रजत जयंती वर्ष का सिमटा उत्सव : राज्य आंदोलनकारियों की उपेक्षा ने रुद्रपुर को किया निराश !

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रुद्रपुर, उत्तराखंड — राज्य स्थापना दिवस, जिसे कभी जनता, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के साझा उत्सव के रूप में मनाया जाता था, इस बार अपने ही घर में सीमित होकर रह गया। उत्तराखंड राज्य की रजत जयंती का वर्ष होने के बावजूद रुद्रपुर जिला मुख्यालय का मुख्य कार्यक्रम मात्र कलेक्ट्रेट भवन के बरामदे तक सिमट गया।
राज्य आंदोलनकारियों, समाजसेवियों और आम जनता के लिए यह न केवल निराशाजनक रहा, बल्कि यह उस जनभावना को भी ठेस पहुंचाता है जिसके बल पर यह राज्य अस्तित्व में आया था।

एक उत्सव जो कभी जन-जन का था

रुद्रपुर की पुलिस लाइन मैदान, जो लगभग 5 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला है, वर्षों से राज्य स्थापना दिवस का प्रमुख केंद्र रहा है।
यहीं वह स्थल था जहां हर साल सुबह से शाम तक उत्तराखंड की आत्मा जीवंत हो उठती थी —

  • प्रशासनिक विभागों के स्टॉल,
  • स्वास्थ्य शिविर,
  • फायर ब्रिगेड और यातायात विभाग की झांकियां,
  • लघु उद्योग और स्वयं सहायता समूहों के उत्पादों की बिक्री,
  • हस्तशिल्प और लोकसंस्कृति की झलकियाँ,
  • किसानों और प्रधानों का सम्मान,
  • आशा कार्यकर्ताओं और समाजसेवियों की सहभागिता,
  • और सबसे महत्वपूर्ण — राज्य आंदोलनकारियों के प्रेरक संबोधन।

वह दिन रुद्रपुर के लिए सिर्फ एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि जनभागीदारी का पर्व होता था — जहाँ शासन, समाज और संस्कृति तीनों एक मंच पर मिलते थे। स्थानीय उत्पादकों को बाजार मिलता था, महिलाओं को प्रोत्साहन मिलता था और जनता को यह महसूस होता था कि राज्य की आत्मा अब भी जीवित है।

इस बार का आयोजन: एक सीमित औपचारिकता

लेकिन रजत जयंती वर्ष का यह आयोजन, जो ऐतिहासिक होना चाहिए था, मात्र औपचारिकता तक सीमित रहा।
कलेक्ट्रेट भवन के बरामदे में आयोजित इस कार्यक्रम में न तो वह जोश दिखा, न वह जनसैलाब।
करीब 18से 20 राज्य आंदोलनकारी, कुछ पुलिस अधिकारी और सीमित प्रशासनिक कर्मचारी— यही कार्यक्रम की पूरी भीड़ रही।
आम जनता, स्वयं सहायता समूहों और उद्यमियों की भागीदारी लगभग न के बराबर थी।

राज्य आंदोलनकारियों के अनुसार, कार्यक्रम मात्र डेढ़ घंटे में निपटा दिया गया।
न किसी आंदोलनकारी को मंच से बोलने का अवसर मिला, न उनके संघर्षों को मंच से याद किया गया।
कई वरिष्ठ आंदोलनकारियों ने इसे “आंदोलन की आत्मा का अपमान” बताया।

प्रशासनिक दृष्टिकोण बनाम जनभावना

जब हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स ने इस बारे में जिला प्रशासन के एक अधिकारी से बातचीत की, तो उन्होंने कहा कि “मुख्य आयोजन देहरादून में किया जा रहा है, इसलिए जिलों में कार्यक्रम प्रतीकात्मक हैं।”
लेकिन सवाल यह है — क्या रुद्रपुर जिला मुख्यालय प्रतीक मात्र है?
क्या रजत जयंती जैसे ऐतिहासिक वर्ष में जिला स्तर पर जनता को जोड़ने का अवसर खो देना उचित था?
यह वही जिला है जहाँ से राज्य आंदोलन को बार-बार ताकत मिली, जहाँ हजारों आंदोलनकारी जेल गए, और जहाँ से राज्य निर्माण की आवाज़ सबसे पहले गूंजी थी।

रुद्रपुर जैसे औद्योगिक और सांस्कृतिक केंद्र के लिए यह आयोजन जनसंवाद का माध्यम बन सकता था, परंतु प्रशासन ने इसे मात्र एक औपचारिक कार्यक्रम बना दिया।

आंदोलनकारियों की नाराज़गी और चेतावनी

कार्यक्रम में उपस्थित रहे वरिष्ठ आंदोलनकारी और कांग्रेस के पूर्व राज्य मंत्री हरीश पनेरू ने तो सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताई।
वे कार्यक्रम की अग्रिम पंक्ति में बैठे थे, परंतु मंच से राज्य आंदोलनकारियों को बोलने का अवसर न मिलने पर वे बीच में ही उठकर चले गए।
उनका कहना था —

यदि रजत जयंती के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभानी थी, तो जनता को भ्रमित क्यों किया गया? यह राज्य आंदोलन की आत्मा का अपमान है।”

दूसरी ओर, कई आंदोलनकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि अगले वर्ष भी कार्यक्रम इस तरह कलेक्ट्रेट के बरामदे में आयोजित हुआ, तो वे उसका पूर्ण बहिष्कार करेंगे।

राजनीतिक सन्दर्भ और आने वाले चुनाव

2027 के विधानसभा चुनावों से पहले रजत जयंती वर्ष का यह आयोजन राजनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण था।
रुद्रपुर जैसे शहर में, जहाँ औद्योगिक मजदूर, किसान, व्यापारी और स्वयं सहायता समूह की महिलाएँ बड़ी संख्या में इस उत्सव में भाग लेती रही हैं, वहाँ इस बार की निराशा व्यापक असर छोड़ सकती है।
स्थानीय समूहों का कहना है कि हर साल इस आयोजन से उन्हें अपने उत्पाद बेचने और नए ग्राहकों से जुड़ने का अवसर मिलता था, जिससे उनके रोजगार को सहारा मिलता था।
लेकिन इस बार के संकुचित आयोजन ने न केवल आर्थिक नुकसान पहुँचाया, बल्कि लोगों में यह संदेश भी गया कि सरकार जनता से दूर हो रही है।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह नाराज़गी आने वाले चुनावों में सत्ता पक्ष के लिए चुनौती बन सकती है।

जनता की अपेक्षाएँ और रजत जयंती का वास्तविक अर्थ

उत्तराखंड राज्य की स्थापना केवल भौगोलिक पुनर्गठन नहीं थी; यह एक भावनात्मक क्रांति थी, जिसने उत्तराखंड की अस्मिता, रोजगार, शिक्षा और स्वाभिमान के लिए संघर्ष किया।
रजत जयंती वर्ष का अर्थ था — “25 वर्षों के सफर का आत्ममंथन, उपलब्धियों का सम्मान और आने वाले भविष्य का संकल्प।”

लेकिन रुद्रपुर जैसे प्रमुख जिले में हुए इस आयोजन ने आत्ममंथन की जगह औपचारिकता को प्राथमिकता दी।
न मंच पर राज्य के सपनों की चर्चा हुई, न संघर्षों की।
न नई पीढ़ी को बताया गया कि यह राज्य किन कुर्बानियों से बना।

प्रमुख अतिथि और सीमित संवाद

कार्यक्रम में पूर्व विधायक राजकुमार ठुकराल, जो स्वयं राज्य आंदोलनकारी रहे हैं, महापौर विकास शर्मा, जिलाधिकारी नितिन भदौरिया, और एसडीएम मनीष बिष्ट उपस्थित रहे।
परंतु कार्यक्रम की संरचना इतनी सीमित थी कि किसी भी प्रमुख आंदोलनकारी या सामाजिक कार्यकर्ता को संबोधन का अवसर नहीं मिला।
राज्य आंदोलनकारियों ने इसे प्रशासन की “अति नियंत्रित व्यवस्था” बताया, जिसमें न स्वतंत्र अभिव्यक्ति की जगह थी, न जनसंपर्क की भावना।

एक अवसर जो खो गया

रजत जयंती वर्ष का यह आयोजन उस स्वाभिमान और जनसंवाद का प्रतीक बन सकता था जो 25 साल पहले उत्तराखंड आंदोलन की नींव में था।
लेकिन यह अवसर खो गया।
एक जिला मुख्यालय, जो कभी राज्य निर्माण के संघर्षों का गवाह रहा, वहां आज उत्सव की जगह निराशा ने ले ली।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को इस संदेश को गंभीरता से लेना होगा कि रजत जयंती वर्ष का अर्थ केवल देहरादून में भव्य आयोजन नहीं, बल्कि प्रत्येक जिले, प्रत्येक गांव में उस भावना को पुनर्जीवित करना है जिसके कारण यह राज्य बना था।

यदि राज्य आंदोलनकारियों, जनता, और स्वयं सहायता समूहों की आवाज़ इस तरह सीमित होती रही, तो रजत जयंती का यह उत्सव इतिहास नहीं, बल्कि उपेक्षा का प्रतीक बन जाएगा।

संपादकीय:रजत जयंती का सूना बरामदा — क्या यही है धामी सरकार का उत्तराखंड गौरव?”

उत्तराखंड राज्य निर्माण की रजत जयंती वर्ष में जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 2027 के विधानसभा चुनावों की ओर अपनी सियासी यात्रा को “गौरव पर्व” के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं, तब रुद्रपुर में आयोजित रजत जयंती सम्मान समारोह की वास्तविकता ने सरकार के उत्सववाद की पोल खोल दी।

जिला प्रशासन द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम, जो राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान का प्रतीक होना चाहिए था, महज़ औपचारिकता बनकर रह गया। पूरे सभागार में आंदोलनकारियों की संख्या 15 से 20 तक सीमित रही — शेष स्थान पुलिसकर्मियों, अधिकारियों और सांस्कृतिक कार्यक्रम करने वाले बच्चों से भरा गया। बरामदे में संपन्न यह समारोह न जनभागीदारी का प्रतीक दिखा, न उस आत्मबल का, जिसके बूते 2000 में यह राज्य अस्तित्व में आया था।

मुख्यमंत्री धामी की “धार्मिक चेतावनी” — कि “श्रद्धा के उत्सव को दिखावे में न बदलें” — अपने ही प्रशासन पर गहरा व्यंग्य प्रतीत होती है। प्रश्न यह उठता है कि यदि रजत जयंती जैसे ऐतिहासिक अवसर पर भी जनता और राज्य आंदोलनकारियों की सच्ची भागीदारी नहीं सुनिश्चित हो सकी, तो 2027 के चुनावों में “उत्तराखंड गौरव” का नारा क्या केवल सरकारी मंचों और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित रह जाएगा?

राज्य निर्माण की भावना अब भी जीवित है, परंतु प्रशासन की संवेदनहीनता ने उसे बरामदे की दीवारों में कैद कर दिया है — यह केवल चूक नहीं, उत्तराखंड की आत्मा के प्रति अन्याय है।


लेखक: अवतार सिंह बिष्ट
संवाददाता, हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स,


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