पहाड़ों की गोद (विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश) में बसी संस्कृति जितनी प्राकृतिक रूप से सुंदर है, उतनी ही आध्यात्मिक रूप से रहस्यमयी और प्राचीन परंपराओं से जुड़ी हुई है। यहां देवताओं का संबंध केवल मूर्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे ‘जागर’ और देव-अवतरण (पशुआ या डंगरिया के शरीर में देवता का आना) के माध्यम से साक्षात् अपने भक्तों के बीच प्रकट होते हैं।
हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स अवतार सिंह बिष्ट उत्तराखंड | देश-दुनिया की खबरों पर नजर
इस देव-अवतरण के दौरान एक अत्यंत विशिष्ट और विहंगम दृश्य देखने को मिलता है—देवता रूपी व्यक्ति द्वारा बकरे को कंधे पर उठाकर नृत्य करना और उसके बाद होने वाली बलि प्रथा। बाहरी दुनिया के लिए यह केवल एक प्रथा हो सकती है, लेकिन पहाड़ी समाज के लिए यह गहरी आस्था, कृतज्ञता और सामाजिक समरसता का प्रतीक है।
साक्षात् देव-अवतरण और कंधे पर बकरा लेकर नृत्य
जब ढोल-दमाऊ की थाप और भड़ों (धार्मिक गीतों) के आह्वान पर देवता किसी व्यक्ति के शरीर में अवतरित होते हैं, तो उस समय वह व्यक्ति सामान्य मनुष्य नहीं रह जाता। उसे ‘पशुआ’ या ‘डंगरिया’ कहा जाता है।
आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार, जब देवता साक्षात् प्रकट होते हैं, तो वे अपनी अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन करते हुए बलि के लिए लाए गए बकरे (जिसे स्थानीय भाषा में ‘बाकर’ या ‘बोका’ भी कहा जाता है) को अपने कंधों पर उठा लेते हैं। भारी-भरकम बकरे को कंधे पर रखकर अलौकिक ऊर्जा के साथ नाचना इस बात का प्रतीक माना जाता है कि देवता ने उस जीव के कर्मों के बंधन और उसके भीतर के तमस (अंधकार) को अपने नियंत्रण में ले लिया है। यह दृश्य भक्तों में अगाध श्रद्धा और विस्मय पैदा करता है।
बलि प्रथा का आध्यात्मिक और सूक्ष्म पहलू
पहाड़ी परंपराओं में ‘बलि’ को केवल एक जीव की हत्या के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसके पीछे गहरे आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक मायने हैं:
- जीव का उद्धार: मान्यता है कि जब साक्षात् देवता के हाथों या उनकी उपस्थिति में किसी जीव की बलि दी जाती है, तो उस जीव को पशु योनि से मुक्ति मिलती है। देवता अपने स्पर्श से उस जीव का उद्धार कर देते हैं।
- तमोगुण का समर्पण: अध्यात्म की दृष्टि से बकरा (अजा) ‘अज्ञान’ और ‘काम-क्रोध’ जैसी तामसिक प्रवृत्तियों का प्रतीक है। अपने आराध्य के चरणों में उसकी बलि देने का अर्थ है अपने भीतर के अहंकार और अज्ञान को ईश्वर को समर्पित कर देना।
- प्रकृति और देव-ऋण से मुक्ति: पहाड़ों में जीवन बेहद कठिन रहा है। सदियों से लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर या गांव की खुशहाली के लिए देवताओं को यह भेंट चढ़ाते आए हैं, जिसे देव-ऋण चुकाने का एक माध्यम माना जाता है।
सामाजिक समरसता: नाते-रिश्तेदारों का मिलन और महाप्रसाद
बलि के बाद उस मांस को साधारण भोजन नहीं, बल्कि देवता का परम पवित्र ‘प्रसाद’ माना जाता है। इस अनुष्ठान का सामाजिक पहलू भी उतना ही मजबूत है:
- रिश्तों का सुदृढ़ीकरण: इस पावन अवसर पर दूर-दराज रहने वाले नाते-रिश्तेदारों, बेटियों और ध्याणियों (विवाहित बेटियों) को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता है। कई दिनों तक पूरा परिवार और गांव एक सूत्र में बंध जाता है।
- सामूहिक भोज (प्रसाद ग्रहण): देव-प्रसाद के रूप में तैयार किए गए इस मांस को पकाने और बांटने के कड़े नियम होते हैं। इसे अत्यंत शुद्धता के साथ बनाया जाता है और पूरे गांव व मेहमानों में वितरित किया जाता है। माना जाता है कि इस प्रसाद को ग्रहण करने से देवता का आशीर्वाद और सुरक्षा कवच पूरे परिवार को मिलता है।
पहाड़ों की यह देव-परंपरा आस्था, अध्यात्म और सामूहिकता का एक अनूठा संगम है। विज्ञान और आधुनिकता के इस दौर में भी, जब ढोल की थाप पर देवता कंधे पर बकरा उठाकर थिरकते हैं, तो वह क्षण तार्किक बुद्धि से परे विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक साक्षात्कारों और सदियों पुरानी अटूट आस्था का जीवंत प्रमाण बन जाता है। यह परंपरा पहाड़ी समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखने का एक बेहद मजबूत माध्यम है।
