गांधी पार्क रुद्रपुर में उत्तराखंड क्रांति दल का विरोध प्रदर्शन, सरकार का पुतला दहन

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रुद्रपुर का गांधी पार्क एक बार फिर सत्ता के खिलाफ जनआक्रोश का गवाह बना। उत्तराखंड क्रांति दल की जिला कार्यकारिणी द्वारा उत्तराखंड सरकार का पुतला दहन केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह उस टूटते भरोसे, गहराते संदेह और कुचले जाते न्याय का प्रतीक था, जो अंकिता भंडारी हत्याकांड के बाद प्रदेश की आत्मा पर बोझ बन चुका है।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी


अंकिता भंडारी—एक नाम, जो अब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उत्तराखंड की हर बेटी का सवाल बन चुका है। सवाल यह नहीं कि हत्या हुई या नहीं, सवाल यह है कि सच क्यों छुपाया जा रहा है?
सवाल यह नहीं कि आरोपी कौन हैं, सवाल यह है कि वीआईपी कौन है जिसे अब तक सलाखों के पीछे नहीं डाला गया?
पुतला नहीं जला, भरोसा जला
गांधी पार्क में जब उत्तराखंड क्रांति दल के कार्यकर्ताओं ने सरकार का पुतला फूंका, तो असल में वह पुतला नहीं था—
वह न्याय की धीमी गति,
वह सीबीआई जांच को बंद करने का फैसला,
और वह सत्ता के संरक्षण में पलता अपराध तंत्र था, जिसे आग के हवाले किया गया।
कार्यकर्ताओं ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस सरकार को बेटियों की सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए थी, वही सरकार आज सवालों से भाग रही है। नारे गूंजे—
“अंकिता को न्याय दो!”
“सीबीआई जांच बहाल करो!”
“वीआईपी को जेल भेजो!”
ये नारे केवल गुस्से की अभिव्यक्ति नहीं थे, बल्कि उस हताशा का बयान थे, जो हर उस नागरिक के मन में है, जिसने इस मामले में बार-बार सबूत मिटते, गवाह बदलते और जांच की दिशा भटकते देखी है।
सीबीआई जांच से डर क्यों?
उत्तराखंड क्रांति दल ने सबसे बड़ा सवाल यही उठाया—
अगर सरकार बेदाग है, तो सीबीआई जांच से डर क्यों?
सीबीआई जांच को बंद करना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं था, बल्कि यह जनता के मन में यह शंका पैदा करने वाला कदम था कि कहीं न कहीं कुछ ऐसा है, जिसे उजागर होने से रोका जा रहा है।
यह वही सीबीआई है, जिसकी मांग सत्ता में आने से पहले कई नेता खुद किया करते थे। आज जब वही सत्ता में हैं, तो सीबीआई अचानक अविश्वसनीय कैसे हो गई?
वीआईपी कौन है? नाम क्यों नहीं?
अंकिता हत्याकांड में सबसे बड़ा और सबसे डरावना शब्द है—वीआईपी।
एक ऐसा वीआईपी,
जिसके बारे में सब जानते हैं,
जिसकी चर्चा जांच में हुई,
जिसका नाम मीडिया में आया,
लेकिन जिसे आज तक सलाखों के पीछे नहीं डाला गया।
उत्तराखंड क्रांति दल ने साफ कहा कि जिस वीआईपी को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है, उसे बिना देरी जेल भेजा जाए।
अगर कानून सबके लिए समान है, तो फिर यह विशेष रियायत क्यों?
सोशल मीडिया पर उभरे दो नाम: सच्चाई या साजिश?
इस पूरे प्रकरण ने हाल के दिनों में तब और उग्र रूप ले लिया, जब सोशल मीडिया पर दो नए नाम सामने आए।
इन नामों ने प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है।
हालांकि अदालत ही अंतिम सत्य तय करेगी, लेकिन सवाल यह है कि—
इन नामों की निष्पक्ष जांच क्यों नहीं?
क्यों हर बार मामला किसी और दिशा में मोड़ दिया जाता है?
उत्तराखंड क्रांति दल ने अपने आंदोलन में यह भी कहा कि यदि ये नाम झूठे हैं, तो सरकार जांच कर दूध का दूध और पानी का पानी करे। लेकिन अगर इनमें सच्चाई है, तो फिर देरी किस बात की?
अंकिता की मां का सवाल: कौन सुनेगा?
इस आंदोलन में सबसे भारी शब्द वे थे, जो अंकिता की मां की पीड़ा को बयां करते हैं।
एक मां, जो आज भी अपनी बेटी के न्याय की राह देख रही है।
एक मां, जिसे हर बयान, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस, हर राजनीतिक नौटंकी चुभती है।
क्या कोई सरकार, कोई व्यवस्था, किसी मां से यह कह सकती है कि “अब बहुत हो गया”?
उत्तराखंड क्रांति दल: सड़क से सदन तक संघर्ष
उत्तराखंड क्रांति दल ने स्पष्ट कर दिया है कि यह आंदोलन यहीं नहीं रुकेगा।
यह लड़ाई गांधी पार्क से शुरू होकर—
सड़क तक जाएगी,
सदन तक जाएगी,
और जरूरत पड़ी तो अदालत तक जाएगी।
दल का कहना है कि यह केवल अंकिता का मामला नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के स्वाभिमान, उसकी बेटियों की सुरक्षा और लोकतंत्र की विश्वसनीयता का सवाल है।
राजनीति बनाम न्याय
दुखद यह है कि जहां जनता न्याय चाहती है, वहीं राजनीतिक दल इसे राजनीतिक हथियार बना चुके हैं।
कांग्रेस, भाजपा—दोनों आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त हैं।
लेकिन अंकिता का सवाल आज भी वहीं का वहीं खड़ा है।
क्या न्याय केवल चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगा?
क्या हर हत्याकांड को जाति, दल और बयानबाज़ी में उलझा दिया जाएगा?
गांधी पार्क का संदेश साफ है
गांधी पार्क से उठी आवाज़ बिल्कुल साफ है—
पुतले नहीं, सच जलना चाहिए।
बयानों नहीं, सबूतों की जांच होनी चाहिए।
वीआईपी नहीं, कानून सर्वोपरि होना चाहिए।
यदि सरकार वास्तव में बेटियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर है, तो उसे बिना देर किए—
सीबीआई जांच बहाल करनी चाहिए
वीआईपी आरोपी को गिरफ्तार करना चाहिए
सोशल मीडिया पर उभरे नामों की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए
और सबसे जरूरी—अंकिता की मां को जवाब देना चाहिए
सवाल अभी जिंदा है
आज गांधी पार्क में पुतला जला, कल शायद किसी और शहर में जलेगा।
लेकिन जब तक—
अंकिता को न्याय नहीं मिलेगा
दोषियों को सजा नहीं मिलेगी
और सत्ता जवाबदेह नहीं बनेगी
तब तक यह आग बुझने वाली नहीं है।
अंकिता भंडारी केवल एक केस नहीं है—
वह उत्तराखंड की अंतरात्मा का आईना है।
और इस आईने में सरकार को खुद को देखने से डर नहीं लगना चाहिए।
क्योंकि जो सरकार सवालों से डरती है, वह इतिहास में कभी माफ नहीं की जाती।

रूद्रपुर उत्तराखंड पुतला दहन कार्यक्रम में मुख्य रूप से आनंद सिंह असगोला, कांति भागुनि, भुवन जोशी, भानु प्रताप मेहरा , उपेंद्र मेहरा,मोहन काण्डपाल, श्याम सिंह नेगी, एनडी तिवारी, हरीश मेवाड़ी, मदन सिंह मेर, इन्द्र सिंह मनराल, राम सिंह धामी, जीवन सिंह नेगी, बबीता बोहरा, जिला महामंत्री हिंदू बोरा, घना बोरा, पुष्पा जोशी, मंजू पनेरु, तारा देवी


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