धामी सरकार से सवाल: क्या राज्य आंदोलनकारियों को 10% क्षैतिज आरक्षण सिर्फ कागज़ी लॉलीपॉप?

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रुद्रपुर,उत्तराखंड की अस्मिता, अस्तित्व और अलग पहचान के लिए जिन लोगों ने सड़कों पर संघर्ष किया, लाठियां खाईं, जेल गए और अपने भविष्य को दांव पर लगाया—उन्हीं राज्य आंदोलनकारियों और उनके आश्रितों को आज सरकारी नियुक्तियों के दरवाज़े पर खड़ा कर दिया गया है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)


“उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन के चिन्हित आन्दोलनकारियों या उनके आश्रितों को राजकीय सेवा में आरक्षण अधिनियम, 2023” को अगस्त 2024 में राज्यपाल की मंजूरी मिल चुकी है। इस कानून के तहत सरकारी नौकरियों में 10% क्षैतिज आरक्षण का स्पष्ट प्रावधान है। इसे ऐतिहासिक निर्णय बताया गया। लेकिन अब सवाल यह है—क्या यह ऐतिहासिक निर्णय ज़मीन पर भी ऐतिहासिक है, या सिर्फ़ सुर्खियों का एक राजनीतिक लॉलीपॉप?
कानून बना, पर नियुक्ति नहीं
हाल के कनिष्ठ सहायक भर्ती और पुलिस कांस्टेबल भर्ती में कई राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों को नियुक्ति नहीं दी गई। चयन प्रक्रिया संचालित करने वाली संस्था उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग (UKSSSC) का कहना है कि “आश्रित प्रमाण पत्र” भर्ती विज्ञापन की अंतिम तिथि के बाद बना है, इसलिए लाभ नहीं दिया जा सकता।
यह तर्क पहली नज़र में तकनीकी लगता है, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है। शासन स्तर पर आश्रित प्रमाण पत्रों का निर्गमन भर्ती प्रक्रिया के बाद शुरू हुआ। जब स्वयं सरकार ने प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया देर से प्रारंभ की, तो अभ्यर्थियों की क्या गलती?
क्या सरकार अपने ही प्रशासनिक विलंब का खामियाजा आंदोलनकारियों के बच्चों को भुगतने देगी?
10% क्षैतिज आरक्षण: अधिकार या दिखावा?
10% क्षैतिज आरक्षण का अर्थ यह है कि यह सभी वर्गों—सामान्य, ओबीसी, एससी, एसटी—में लागू होता है। यानी यह कोई अतिरिक्त बोझ नहीं, बल्कि न्यायसंगत प्राथमिकता है। यह उन लोगों का हक़ है जिन्होंने राज्य निर्माण के लिए बलिदान दिया।
लेकिन जब नियुक्ति देने की बारी आती है, तो फाइलें कार्मिक विभाग और आयोग के बीच घूमने लगती हैं। आयोग कहता है कि वह कार्मिक विभाग से पत्राचार कर रहा है। कार्मिक विभाग चुप है। और आंदोलनकारी परिवार इंतज़ार में हैं।
क्या यही है राज्य आंदोलन के प्रति संवेदनशीलता?
मुख्यमंत्री की नैतिक जिम्मेदारी
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अक्सर अपने भाषणों में राज्य आंदोलनकारियों का सम्मान करने की बात कहते हैं। मंचों से उन्हें “राज्य की आत्मा” बताया जाता है। लेकिन जब वही आत्मा नौकरी के लिए दस्तक देती है, तो उसे तकनीकी खामियों के नाम पर लौटा दिया जाता है।
मुख्यमंत्री कार्यालय को ज्ञापन सौंपे जा चुके हैं। मांग केवल इतनी है कि भर्ती प्रक्रिया में उन अभ्यर्थियों को न्याय मिले जिनके आश्रित प्रमाण पत्र शासन की देरी से बने। यदि अधिनियम लागू है, तो उसका लाभ प्रभावी तिथि से मिलना चाहिए।
सरकार चाहे तो एक स्पष्ट शासनादेश जारी कर सकती है—कि जिन अभ्यर्थियों का आश्रित प्रमाण पत्र भर्ती की प्रक्रिया के दौरान या बाद में शासन स्तर की देरी से बना, उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जाए। क्या यह इतना कठिन है?
आंदोलनकारियों का अस्तित्व संकट में
उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल एक राजनीतिक अभियान नहीं था; यह जनआंदोलन था। खटीमा, मसूरी, रामपुर तिराहा—इन घटनाओं ने राज्य की नींव रखी। उन संघर्षों की स्मृति आज भी जिंदा है।
लेकिन यदि आज उन्हीं परिवारों को नियुक्ति से वंचित किया जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि नैतिक अन्याय है। इससे यह संदेश जाता है कि आंदोलनकारियों का उपयोग सत्ता तक पहुंचने के लिए किया गया, और सत्ता मिलने के बाद उन्हें भुला दिया गया।
क्या यह “सम्मान” है या “छलावा”?
आयोग बनाम शासन: जिम्मेदार कौन?
उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग का तर्क है कि वह नियमों से बंधा है। लेकिन नियमों की व्याख्या और संशोधन का अधिकार शासन के पास है। यदि कानून स्पष्ट है, तो उसके अनुपालन में बाधा क्यों?
कार्मिक विभाग के सचिव स्तर पर इस मुद्दे को तत्काल प्राथमिकता से हल किया जा सकता है। एक स्पष्ट आदेश से यह विवाद समाप्त हो सकता है। लेकिन प्रश्न यह है—क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति है?
युवा पीढ़ी में बढ़ता आक्रोश
राज्य आंदोलनकारियों के आश्रित आज युवा हैं। उन्होंने पढ़ाई की, प्रतियोगी परीक्षाएं दीं और चयन प्रक्रिया में शामिल हुए। जब उन्हें बताया जाता है कि उनका प्रमाण पत्र “लेट” है—जबकि वह शासन की देरी से बना—तो स्वाभाविक है कि उनमें आक्रोश पैदा होगा।
यह आक्रोश केवल नौकरी का नहीं, बल्कि सम्मान का है। यदि 10% आरक्षण केवल कागज़ पर रहेगा, तो यह भविष्य में किसी भी जनआंदोलन के प्रति युवाओं का विश्वास कम करेगा।
सरकार के लिए परीक्षा की घड़ी
धामी सरकार के लिए यह एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। क्या वह तकनीकी बहानों के पीछे छिपेगी, या नैतिक साहस दिखाएगी?
समाधान स्पष्ट है:
जिन अभ्यर्थियों के आश्रित प्रमाण पत्र शासन की देरी से बने, उन्हें आरक्षण का लाभ दिया जाए।
भविष्य की सभी भर्तियों में अधिनियम का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
लंबित चिन्हीकरण प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए।

उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी सम्मान परिषद के उपाध्यक्ष, जिन्हें राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त है, आज सीधे सवालों के घेरे में हैं। जब 10% क्षैतिज आरक्षण का लाभ कनिष्ठ सहायक और पुलिस कांस्टेबल भर्तियों में नहीं मिल रहा, तो वे सरकार से ठोस वार्ता क्यों नहीं कर रहे? आंदोलनकारियों के आश्रित नियुक्ति से वंचित हैं, आयोग पत्राचार की बात कर रहा है, और शासन चुप है। ऐसे में परिषद का दायित्व केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं हो सकता। यदि सम्मान परिषद वास्तव में आंदोलनकारियों की प्रतिनिधि है, तो उसे तत्काल मुख्यमंत्री और कार्मिक विभाग से निर्णायक वार्ता कर समाधान सुनिश्चित करना चाहिए।

सम्मान शब्दों से नहीं, निर्णयों से
उत्तराखंड का निर्माण संघर्ष और बलिदान की कहानी है। यदि राज्य आंदोलनकारियों के आश्रितों को नियुक्ति से वंचित किया जाता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य की आत्मा पर प्रश्नचिन्ह है।
सरकार को यह तय करना होगा—क्या 10% क्षैतिज आरक्षण वास्तविक प्राथमिकता है या केवल राजनीतिक घोषणा?
यदि न्याय नहीं मिला, तो यह सवाल बार-बार उठेगा:
क्या धामी सरकार ने राज्य आंदोलनकारियों को सम्मान दिया, या सिर्फ़ चुनावी वादों का लॉलीपॉप थमाया?
अब गेंद सरकार के पाले में है। सम्मान की रक्षा कीजिए—क्योंकि आंदोलनकारियों का इतिहास बहुत लंबा है, और स्मृति उससे भी लंबी।


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