

दुनिया बदल रही है — और उसके साथ भाषा का अर्थ भी। कभी माताओं के आंगन में, खेतों की मेड़ों पर, लोकगीतों की गूंज में और देवभूमि की ऊँची चोटियों के बीच बोली जाने वाली कुमाऊनी, गढ़वाली और जौनसारी आज तकनीक के भविष्य में जगह पाने की दिशा में सबसे बड़ी छलांग लगा चुकी हैं। अमेरिका और कनाडा में बसे उत्तराखंडी प्रवासियों के नेतृत्व में लॉन्च किया गया Bhasha Data Collection Portal न सिर्फ एक डिजिटल प्रोजेक्ट है — यह लोकभाषाओं के लिए पुनर्जन्म की उद्घोषणा है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सिएटल और सरे-वैंकूवर में आयोजित विशेष समारोह में वीडियो संदेश के माध्यम से इसका उद्घाटन किया, तो हजारों प्रवासी उत्तराखंडियों के बीच गौरव और भावनाओं की गूंज सुनाई दी। परंतु असली उपलब्धि सिर्फ समारोह नहीं थी — उपलब्धि थी यह संकल्प कि अब हमारी भाषा सिर्फ स्मृतियों में नहीं, तकनीक में भी जीवित रहेगी।
संस्कृति का संरक्षण — माउस और कीबोर्ड के युग में पहाड़ की आवाज़
आज पहाड़ का बच्चा स्कूल में अंग्रेजी में गणित पढ़ता है, हिंदी में निबंध लिखता है, पर दादी की बोली — जो उसकी पहचान की पहली सीढ़ी थी — धीरे-धीरे परछाई बनती जा रही है।
इस पहल ने इस संकट को समझा।
1 मिलियन से अधिक शब्द, वाक्य, मुहावरे, कहावतें और लोककथाएँ AI मॉडल्स के लिए सुरक्षित किए जाएंगे।
यह सिर्फ शब्दों को बचाना नहीं — आत्मा को संरक्षित करना है।
पद्मश्री प्रीतम भरतवाण जैसे लोकगायक और संस्कृति संरक्षक का जुड़ना इस परियोजना को आध्यात्मिक गहराई देता है। वे जानते हैं कि भाषा तब तक जीवित रहती है जब तक उसके सुर, ताल और स्मृतियाँ जीवित रहती हैं।
AI में उत्तराखंड — तकनीकी दुनिया में भाषा की गूंज
ChatGPT, Gemini और अन्य AI प्लेटफॉर्म भविष्य में तब कुमाऊनी, गढ़वाली और जौनसारी में बातचीत करेंगे —
यह सिर्फ कल्पना नहीं, अब लक्ष्य है।
जब कोई प्रवासी बच्चा कहेगा —
“बाबूजी, मुझे ईजा की भाषा भूलती नहीं, AI से सीख रहा हूँ”
— तब समझिएगा कि यह परियोजना सिर्फ तकनीकी सफलता नहीं, सांस्कृतिक क्रांति है।
प्रवासी समुदाय — दूरी नहीं, जड़ें
हजारों मील दूर रहकर भी पहाड़ वाले अपने जनम की मिट्टी और बोली को लेकर जितने संकल्पित रहे हैं, उसका उदाहरण बहुत कम मिलता है।
यह पहल बताती है कि जड़ों से जुड़े लोग, पहाड़ छोड़ते हैं पर पहाड़ उन्हें नहीं छोड़ता।
परियोजना की चुनौतियाँ — रास्ता आसान नहीं, पर जरूरी
- डेटा की सांस्कृतिक पवित्रता और गुणवत्ता
- बोली के उप-रूपों का समन्वय
- निरंतर वित्तपोषण
- तकनीक तक आसान पहुँच
परंतु यदि सामुदायिक इच्छा मजबूत हो, तो पहाड़ की कोई चोटी अपार नहीं।
यह भाषा परियोजना उत्तराखंड के भविष्य का घोषणापत्र है
यह परियोजना सिर्फ एआई, डेटा या तकनीक की बात नहीं —
यह बताती है कि पहाड़ की पहचान समाप्त नहीं होगी, बदलते ज़माने में और मजबूत होगी।
आज यदि भाषा डिजिटल हो रही है, तो कल हम वही होंगे जो अपनी मातृभाषा को बचा ले गए —
न कि वे जो आधुनिकता के नाम पर जड़ों को त्याग बैठे।
यह पहल सिर्फ एक तकनीकी प्रयोग नहीं
यह उत्तराखंड का सांस्कृतिक पुनर्जागरण है।
भाषा बचेगी — तो पहचान बचेगी।
पहचान बचेगी — तो इतिहास बचेगा।
और इतिहास बचेगा — तो आने वाली पीढ़ियाँ जानेंगी कि वे कौन हैं।
यह पहल सामूहिक आंदोलन बने — सरकारी समर्थन के साथ सामुदायिक भागीदारी इसकी सबसे बड़ी नींव है।
क्योंकि पहाड़ की ये बोली सिर्फ भाषा नहीं —
यह पूर्वजों की धरोहर है, और धरोहरें कभी भुलाई नहीं जातीं।




