

अंकिता भंडारी हत्याकांड आज केवल एक जघन्य अपराध भर नहीं रह गया है, बल्कि यह उत्तराखंड की न्याय-व्यवस्था, राजनीतिक संरक्षण और तथाकथित वीआईपी संस्कृति पर एक कठोर प्रश्नचिह्न बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में रुद्रपुर की शैल परिषद ने वह जिम्मेदारी उठाई है, जो दरअसल सत्ता, प्रशासन और व्यवस्था को उठानी चाहिए थी।
शैल परिषद की बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि रविवार, 4 जनवरी 2026 को शाम 5:30 बजे, दक्ष चौराहा से गोलज्यु मंदिर तक एक कैंडल मार्च निकाला जाएगा। यह मार्च केवल मोमबत्तियों की कतार नहीं होगा, बल्कि न्याय के देवता गोलज्यु महाराज के दरबार में एक सामूहिक गुहार होगी—कि अंकिता को न्याय मिले, उसके परिवार को सच्चाई का अधिकार मिले और अपराध के पीछे छिपे हर चेहरे से नकाब हटे।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड)
यह महत्वपूर्ण है कि इस कैंडल मार्च को आसपास की कॉलोनियों का स्वतःस्फूर्त समर्थन मिला है। यह संकेत है कि जनमानस अब केवल खबरें पढ़कर या सोशल मीडिया पर आक्रोश जताकर संतुष्ट नहीं है। लोग सड़कों पर उतरकर यह पूछना चाहते हैं—अंकिता के हत्यारे तो जेल में हैं, लेकिन असली गुनहगार कौन हैं? वे वीआईपी कौन हैं जिनका नाम आते ही जांच की गति थम जाती है?
शैल परिषद के अध्यक्ष गोपाल सिंह पटवाल ने हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स को दिए अपने बयान में स्पष्ट कहा है कि यह कैंडल मार्च केवल रुद्रपुर या ऊधम सिंह नगर तक सीमित नहीं रहेगा। यह आंदोलन पूरे कुमाऊं क्षेत्र में जन आंदोलन का रूप ले रहा है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है—“यह तो शुरुआत है। जरूरत पड़ी तो सड़क से लेकर सदन तक संघर्ष होगा।”
यह कथन किसी उकसावे का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार के प्रयोग का ऐलान है।
सबसे गंभीर सवाल आज भी अनुत्तरित है—अंकिता भंडारी के मामले में ‘वीआईपी’ कौन है?
ऑडियो की चर्चाएं सार्वजनिक हैं, पर संज्ञान अधूरा है। जिन आवाज़ों ने साहस दिखाया, उनमें उर्मिला राठौर का नाम सामने आया। सवाल यह है कि आज वह कहां हैं? उनका पूरा ऑडियो, उसका संदर्भ और उसकी जांच आखिर क्यों सार्वजनिक नहीं की जा रही? क्या सच बोलना उत्तराखंड में अपराध बन चुका है?
यह मामला केवल एक बेटी की हत्या का नहीं है, यह उस तंत्र का आइना है जिसमें रसूखदारों के लिए अलग कानून और आम नागरिक के लिए अलग। जब तक वीआईपी संरक्षण की परतें नहीं उतरेंगी, तब तक “न्याय मिला” जैसे दावे खोखले ही रहेंगे।
शैल परिषद का यह आह्वान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्याय को देवता के दरबार से लेकर जन अदालत तक ले जाने की कोशिश है। यह संदेश साफ है—अगर व्यवस्था नहीं जागेगी, तो समाज जगाएगा।
आज जरूरत है कि हर संवेदनशील नागरिक इस कैंडल मार्च का हिस्सा बने। यह अंकिता के लिए है, लेकिन उतना ही हर उस बेटी के लिए भी, जो व्यवस्था की चुप्पी की भेंट चढ़ जाती है।
मोमबत्ती की लौ छोटी होती है, पर अंधकार को चुनौती देने का साहस उसी में होता है।




