हिमालय से खिलवाड़ की कीमत: उत्तराखंड के विनाश की परिभाषा लिख रही धामी सरकार?हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स | संपादकीयअवतार सिंह बिष्ट

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नेपाल के रसुवा और आसपास के हिमालयी क्षेत्रों में आई भीषण बाढ़ ने एक बार फिर पूरे हिमालय के सामने खड़े उस खतरे को उजागर कर दिया है, जिसे विकास की चमक में लगातार नजरअंदाज किया जा रहा है। पहाड़ों से चट्टानों और मलबे का खिसकना, नदियों का अचानक उफान पर आ जाना, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं का बह जाना तथा सैकड़ों लोगों का लापता होना केवल एक प्राकृतिक आपदा की तस्वीर भर नहीं है। यह हिमालय की संवेदनशीलता का कठोर संदेश है।
नेपाल की त्रासदी उत्तराखंड के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है। भौगोलिक परिस्थितियां अलग-अलग स्थानों पर भिन्न हो सकती हैं, मगर हिमालयी क्षेत्र की प्रकृति एक साझा चेतावनी देती है—पहाड़ को उसकी क्षमता से अधिक दबाव दिया गया तो उसका जवाब विनाशकारी हो सकता है।
उत्तराखंड स्वयं इस खतरे के बीच खड़ा है। चारधाम यात्रा मार्गों का विस्तार, सुरंगों का निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार, सड़क चौड़ीकरण, बड़े पैमाने पर निर्माण गतिविधियां और पर्यटन के बढ़ते दबाव ने पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना पर सवाल खड़े किए हैं। विकास आवश्यक है, रोजगार आवश्यक है, सड़क और बिजली भी आवश्यक हैं, मगर सवाल यह है कि विकास की कीमत आखिर कौन चुका रहा है?
आज उत्तराखंड के गांवों से लेकर शहरों तक एक सवाल लगातार उठ रहा है—क्या पहाड़ को बचाते हुए विकास की नीति बनाई जा रही है या विकास के नाम पर पहाड़ को लगातार काटा जा रहा है?
पेड़ केवल लकड़ी नहीं, पहाड़ की सुरक्षा कवच हैं
उत्तराखंड के पहाड़ों में एक पेड़ का महत्व मैदान के एक पेड़ से कहीं अधिक है। उसकी जड़ें मिट्टी को थामती हैं, वर्षा के पानी की गति को नियंत्रित करती हैं, ढलानों को मजबूती देती हैं और स्थानीय जलस्रोतों के जीवन से जुड़ी रहती हैं। जंगलों की कटाई का असर केवल हरियाली पर नहीं पड़ता, इसका सीधा संबंध भूस्खलन, जलस्रोतों के सूखने, मिट्टी के कटाव और बाढ़ के खतरे से जुड़ता है।
जब सड़क चौड़ी करने के लिए पहाड़ काटे जाते हैं, जब सुरंगों के लिए पहाड़ के भीतर विस्फोट किए जाते हैं, जब परियोजनाओं के लिए जंगलों और नदी घाटियों पर दबाव बढ़ता है, तब उसके पर्यावरणीय परिणामों का आकलन केवल कागजों पर दर्ज आंकड़ों से पूरा नहीं हो सकता।
उत्तराखंड की धरती पहले से ही भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील है। यहां की पहाड़ियां युवा और भूगर्भीय रूप से सक्रिय हैं। ऐसे क्षेत्र में हर निर्माण परियोजना को मैदानी इलाकों के सामान्य विकास मॉडल से देखना खतरनाक हो सकता है।
फिर सवाल यह है कि सरकार की प्राथमिकता क्या है—परियोजना की समयसीमा या हिमालय की सुरक्षा?
धामी सरकार के विकास मॉडल पर गंभीर सवाल
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार उत्तराखंड में तेजी से विकास का दावा करती है। सड़कों, सुरंगों, चारधाम परियोजनाओं, बिजली उत्पादन, पर्यटन और कनेक्टिविटी को विकास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सरकार के समर्थक इसे बदलते उत्तराखंड की तस्वीर बताते हैं।
लेकिन तस्वीर का दूसरा हिस्सा भी है।
बारिश आते ही सड़कें बंद होती हैं। पहाड़ दरकते हैं। पुल क्षतिग्रस्त होते हैं। गांवों का संपर्क टूटता है। नदियां अपने पुराने रास्तों की याद दिलाती हुई आबादी और निर्माण क्षेत्र तक पहुंच जाती हैं। कहीं सड़क धंसती है, कहीं पहाड़ टूटता है और कहीं नदी का बहाव परियोजनाओं के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा कर देता है।
यह स्थिति बताती है कि विकास का मूल्यांकन केवल इस आधार पर करना पर्याप्त नहीं कि कितनी सड़क बनी, कितनी सुरंग बनी या कितनी बिजली पैदा हुई। वास्तविक सवाल यह होना चाहिए कि उस परियोजना ने स्थानीय पर्यावरण पर कितना दबाव डाला, भविष्य के आपदा जोखिम को कितना बढ़ाया और स्थानीय समुदाय को उससे कितना लाभ मिला।
यदि किसी सड़क के निर्माण के बाद हर मानसून में बड़े पैमाने पर भूस्खलन होता है, तो उसकी लागत केवल निर्माण बजट तक सीमित नहीं रहती। उस लागत में लोगों की जान, घरों का नुकसान, खेतों की तबाही, सड़क बंद होने से अर्थव्यवस्था पर असर और पुनर्निर्माण का सरकारी खर्च भी शामिल होता है।
जलविद्युत परियोजनाएं: ऊर्जा की जरूरत या पहाड़ की परीक्षा?
उत्तराखंड को जलविद्युत की अपार संभावनाओं वाला राज्य कहा जाता है। नदियां राज्य की आर्थिक शक्ति बन सकती हैं। बिजली उत्पादन से राजस्व, रोजगार और औद्योगिक विकास को गति मिल सकती है। मगर हिमालयी नदियों पर परियोजनाओं की श्रृंखला खड़ी करने से पहले प्रत्येक नदी की पारिस्थितिकीय क्षमता का ईमानदार अध्ययन जरूरी है।
नेपाल में आई बाढ़ में कई जलविद्युत परियोजनाओं के क्षतिग्रस्त होने की खबर ने इस विषय को और गंभीर बना दिया है। यदि अचानक आई बाढ़ किसी परियोजना को नुकसान पहुंचा सकती है, तो परियोजना के आसपास रहने वाली आबादी पर उसका प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है, इस प्रश्न का उत्तर निर्माण शुरू होने से पहले तलाशना जरूरी है।
उत्तराखंड में भी जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से पर्यावरणविदों, स्थानीय समुदायों और विशेषज्ञों के बीच बहस चलती रही है। टिहरी से लेकर चमोली और पिथौरागढ़ तक नदियों तथा पहाड़ों पर विकास का दबाव बढ़ा है।
बिजली पैदा करना अपराध नहीं है। विकास भी अपराध नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी क्षेत्र की प्राकृतिक वहन क्षमता से अधिक निर्माण कर दिया जाए।
नदियों के साथ खिलवाड़ का परिणाम
हिमालय की नदियां केवल पानी की धाराएं नहीं हैं। वे पहाड़ की भौगोलिक संरचना, जंगल, मिट्टी, हिमनद और वर्षा चक्र से जुड़ी प्राकृतिक प्रणालियां हैं। नदी के प्रवाह क्षेत्र में अतिक्रमण, तटों पर भारी निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था में हस्तक्षेप आपदा का खतरा बढ़ा सकते हैं।
उत्तराखंड में नदियों के किनारे बस्तियां और व्यावसायिक प्रतिष्ठान तेजी से विकसित हुए हैं। पर्यटन के विस्तार के साथ नदी घाटियों पर निर्माण का दबाव बढ़ा है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नदी के लिए पर्याप्त प्राकृतिक क्षेत्र छोड़ा जा रहा है?
नदी को दीवारों और कंक्रीट के ढांचे में बांधकर हमेशा नियंत्रित करने की सोच हिमालयी परिस्थितियों में कितनी कारगर है, इस पर गंभीर वैज्ञानिक विमर्श जरूरी है।
प्रकृति का अपना रास्ता होता है। नदी जब शांत रहती है तो जीवन देती है। जब उसके रास्ते में अवरोध बढ़ते हैं और बारिश असामान्य रूप से तीव्र होती है, तब वही नदी अपना रास्ता तलाशती है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चिंता भर नहीं है। इसके प्रभाव हिमालयी क्षेत्र में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। वर्षा का पैटर्न बदल रहा है। कहीं लंबे समय तक बारिश का अभाव रहता है और कहीं कुछ घंटों में इतनी वर्षा हो जाती है कि वर्षों पुरानी व्यवस्था चरमरा जाती है।
अत्यधिक वर्षा, बादल फटना, ग्लेशियरों और हिमनद झीलों से जुड़े जोखिम, अचानक बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाओं के बीच उत्तराखंड को विकास की अपनी पूरी रणनीति पर पुनर्विचार करना होगा।
ऐसे समय में पेड़ काटकर सड़क बनाने और फिर उसी ढलान को कंक्रीट से थामने का मॉडल कितने समय तक टिकेगा? पहाड़ को काटकर सुरंग बनाने के बाद उसके ऊपर की भूगर्भीय स्थिति में कितना बदलाव आता है? जलविद्युत परियोजनाओं की श्रृंखला नदी के प्राकृतिक प्रवाह को किस सीमा तक प्रभावित करती है?
इन सवालों के जवाब राजनीतिक भाषणों से नहीं, स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययनों से मिलने चाहिए।
आपदा के बाद राहत से बेहतर है आपदा से पहले सावधानी
उत्तराखंड में हर मानसून के दौरान आपदा प्रबंधन की परीक्षा होती है। सरकारें राहत पैकेज घोषित करती हैं, सड़कें खोलने के लिए मशीनें भेजी जाती हैं, क्षतिग्रस्त पुलों का पुनर्निर्माण होता है और प्रभावित परिवारों को सहायता दी जाती है।
यह व्यवस्था जरूरी है, मगर असली प्रशासनिक सफलता तब मानी जाएगी जब आपदा से पहले जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान हो, संवेदनशील ढलानों की निगरानी हो, निर्माण की सीमा तय हो और स्थानीय लोगों को सुरक्षित स्थानों पर बसाने की दीर्घकालिक नीति बने।
उत्तराखंड को एक अत्याधुनिक हिमालयी आपदा निगरानी तंत्र की आवश्यकता है। हर संवेदनशील घाटी में सेंसर आधारित निगरानी, नदी जलस्तर की वास्तविक समय सूचना, भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की मैपिंग और गांव स्तर तक तत्काल चेतावनी प्रणाली विकसित होनी चाहिए।
सरकार को हर बड़े प्रोजेक्ट के साथ स्वतंत्र पर्यावरणीय ऑडिट की व्यवस्था करनी चाहिए। परियोजना पूरी होने के बाद उसकी समीक्षा हो कि पर्यावरणीय शर्तों का कितना पालन हुआ और स्थानीय पारिस्थितिकी पर क्या असर पड़ा।
विकास की परिभाषा बदलनी होगी
उत्तराखंड का विकास ऐसा होना चाहिए जिसमें पहाड़ भी बचे, गांव भी बचें और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो। पहाड़ के युवाओं को रोजगार देने के लिए केवल बड़े निर्माण प्रोजेक्ट ही विकल्प नहीं हैं। स्थानीय कृषि, बागवानी, जड़ी-बूटी, हस्तशिल्प, ग्रामीण पर्यटन, होमस्टे, पर्वतीय उत्पाद और स्थानीय उद्यमों को मजबूत करके भी रोजगार के बड़े अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
सड़क आवश्यक है, मगर हर पहाड़ को काटकर चार लेन सड़क बनाना ही विकास की अंतिम मंजिल नहीं हो सकती। पर्यटन आवश्यक है, मगर पर्यटकों की संख्या बढ़ाना ही पर्यटन विकास का पैमाना नहीं होना चाहिए। बिजली आवश्यक है, मगर हर नदी को परियोजनाओं की श्रृंखला में बदल देना ऊर्जा नीति का एकमात्र रास्ता नहीं हो सकता।
हमें ऐसा विकास चाहिए जो आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित उत्तराखंड दे।
अभी ट्रेलर है, तस्वीर बाकी है?
यदि विकास की वर्तमान दिशा में पर्यावरणीय चेतावनियों की अनदेखी जारी रही, तो आने वाले वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता और आर्थिक नुकसान दोनों बढ़ सकते हैं। तब सरकारों के पास आंकड़े बहुत होंगे—कितने पुल टूटे, कितनी सड़कें क्षतिग्रस्त हुईं, कितने घर बह गए, कितने लोग प्रभावित हुए—मगर उन आंकड़ों के पीछे बर्बाद परिवारों की जिंदगी होगी।
यही कारण है कि आज उत्तराखंड की जनता को सवाल पूछना होगा।
क्या पहाड़ विकास की कीमत चुकाने के लिए हैं?
क्या जंगल परियोजनाओं के रास्ते में आने वाली बाधा भर हैं?
क्या नदियां केवल बिजली उत्पादन का माध्यम हैं?
क्या स्थानीय लोगों की राय बड़े प्रोजेक्टों के सामने गौण हो जाएगी?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या हम आने वाली पीढ़ी के लिए ऐसा उत्तराखंड छोड़ना चाहते हैं, जहां विकास की चमक के साथ प्राकृतिक आपदाओं का खतरा भी लगातार बढ़ता जाए?
भाजपा की धामी सरकार को इन सवालों का जवाब देना होगा। राजनीतिक उपलब्धियों का प्रचार अपनी जगह है, मगर हिमालय की सुरक्षा किसी राजनीतिक दल की उपलब्धि या आलोचना का विषय भर नहीं हो सकती। यह उत्तराखंड के अस्तित्व का सवाल है।
नेपाल की त्रासदी को केवल नेपाल की त्रासदी मानकर आगे बढ़ जाना भूल होगी। हिमालय एक साझा पारिस्थितिकीय क्षेत्र है। वहां घटने वाली घटनाएं हमें अपनी तैयारियों, अपनी नीतियों और अपनी विकास दृष्टि को परखने का अवसर देती हैं।
उत्तराखंड पहले भी कई आपदाओं का दर्द झेल चुका है। केदारनाथ की त्रासदी से लेकर रैणी और चमोली की घटनाओं तक प्रकृति ने समय-समय पर चेतावनी दी है। हर चेतावनी के बाद कुछ समय तक चर्चा होती है, समितियां बनती हैं, रिपोर्ट आती हैं और फिर विकास की रफ्तार उसी दिशा में लौट जाती है।
अब इस चक्र को तोड़ने का समय है।
उत्तराखंड को विकास चाहिए, विनाश की कीमत पर विकास नहीं।
पेड़ बचेंगे तो पहाड़ बचेंगे। पहाड़ बचेंगे तो नदियां बचेंगी। नदियां बचेंगी तो मैदान बचेंगे। और हिमालय सुरक्षित रहेगा तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा।
यदि सरकार ने प्रकृति की चेतावनियों को गंभीरता से लिया, तो उत्तराखंड देश के सामने हिमालयी विकास का एक संतुलित मॉडल प्रस्तुत कर सकता है। यदि विकास की दौड़ में पहाड़ की क्षमता और प्रकृति की सीमा लगातार नजरअंदाज होती रही, तो इतिहास भविष्य में यह सवाल जरूर पूछेगा कि विनाश की शुरुआत किसने की थी और चेतावनी मिलने के बाद भी उसे रोकने का प्रयास किसने किया?
अभी समय है। हिमालय को बचाने का फैसला आज लेना होगा। क्योंकि प्रकृति की अदालत में अगली तारीख की गारंटी किसी के पास नहीं है।


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