अंकिता भंडारी केस: जनता के दबाव से CBI जांच, अब निगरानी पर सवाल? अंकिता भंडारी केस की CBI जांच किसी पार्टी की नहीं, उत्तराखंड की जनता के संघर्ष की जीत

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अंकिता भंडारी हत्याकांड एक बार फिर उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासन और न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में है। लंबे जन-दबाव और सामाजिक आक्रोश के बाद आखिरकार राज्य सरकार ने इस मामले की जांच CBI को सौंपने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसे अंकिता के माता-पिता की मांग और मातृशक्ति की सुरक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता बताया है। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे किसी एक दल की नहीं, बल्कि उत्तराखंड की जनता के संघर्ष की जीत करार दिया है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


हरीश रावत का कहना है कि CBI जांच तभी सार्थक होगी जब यह सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश की निगरानी में हो। उनका तर्क है कि बिना शीर्ष न्यायिक देखरेख के न तो साक्ष्य नष्ट करने वालों पर प्रभावी कार्रवाई हो पाएगी और न ही कथित VVIP संलिप्तता जैसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच संभव होगी। यह सवाल केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
मुख्यमंत्री धामी ने स्पष्ट किया है कि उत्तराखंड में कानून का राज है और दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। साथ ही उन्होंने महिला सुरक्षा को सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता बताया। उत्तरांचल प्रेस क्लब में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने पत्रकारों की भूमिका, फेक न्यूज के खतरे और पत्रकार कल्याण योजनाओं पर भी जोर दिया, जो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को सशक्त करने की दिशा में अहम संकेत है।
संपादकीय दृष्टि से देखा जाए तो CBI जांच का फैसला देर से सही, लेकिन आवश्यक कदम है। अब असली परीक्षा जांच की निष्पक्षता, पारदर्शिता और समयबद्धता की होगी। जनता यह जानना चाहती है कि क्या वास्तव में साक्ष्य नष्ट करने वालों पर कार्रवाई होगी, क्या प्रभावशाली लोगों की भूमिका सामने आएगी और क्या अंकिता को वास्तविक न्याय मिलेगा।
अंकिता भंडारी केस केवल एक अपराध का मामला नहीं, बल्कि राज्य की संवेदनशीलता, राजनीतिक इच्छाशक्ति और न्याय व्यवस्था की कसौटी है। CBI जांच की घोषणा ने उम्मीद जगाई है, लेकिन यह उम्मीद तभी भरोसे में बदलेगी जब जांच निष्पक्ष होगी और परिणाम बिना किसी दबाव के सामने आएंगे। जनता की लड़ाई यहीं खत्म नहीं होती—न्याय मिलने तक निगरानी और सवाल दोनों जरूरी रहेंगे।


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