले भी जनांदोलन होते रहे हैं।

इस बार सवालों के घेरे में हैं मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण और चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। इन्हीं के विरोध में काजपा ने दिल्ली में प्रदर्शन का आह्वान किया था। मगर कानून व्यवस्था बिगड़ने का हवाला देते हुए जितने बड़े पैमाने पर सुरक्षाबलों की तैनाती की गई, प्रदर्शनकारियों को दिल्ली के जंतर मंतर पर पहुंचने से रोकने के लिए जो जतन किए गए और हजारों की संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया, वह सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठता है।

काजपा के प्रमुख नेताओं अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हवाई अड्डे पर विमान के अंदर से ही महिला पुलिस कर्मियों द्वारा हिरासत में लेने की खबरें भी जनमानस को असहज कर रही हैं। प्रश्न यह भी है कि आखिर सरकार को इतनी ज्यादा सख्ती बरतने की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्या यह सब वास्तव में कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंका से किया गया या फिर इसके पीछे कोई और वजह थी!

बड़ी संख्या में रेलगाड़ियों को रद्द किए जाने, मेट्रो के कई स्टेशनों को बंद करने और जगह-जगह वाहनों की जांच से लगे जाम के कारण आम लोगों को जो परेशानी हुई, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इस सवाल का जवाब देने के बजाय सत्तारूढ़ भाजपा यह दावा करके गदगद हो रही है कि दिल्ली को बंधक बनाने के इरादे से किया गया विरोध प्रदर्शन पूरी तरह विफल रहा।

बहरहाल, इस दावे की सच्चाई का पता तो तभी चलता, जब प्रदर्शन की अनुमति दी गई होती, लेकिन सरकार की ओर से काजपा समर्थकों को रोकने के लिए जिस तरह के कदम उठाए गए, उससे दिल्ली जरूर बंधक बनती दिखी। सुरक्षाबलों की सख्ती से विरोध के स्वर को कुछ समय के लिए शांत किया जा सकता है, लेकिन समस्या का स्थायी समाधान संवाद से ही संभव है, जिसकी पहल की संभावना फिलहाल सरकार की ओर से नजर नहीं आ रही है।

इससे पहले इसी मुद्दे पर विपक्ष दल कांग्रेस के नेताओं ने भी चुनाव आयोग से मिलकर अपनी बात रखने की कोशिश की थी और उसके बाद राष्ट्रपति के समक्ष भी मांग रखी, लेकिन अभी तक सवालों का कोई संतोषजनक जवाब सामने नहीं आया है।

रविवार को एक चेन्नई में एक अलग तरह का दृश्य देखने को मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय एक-दूसरे के पास में खड़े थे। इसके बाद दोनों ने हरी झंडी लहराई और फिर साथ में ट्रेन में सवार हुए। यह चेन्नई मेट्रो रेल के दूसरे चरण (फेज-2) के पहले परिचालन खंड की पहली यात्रा थी। इस परियोजना को पूरा होने में छह साल लगे हैं।📰 न्यूज़ और फीचर्ड