रोडवेज की दुकानों पर बुलडोजर से उपजे आक्रोश से दस्यु सम्राट ददुआ के भाई के हाथों तलवार और सम्मान तक का सफर

पटेल जयंती समारोह में अवतार सिंह बिष्ट का सम्मान, पूर्व सांसद बालकुमार पटेल ने सुनाई ददुआ की कहानी; सामाजिक अन्याय, गरीबों की पीड़ा और इंसाफ की तलाश पर भावुक हुआ मन

रोडवेज की दुकानों पर बुलडोजर से उपजे आक्रोश से दस्यु सम्राट ददुआ के भाई के हाथों तलवार और सम्मान तक का सफर

पटेल जयंती समारोह में अवतार सिंह बिष्ट का सम्मान, पूर्व सांसद बालकुमार पटेल ने सुनाई ददुआ की कहानी; सामाजिक अन्याय, गरीबों की पीड़ा और इंसाफ की तलाश पर भावुक हुआ मन

अवतार सिंह बिष्ट की आत्मकथा के अंश | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर

रुद्रपुर, ऊधम सिंह नगर। जिंदगी में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जब व्यक्ति के भीतर वर्षों से दबा आक्रोश, संघर्ष और आत्मसम्मान एक साथ सामने आ जाते हैं। कुछ घटनाएं मन में सवाल पैदा करती हैं और कुछ सम्मान ऐसे होते हैं, जो उन सवालों को एक नई दिशा देने का काम करते हैं। मेरे जीवन में भी एक ऐसा ही भावुक क्षण आया, जब रुद्रपुर के अंबेडकर पार्क में आयोजित भाईचारा एकता मंच के सातवें वार्षिक उत्सव एवं पटेल जयंती सम्मान समारोह में मुझे तलवार और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। यह सम्मान मिर्जापुर के पूर्व सांसद बालकुमार पटेल के हाथों मिला, जो दस्यु सम्राट के नाम से चर्चित रहे ददुआ के भाई हैं।

यह मेरे लिए केवल एक सार्वजनिक सम्मान नहीं था। इसके पीछे रुद्रपुर के रोडवेज परिसर के सामने दुकानों पर चले बुलडोजर की घटना, उससे उपजा मन का आक्रोश, गरीब और कमजोर लोगों के अधिकारों को लेकर उठने वाले सवाल और समाज में न्याय की अपेक्षा से जुड़ी भावनाएं भी थीं।

रोडवेज की दुकानों पर बुलडोजर और मन में उठते सवाल

रुद्रपुर में रोडवेज के सामने स्थित दुकानों पर जब बुलडोजर चला, तब उस कार्रवाई ने मेरे मन को भीतर तक झकझोर दिया। किसी भी शहर में अतिक्रमण हटाना प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। कानून का पालन भी आवश्यक है। लेकिन जब ऐसी कार्रवाई होती है, तो आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कार्रवाई के मानदंड सभी के लिए समान हैं? क्या छोटे दुकानदारों की आजीविका, उनकी वर्षों की मेहनत और उनके परिवारों के भविष्य पर भी उतना ही विचार किया जाता है, जितना किसी बड़ी संपत्ति या प्रभावशाली व्यक्ति के मामले में किया जाता है?

जब किसी छोटे दुकानदार की दुकान उजड़ती है, तो केवल ईंट, पत्थर और टीन की छत नहीं टूटती। उसके परिवार की रोजी-रोटी, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की उम्मीदें भी प्रभावित होती हैं।

रोडवेज के सामने दुकानों पर बुलडोजर चलने की घटना के बाद मेरे मन में भी बदले की भावना जैसी तीखी प्रतिक्रिया पैदा हुई। यह उस व्यक्ति की स्वाभाविक पीड़ा थी, जो अपने आसपास अन्याय महसूस करता है। लेकिन समय के साथ मैंने यह भी समझा कि व्यक्तिगत आक्रोश को किस दिशा में ले जाना है, यह निर्णय बहुत महत्वपूर्ण होता है। विरोध करना और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उस विरोध को कानून, जनसंवाद, पत्रकारिता और सामाजिक संघर्ष के रास्ते पर आगे बढ़ाना अधिक सार्थक है।

मेरे लिए यह घटना एक ऐसी स्मृति बन गई, जिसने गरीबों, छोटे कारोबारियों और आम लोगों के सम्मान से जुड़े प्रश्नों को और गहरा कर दिया।

कौन थे दस्यु सम्राट ददुआ?

ददुआ का नाम उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड और चित्रकूट क्षेत्र की उस कहानी से जुड़ा है, जिसमें जंगल, बीहड़, जातीय समीकरण, ग्रामीण सत्ता संघर्ष, अपराध और राजनीति की परस्पर उलझी हुई दुनिया दिखाई देती है। ददुआ का वास्तविक नाम शिव कुमार पटेल बताया जाता है। वह लंबे समय तक उत्तर प्रदेश के चित्रकूट और आसपास के इलाकों में सक्रिय रहा। उसके जीवन और गतिविधियों को लेकर अनेक कहानियां प्रचलित रहीं। पुलिस रिकॉर्ड और सार्वजनिक चर्चाओं में उसका नाम गंभीर आपराधिक मामलों से भी जुड़ा रहा।

ददुआ की कहानी को केवल एक व्यक्ति की कहानी मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे उस समय के ग्रामीण समाज की परिस्थितियां, स्थानीय प्रभावशाली लोगों से टकराव, जातीय तनाव, सत्ता के समीकरण और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां भी चर्चा का हिस्सा रही हैं। हालांकि किसी व्यक्ति के अपराधों को केवल सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यह समझना जरूरी है कि कुछ क्षेत्रों में अपराधियों के प्रति स्थानीय समर्थन किन कारणों से पैदा होता है।

समाज के कुछ दबे-कुचले लोग कभी-कभी ऐसे व्यक्तियों को अपना रक्षक या मसीहा समझने लगते हैं, जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वे प्रभावशाली लोगों को चुनौती देते हैं। यह धारणा हमेशा वास्तविकता की पूरी तस्वीर नहीं होती। भय, स्थानीय सत्ता संघर्ष, व्यक्तिगत अनुभव और सामाजिक असमानताएं भी ऐसी छवि बनाने में भूमिका निभा सकती हैं।

ददुआ के मामले में भी उसके समर्थकों और विरोधियों की धारणाएं अलग-अलग रही हैं। जहां एक ओर उसका नाम अपराध और हिंसा से जुड़ा रहा, वहीं दूसरी ओर कुछ क्षेत्रों में उसके प्रति स्थानीय श्रद्धा और लोककथाओं जैसी छवियां भी बनीं। यह विरोधाभास बताता है कि समाज में न्याय की मांग और कानून से बाहर जाकर न्याय करने के दावे के बीच कितना जटिल संबंध हो सकता है।

ददुआ के भाई पूर्व सांसद बालकुमार पटेल से मुलाकात

पटेल जयंती सम्मान समारोह में मिर्जापुर के पूर्व सांसद बालकुमार पटेल की उपस्थिति मेरे लिए विशेष महत्व रखती थी। वह ददुआ के भाई हैं और सार्वजनिक जीवन में अपनी अलग पहचान रखते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका नाम समाजवादी पार्टी से जुड़े राजनीतिक सफर और मिर्जापुर संसदीय क्षेत्र के प्रतिनिधित्व के कारण जाना जाता है।

पूर्व सांसद बालकुमार पटेल से मुलाकात के दौरान ददुआ के जीवन से जुड़ी बातें सुनने का अवसर मिला। उन्होंने अपने भाई की कहानी और उससे जुड़े अनुभवों को साझा किया। उनके वर्णन में उस दौर की परिस्थितियों, ददुआ के जीवन से जुड़ी घटनाओं और उसके आसपास बनी सामाजिक छवि के अनेक पहलू सामने आए।

किसी चर्चित व्यक्ति के परिवार के सदस्य से उसकी जिंदगी के बारे में सुनना एक अलग अनुभव होता है। इससे घटनाओं को एक पारिवारिक और सामाजिक दृष्टिकोण से समझने का अवसर मिलता है। हालांकि किसी भी व्यक्ति के जीवन का पूरा मूल्यांकन करने के लिए इतिहास, दस्तावेजों, प्रत्यक्ष अनुभवों और विभिन्न पक्षों को समझना जरूरी होता है।

ददुआ की कहानी सुनते समय मेरे मन में बार-बार यही विचार आया कि आखिर समाज में ऐसी परिस्थितियां क्यों बनती हैं, जब कुछ लोग कानून और व्यवस्था से निराश होकर किसी बाहुबली या अपराधी को अपना सहारा समझने लगते हैं। क्या यह व्यवस्था से उनकी शिकायतों का संकेत है? क्या यह स्थानीय स्तर पर न्याय और सुरक्षा की कमी की अनुभूति है? इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

अपराध की दुनिया से लोकश्रद्धा तक का विरोधाभास

ददुआ के नाम से जुड़ी लोककथाओं और उसके प्रति कुछ क्षेत्रों में दिखाई देने वाली श्रद्धा की चर्चाएं भी सुनने को मिलती हैं। कुछ स्थानों पर उससे जुड़ी स्मृतियों और आस्था के केंद्रों का उल्लेख किया जाता है। हालांकि किसी विशेष मंदिर, उसकी स्थापना या वहां होने वाली गतिविधियों के बारे में अलग से प्रमाणित जानकारी आवश्यक है।

यह बात अपने आप में विचारणीय है कि जिन व्यक्तियों का जीवन अपराध और हिंसा से जुड़ा रहा, उनके प्रति समाज का एक हिस्सा कभी-कभी श्रद्धा क्यों व्यक्त करने लगता है। संभव है कि स्थानीय लोगों की स्मृतियों में किसी व्यक्ति की छवि अलग-अलग अनुभवों के आधार पर बनी हो। कहीं उसे विरोध का प्रतीक समझा गया हो, तो कहीं उसके नाम से भय जुड़ा रहा हो।

लेकिन एक बात स्पष्ट होनी चाहिए—गरीबों के अधिकारों की रक्षा करना, अन्याय के खिलाफ खड़ा होना और कमजोर व्यक्ति को न्याय दिलाना समाज तथा शासन की जिम्मेदारी है। इसके लिए हिंसा या अपराध का रास्ता आवश्यक नहीं है। वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है, जब कानून निष्पक्ष हो, प्रशासन जवाबदेह हो और प्रत्येक नागरिक को न्याय पाने का समान अवसर मिले।

मेरे विचार में ददुआ की कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि यह हमें समाज में न्याय, समानता और भरोसे की आवश्यकता पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। किसी अपराधी का महिमामंडन करने के बजाय हमें उन परिस्थितियों को समझना चाहिए, जिनमें लोग वैकल्पिक शक्ति केंद्रों की ओर देखने लगते हैं।

तलवार और स्मृति चिह्न से सम्मान: मेरे लिए भावुक क्षण

भाईचारा एकता मंच के सातवें वार्षिक उत्सव एवं पटेल जयंती सम्मान समारोह में जब पूर्व सांसद बालकुमार पटेल ने मुझे तलवार और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया, तो मेरे लिए वह क्षण विशेष भावनाओं से भरा हुआ था।

तलवार को मैंने किसी हिंसक प्रतिशोध के प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, साहस और अन्याय के सामने न झुकने के संकल्प के प्रतीक के रूप में देखा। यह सम्मान मेरे मन में उस पीड़ा से भी जुड़ गया, जो रोडवेज के सामने दुकानों पर बुलडोजर चलने के बाद पैदा हुई थी।

मुझे लगा कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों के बीच बैठकर अपनी बात रखना, अपनी पीड़ा को शब्द देना और सामाजिक सम्मान प्राप्त करना स्वयं में महत्वपूर्ण है। यदि किसी घटना से मन में आक्रोश पैदा होता है, तो उसे रचनात्मक संघर्ष में बदलना चाहिए। यदि किसी गरीब का रोजगार प्रभावित होता है, तो उसकी आवाज उठानी चाहिए। यदि प्रशासन कोई कार्रवाई करता है, तो उसके कानूनी आधार और निष्पक्षता पर सवाल पूछे जा सकते हैं।

पत्रकारिता का उद्देश्य भी यही होना चाहिए कि वह सत्ता और समाज के बीच आम आदमी की आवाज बने। पत्रकार का दायित्व किसी व्यक्ति के प्रति अंधसमर्थन या अंधविरोध करना नहीं, बल्कि तथ्यों के आधार पर सवाल उठाना और जनता के सरोकारों को सामने लाना है।

पूर्व सांसद बालकुमार पटेल के हाथों मिला यह सम्मान मेरे लिए इस विचार को और मजबूत करने वाला क्षण बना। मेरे लिए तलवार और स्मृति चिह्न केवल समारोह की भेंट नहीं थे, बल्कि आत्मसम्मान, सामाजिक जिम्मेदारी और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता की याद दिलाने वाले प्रतीक थे।

पटेल जयंती पर एकता और सामाजिक सम्मान का संदेश

भाईचारा एकता मंच (रजि.) एवं भाईचारा एकता मंच ट्रस्ट की ओर से रुद्रपुर के अंबेडकर पार्क में आयोजित सातवें वार्षिक उत्सव एवं पटेल जयंती सम्मान समारोह का उद्देश्य समाज में एकता, भाईचारे, सम्मान और संगठन की भावना को मजबूत करना रहा।

सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश की एकता और अखंडता के लिए ऐतिहासिक योगदान दिया। उनके जीवन से प्रेरणा लेते हुए सामाजिक संगठनों को भी आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर समाज के विकास, शिक्षा, रोजगार, समान अवसर और कमजोर वर्गों के सम्मान के लिए काम करना चाहिए।

समारोह में देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्र के व्यक्तित्वों की मौजूदगी ने आयोजन को व्यापक स्वरूप दिया। ऐसे आयोजन समाज के लोगों को एक मंच पर लाने, अनुभव साझा करने और सामाजिक समस्याओं पर विचार करने का अवसर प्रदान करते हैं।

भाईचारा एकता मंच के केंद्रीय अध्यक्ष के.पी. गंगवार और केंद्रीय सचिव काजल गंगवार सहित आयोजन से जुड़े पदाधिकारियों ने कार्यक्रम के संचालन और व्यवस्थाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंच की ओर से समाज में आपसी सहयोग और संगठनात्मक एकजुटता बढ़ाने का संदेश दिया गया।

समारोह में उपस्थित प्रमुख अतिथि और सम्मानित व्यक्तित्व

कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के पूर्व सांसद बालकुमार पटेल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। कुर्मी धाम अयोध्या की संरक्षक मां भारती साध्वी डॉ. रेखा गुर्जर भी मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थीं।

विशिष्ट अतिथियों में कथावाचक एवं ज्योतिषाचार्य देवी सौम्या सरस्वती सचान, कुर्मी धाम अयोध्या के अध्यक्ष अजय कुमार वर्मा, महाराष्ट्र के कुर्मी एवं किसान नेता एम.सी. पाटिल, फिल्म निर्माता एवं निर्देशक तथा मिसेज इंडिया 2022 राजश्री वर्मा और कांग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष हिमांशु गाबा के नाम शामिल रहे। रुद्रपुर के पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल को अति विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।

भाईचारा एकता मंच के केंद्रीय अध्यक्ष के.पी. गंगवार को कुर्मी रत्न सम्मान प्रदान किए जाने का कार्यक्रम भी आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में शामिल था। मंच के पदाधिकारियों और सदस्यों ने सामाजिक एकता तथा संगठन के विस्तार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।

आयोजन से जुड़े अन्य पदाधिकारियों में स्वामी आधार श्रीवास्तव, शिखा गुप्ता और सुमन पंत सहित मंच के अनेक सदस्य शामिल रहे। समारोह में उपस्थित लोगों ने सामाजिक समरसता, आपसी सहयोग और समाज के प्रतिभाशाली व्यक्तियों के सम्मान की भावना को आगे बढ़ाने का संदेश दिया।

नोट: उपर्युक्त अतिथियों के नाम आयोजन संबंधी उपलब्ध विवरण के आधार पर शामिल किए गए हैं। सभी आमंत्रित व्यक्तियों की वास्तविक उपस्थिति की पुष्टि अलग से की जानी चाहिए।

मेरा संकल्प: बदले की भावना नहीं, न्याय की आवाज

रोडवेज के सामने दुकानों पर बुलडोजर चलने की घटना ने मेरे मन में जो सवाल पैदा किए, वे आज भी प्रासंगिक हैं। किसी भी सरकार, प्रशासन या जनप्रतिनिधि के लिए यह आवश्यक है कि वह आम नागरिक की पीड़ा को समझे। कानून का पालन होना चाहिए, लेकिन कानून का पालन निष्पक्षता और मानवीय संवेदनशीलता के साथ भी होना चाहिए।

जब गरीब की दुकान हटाई जाए, तो उसके पुनर्वास और आजीविका के सवाल पर भी विचार होना चाहिए। जब किसी प्रभावशाली व्यक्ति के मामले में कार्रवाई हो, तो वहां भी वही कानूनी मानदंड लागू होने चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि कानून के सामने हर नागरिक समान हो।

ददुआ की कहानी सुनने और उनके भाई पूर्व सांसद बालकुमार पटेल के हाथों सम्मान पाने के बाद मेरे मन में यही विचार और स्पष्ट हुआ कि अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने के अनेक रास्ते हैं। पत्रकारिता, जनआंदोलन, लोकतांत्रिक विरोध, न्यायालय और सामाजिक संगठन—ये सभी ऐसे माध्यम हैं, जिनके जरिए आम आदमी अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ सकता है।

मेरे लिए तलवार का सम्मान हिंसा का आह्वान नहीं, बल्कि अन्याय के सामने आत्मसम्मान बनाए रखने का प्रतीक है। मैं चाहता हूं कि किसी भी गरीब, मजदूर, दुकानदार या कमजोर परिवार को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किसी अपराधी या बाहुबली की ओर देखने की जरूरत न पड़े। उसे विश्वास हो कि कानून, प्रशासन और समाज उसके साथ खड़े हैं।

यही सरदार पटेल की एकता की भावना का सार है और यही भाईचारा एकता मंच जैसे सामाजिक संगठनों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता भी होना चाहिए।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड

पत्रकारिता, सामाजिक सरोकार और आम आदमी के सम्मान के प्रति समर्पित।