उत्तराखंड,गणेश उत्सव आज पूरे भारत में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस साल 14-25 सितंबर तक ये त्योहार मनाया जाएगा। बप्पा के स्वागत के लिए देश में जगह-जगह पर भव्य पंडाल बन रहे हैं, जिनमें गणपति की मूर्ति स्थापित की जाएगी।

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मुंबई के लालबागचा राजा दुनियाभर में जाने जाते हैं और इनके दर्शन के लिए लाखों भक्तों की भीड़ उमड़ती है, लेकिन क्या आप जानते हैं गणेशोत्सव की शुरुआत कैसे हुई थी?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर, उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी उत्तराखंड

छत्रपति शिवाजी महाराज के समय से शुरू होकर पेशवाओं के दौर से गुजरते हुए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक तक, गणेशोत्सव ने देश को एक सूत्र में बांधने का काम किया। आइए जानें गणेश उत्सव के इस शानदार सफर के बारे में।

छत्रपति शिवाजी महाराज और पेशवाओं का काल

गणपति पूजा की परंपरा नई नहीं है। इसकी शुरुआत सदियों पुरानी है और मराठा साम्राज्य से जुड़ी हुई है। माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने पुणे में हिंदू संस्कृति और भक्ति भावना को बढ़ावा देने के लिए गणेश उत्सव की शुरुआत की।

इसके बाद 18वीं सदी में पेशवाओं के शासनकाल में गणेश उत्सव को राजसी संरक्षण मिला। पेशवाओं के शासन में गणेश उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता था। इस दौरान पूणे के शनिवार वाड़ा में भव्य गणेशोत्सव का आयोजन किया जाता था।

अंग्रेजों के शासन में पेशवा साम्राज्य के पतन के बाद गणेश उत्सव से राजसी संरक्षण खत्म हुआ और ये त्योहार लोगों के घरों और व्यक्तिगत पूजा पाठ तक सीमित हो गया।

स्वतंत्रता संग्राम में गणेश उत्सव

19वीं सदी के मध्य में जब भारत ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अपनी आवाज उठा रहा था, तब अंग्रेजों ने भारतीयों के एकजुट होने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे, खासकर 1857 के विद्रोह के बाद। 19वीं सदी के अंत तक सांप्रदायिक तनाव भी काफी बढ़ने लगा था। इस दौरान लोगों में एकता की भावना जगाने के लिए लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में सार्वजनिक गणेश उत्सव मनाने की शुरुआत की। उनकी इस कोशिश ने लोगों को एक साथ इकट्ठा होने का मंच दिया और लोगों में एकता की भावना जगी।

इस उत्सव ने लोगों को एक साथ आने और साथ मिलकर त्योहार मनाने, नाच-गाने और अपनी संस्कृति को बढ़ावा देने का मौका दिया। बाल गंगाधर तिलक की ये कोशिश राष्ट्रभक्ति का भी केंद्र बनी और स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को साथ लाने का काम किया।

आज के गणेशोत्सव

गणेश उत्सव का रूप जो हम आज देखते हैं, उसका इतिहास काफी पुराना है। सार्वजनिक पंडालों में बप्पा की स्थापना करना और हर वर्ग के लोगों का समान रूप से शामिल होना बाल गंगाधर तिलक की पहल का ही नतीजा है। 11 दिनों का ये त्योहार आज महाराष्ट्र के साथ-साथ पूरे देश में बहुत जोश और उल्लास के साथ मनाया जाता है।


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