भिटौली: उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत और बेटियों के प्रति स्नेह का प्रतीक

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उत्तराखंड की संस्कृति और भिटौली परंपरा

उत्तराखंड की सांस्कृतिक और सामाजिक परंपराओं में चैत्र माह का विशेष महत्व है। कुमाऊं क्षेत्र में मनाई जाने वाली भिटौली परंपरा महिलाओं के प्रति प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। यह पर्व न केवल पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करता है, बल्कि बेटियों और बहनों को यह भरोसा भी दिलाता है कि उनका मायका सदा उनके साथ है।

प्रिंट मीडिया, शैल ग्लोबल टाइम्स/ हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स/संपादक उत्तराखंड राज्य आंदोलनकारी, अवतार सिंह बिष्ट रुद्रपुर, (उत्तराखंड)

भिटौली की परंपरा और महत्व

भिटौली एक ऐसा पर्व है जिसमें माता-पिता अपनी बेटी के ससुराल जाकर उसे नई फसल से बने व्यंजन, मिठाइयां, कपड़े और उपहार देते हैं। पुराने समय में जब बेटियां मायके कम आ पाती थीं, तब यह परंपरा उनके लिए एक संबल बनकर आती थी। आज के आधुनिक युग में शहरी क्षेत्रों में यह परंपरा धनराशि भेजने तक सीमित हो गई है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में यह परंपरा अब भी जीवित है।

भिटौली और लोक कथाएं

भिटौली से जुड़ी ‘भै भूखो-मैं सिती’ नामक लोक कथा इसे और अधिक भावनात्मक बनाती है। इस कथा के अनुसार, एक भाई अपनी बहन के लिए भिटौली लेकर जाता है लेकिन बहन को बिना जगाए ही वापस लौट आता है। जब बहन को इसका पता चलता है, तो वह दुःखी होकर प्राण त्याग देती है और ‘न्यौली’ नाम की चिड़िया बन जाती है। यह लोक कथा हमें परिवार के प्रेम और रिश्तों की गहराई का अहसास कराती है।

भिटौली का बदलता स्वरूप

आज के दौर में डिजिटल साधनों ने इस परंपरा को बदल दिया है, लेकिन हमें अपनी सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखना होगा। यह परंपरा केवल उपहार देने तक सीमित नहीं, बल्कि बेटियों को सम्मान देने और परिवार की भावनात्मक एकता को बनाए रखने का एक सुंदर माध्यम भी है।

उत्तराखंड के लोगों के नाम संदेश

उत्तराखंड की संस्कृति हमारे अस्तित्व की पहचान है। भिटौली जैसी परंपराएं हमें अपने परिवार और मूल्यों से जोड़ती हैं। यदि आप अब तक अपनी बहन को भिटौली नहीं भेज पाए हैं, तो अभी समय है! यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर है जिसे हमें संजोकर रखना होगा। आइए, हम सब मिलकर अपनी जड़ों से जुड़े रहें और आने वाली पीढ़ियों को भी इस परंपरा का महत्व समझाएं।


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