

धर्म कहता है — जीवन क्षणिक है, मृत्यु अनिवार्य है। परंतु मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि एक द्वार है। हिंदू शास्त्रों में कुल अठारह पुराण हैं और उनमें गरुड़ पुराण विशेष महत्व रखता है, क्योंकि वह मृत्यु से पहले और बाद की यात्रा का ऐसा रहस्य खोलता है, जिस पर आधुनिक विज्ञान मौन है, परंतु मानव आत्मा उसे युगों से महसूस करती आई है। मनुष्य जन्म से मृत्यु तक बहुत कुछ सीखता है, कमाता है, खोता है, बनाता है, संघर्ष करता है, पर जब अंत आता है, तो हर उपलब्धि, पद, संबंध, गर्व और अहंकार शांत हो जाते हैं, और बचता है केवल — कर्म। यही बात गरुड़ पुराण हमें याद दिलाता है।

गरुड़ पुराण कहता है कि मृत्यु से ठीक एक घंटे पहले मनुष्य के भीतर और बाहर बहुत कुछ बदल रहा होता है। शरीर की सांसें रुकने से पहले, आत्मा अपने पुराने घर — शरीर की कैद — से निकलने की तैयारी कर रही होती है। लेकिन इस विदाई में कई अध्याय खुलते हैं। शास्त्र बताते हैं कि मृत्यु के अंतिम क्षणों में पितरों की उपस्थिति का आभास होता है। व्यक्ति अपने पूर्वजों को देखता है — माता, पिता, दादा, परदादा या कोई दिवंगत प्रिय जन। ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे उसे लेने आए हों। शायद इसलिए दुनिया के अधिकांश लोग अंतिम समय में अचानक किसी अनुपस्थित व्यक्ति का नाम लेने लगते हैं, हवा में किसी को देखते हैं, मुस्कुराते हैं या रोते हैं — जैसे कोई दृश्य सामने उपस्थित हो। विज्ञान इसे तंत्रिका गतिविधि कहकर टाल देता है, पर आध्यात्मिक परंपरा इसे आत्मा की यात्रा का स्वागत मानती है।
मृत्यु के क्षणों में ही एक और अनोखा अनुभव होता है — जीवन का फ्लैशबैक। गरुड़ पुराण के अनुसार व्यक्ति अपनी पूरी जिंदगी एक फिल्म की तरह देखता है। बचपन से बुढ़ापे तक, हर अच्छी-बुरी घटना, हर रिश्ते, हर अपराध, हर पुण्य, हर बुराई और हर दया — सब उसके सामने गुजरती है। यह न्याय कोई और नहीं करता, व्यक्ति स्वयं करता है। शायद इसलिए अंतिम सांस के समय किसी के चेहरे पर मुस्कान होती है और किसी के चेहरे पर भय। कोई शांति से जाता है, कोई संघर्ष करता है। यह अंतर केवल एक बात से तय होता है — कर्म। यही कारण है कि पुराण कहते हैं — मनुष्य दूसरों से छिप सकता है, खुद से नहीं; समाज से बच सकता है, ईश्वर के न्याय से नहीं।
गरुड़ पुराण आगे कहता है कि मृत्यु के क्षण में आत्मा को एक रहस्यमयी द्वार दिखाई देता है। कुछ लोगों को उस द्वार से अत्यंत उज्ज्वल प्रकाश निकलता दिखाई देता है — शीतल, शांत और स्वागत–सा। वहीं कुछ को ऐसा दृश्य दिखाई देता है जिसमें अग्नि की लपटें होती हैं, भय होता है, पीड़ा होती है। माना जाता है कि यह द्वार व्यक्ति के कर्मों की दिशा का प्रतीक है। जीवन में जो बीज बोए हैं, मृत्यु के पश्चात वही फल प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। प्रकाश शुद्ध कर्मों का संकेत है और अग्नि पाप की यात्रा का। इसलिए शास्त्र चेताते हैं — पुण्य का संचय धन से अधिक आवश्यक है, क्योंकि धन शरीर के साथ छूट जाएगा, पर कर्म आत्मा के साथ जाएंगे।
उस क्षण की अंतिम अनुभूति होती है — यमदूतों का दिखाई देना। भयावह या शांत, यह स्वरूप आत्मा की स्थिति के अनुसार होता है। वे आत्मा को शरीर से अलग करते हैं और यमलोक की दिशा में ले जाते हैं। यह सुनकर कई लोग डरते हैं, परंतु गरुड़ पुराण मृत्यु को दंड नहीं, न्याय कहता है। जो जीवन कर्म के अनुसार जिया है, उसे भय नहीं होता। जो गलत रास्तों पर चला है, वही डरता है। मृत्यु निष्पक्ष है, मनुष्य नहीं।
लेकिन यहीं गरुड़ पुराण का उद्देश्य समाप्त नहीं होता। उसका अंतिम संदेश डर नहीं, जीवन से प्रेम है। पुराण यह नहीं कहता कि मृत्यु के बाद यमयातनाएं ही हैं। वह यह भी कहता है कि अच्छे कर्मों से यात्रा दिव्य और शांति से परिपूर्ण बनती है। यही कारण है कि धार्मिक परंपराएं सदैव कहती रही हैं —
सच बोलो, परहित करो, माफ करना सीखो, क्रोध में मत जलो, दान दो, सेवा करो और धर्म का पालन करो।
क्योंकि अंत में साथ वही जाएगा।
आधुनिक युग का मनुष्य विज्ञान के विकास के कारण मृत्यु जैसे विषयों पर चर्चा से बचता है। हम तकनीक की दौड़ में आत्मा को भूल गए हैं। लेकिन सत्य वही है — जीवन क्षणिक है और मृत्यु वास्तविक। जो इसे समझ लेता है, उसका दृष्टिकोण बदल जाता है। सफलता का मोह घट जाता है, दम्भ टूट जाता है, प्रतिस्पर्धा की गर्मी कम हो जाती है और जीवन का मूल्य बढ़ जाता है। गरुड़ पुराण मृत्यु से अधिक जीवन जीने की कला सिखाता है।
इस ग्रंथ का संदेश यही है कि मनुष्य जितना दूसरों के लिए जिएगा, उतना ही अपनी यात्रा को दिव्य बनाएगा। माता-पिता की सेवा, गरीब की सहायता, जरूरतमंद का सहारा, पशुओं और प्रकृति के प्रति संवेदना, सत्य और ईमानदारी — यही मोक्ष की सीढ़ियां हैं। मृत्यु से डरने के बजाय, ऐसे कृत्यों से जीवन को संवारने की सीख मिलती है।
पूर्वजों का दर्शन हो या यमदूतों का आना — इन संकेतों का असली उद्देश्य मनुष्य को भयभीत करना नहीं, बल्कि चेताना है। हर धर्म, गुरु, ऋषि और संत यह कहते आए हैं कि जीवन अस्थायी है — परंतु इसके भीतर कुछ ऐसा है जो मृत्यु से परे है — आत्मा। वही हमारी पहचान, हमारी यात्रा और हमारा सत्य है।
इसलिए गरुड़ पुराण का अंतिम संदेश यही है कि मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि अगले अध्याय का आरंभ है। लेकिन नए अध्याय की गुणवत्ता इस जीवन में किए गए कर्मों पर निर्भर करती है।
हर इंसान को एक दिन वह रहस्यमय द्वार दिखना ही है — सवाल यह है कि उस द्वार से प्रकाश निकलेगा या अग्नि?
निर्णय अभी, इसी जीवन में होता है।
मनुष्य अगर यह समझ ले कि मृत्यु निश्चित है, तो जीवन सुधारने के लिए आज ही कदम उठाएगा — क्रोध कम करेगा, छल छोड़ देगा, दया बढ़ाएगा, माफ करना सीखेगा, नीचता नहीं बल्कि नैतिकता चुनेगा। वही व्यक्ति मृत्यु के समय निरीह नहीं, बल्कि शांत मुस्कान के साथ विदा लेता है, क्योंकि उसे पता होता है — उसने अच्छा जीवन जिया है और उसकी आगे की यात्रा भी मंगलमय होगी।
इसीलिए गरुड़ पुराण जीवन को भय से नहीं, नीति, करुणा और धर्म से जोड़ता है। यही इसकी सबसे बड़ी आध्यात्मिक सीख है।
मृत्यु तब कष्टदायी नहीं रहती, जब जीवन सद्गुणों से परिपूर्ण हो।




