

उत्तराखंड राज्य बनने के बाद वर्तमान धामी सरकार एक विरोधाभास बनकर उभरी है। हिंदुत्व के मुद्दे पर, विशेषकर चारधाम में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक जैसे फैसलों के लिए इसे 100 में 100 नंबर दिए जाने चाहिए—यह निर्णय आस्था की रक्षा का सशक्त प्रतीक है। लेकिन दूसरी ओर, भ्रष्टाचार के मामलों में भी यही सरकार 100 में 100 नंबर की हकदार है—दुर्भाग्य से नकारात्मक रूप में। भर्ती घोटालों, जमीन सौदों और प्रशासनिक अनियमितताओं ने शासन की साख पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। अब जनता को तय करना है कि आस्था और ईमानदारी—दोनों में संतुलन कब और कैसे स्थापित होगा।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट,आस्था पर अडिग फैसला, लेकिन भ्रष्टाचार पर असफल व्यवस्था
देहरादून से उठी यह बहस अब केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं रह गई है, बल्कि यह साफ संदेश बन चुकी है कि हिंदू आस्था के प्रश्न पर अब कोई समझौता नहीं होगा। बदरीनाथ और केदारनाथ जैसे पवित्र धामों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का निर्णय हिंदुत्व की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक और साहसिक कदम है—और इस फैसले के लिए राज्य सरकार को 100 में 100 नंबर देना बिल्कुल उचित है।

संपादकीय: हिंदुत्व के नाम पर शिखर, भ्रष्टाचार में भी शिखर — धामी सरकार पर गंभीर सवाल
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यदि किसी सरकार ने दो बिल्कुल विपरीत छोरों को एक साथ छुआ है, तो वह वर्तमान धामी सरकार है। एक तरफ हिंदुत्व के मुद्दों पर लिए गए फैसलों—जैसे धार्मिक स्थलों की मर्यादा की रक्षा—के लिए इसे 100 में 100 नंबर दिए जा सकते हैं, वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार के मामलों में भी यही सरकार 100 में 100 नंबर की “हकदार” बनती दिखाई देती है—और यह प्रदेश के लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।
आज हालात यह हैं कि प्रदेश में भ्रष्टाचार केवल एक समस्या नहीं, बल्कि एक “व्यवस्था” बन चुका है।
भर्ती घोटाले
सरकारी जमीनों पर कब्जे
कमीशनखोरी का खुला खेल
खनन में अनियमितताओं के आरोप
शिक्षा विभाग से लेकर बैंकिंग तंत्र तक घोटालों की चर्चा
रुद्रपुर में करोड़ों की संदिग्ध किताबों का मामला सामने आता है, लेकिन जांच आज भी अधर में लटकी है। सवाल यह है कि क्या बिना राजनीतिक संरक्षण के इतना बड़ा खेल संभव है? क्या इसमें शामिल अधिकारी और तथाकथित शिक्षा माफिया कभी कानून के शिकंजे में आएंगे?
स्थिति इतनी विडंबनापूर्ण हो चुकी है कि यदि कोई आम व्यक्ति छोटी सी गलती कर दे, तो पुलिस तुरंत कार्रवाई करती है। लेकिन बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे लोग बेखौफ घूमते नजर आते हैं। आम धारणा बनती जा रही है—
“छोटा अपराधी डंडे का शिकार, बड़ा भ्रष्टाचारी व्यवस्था का हिस्सा।”
भारतीय जनता पार्टी से जुड़े जनप्रतिनिधियों पर लगातार उठते सवाल यह संकेत देते हैं कि जवाबदेही कहीं पीछे छूट गई है। वहीं जांच एजेंसियां जैसे ईडी और सीबीआई की कार्रवाई भी चयनात्मक होने के आरोपों से घिरी रहती है—जहां छोटे लोग जल्दी निशाने पर आते हैं, लेकिन बड़े मामलों में चुप्पी गहरी हो जाती है।
सबसे गंभीर प्रश्न रोजगार और युवाओं का है।
उत्तराखंड के प्रतिभाशाली युवा—
कोई होटल में बर्तन धो रहा है
कोई छोटे-मोटे काम कर रहा है
कोई अपनी जमीन बेचने को मजबूर है
जबकि नौकरियों में बाहरी लोगों की बढ़ती हिस्सेदारी पर सवाल उठ रहे हैं। यह धारणा मजबूत हो रही है कि योग्यता नहीं, बल्कि पैसों और पहुंच का खेल चल रहा है।
उत्तराखंड जैसे संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में यदि यही स्थिति बनी रही, तो यह केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक असंतुलन का कारण भी बनेगी।
निष्कर्ष: जनता अब जवाब चाहती है
यह संपादकीय स्पष्ट कहना चाहता है—
✔️ हिंदुत्व पर लिए गए मजबूत फैसले सराहनीय हैं
❌ लेकिन भ्रष्टाचार पर चुप्पी अस्वीकार्य है
सरकार को यह समझना होगा कि केवल धार्मिक निर्णयों से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता।
जब तक—
पारदर्शिता नहीं आएगी
भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी
और दोषियों को सजा नहीं मिलेगी
तब तक “सुशासन” केवल एक नारा बनकर रह जाएगा।
अब समय आ गया है कि सत्ता खुद से सवाल पूछे—
क्या वह केवल छवि बना रही है, या सच में व्यवस्था बदलना चाहती है?
✍️ अवतार सिंह बिष्ट
(संपादकीय लेखक)
चारधाम कोई पर्यटन स्थल नहीं हैं। ये सनातन परंपरा की आत्मा हैं, जहां श्रद्धा, नियम और मर्यादा सर्वोपरि हैं। यदि इन पवित्र स्थलों की गरिमा बनाए रखने के लिए प्रवेश के नियम तय किए जाते हैं, तो इसे संकीर्णता नहीं, बल्कि आस्था का संरक्षण कहा जाएगा।
कांग्रेस की राजनीति: आस्था पर सवाल, एजेंडा कुछ और
इस पूरे मुद्दे पर कांग्रेस का रवैया एक बार फिर सवालों के घेरे में है।
हर बार की तरह इस बार भी हिंदू परंपराओं और धार्मिक व्यवस्थाओं को “संविधान” के नाम पर कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई है।
सवाल यह है कि क्या धर्मनिरपेक्षता केवल मंदिरों के लिए ही लागू होती है?
क्या अन्य धर्मस्थलों के नियमों पर भी कभी इस तरह की बहस होती है?
कांग्रेस की यह राजनीति अब छिपी नहीं रह गई है।
यह वही सोच है जो—
“लव जिहाद” जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को नकारती है
“लैंड जिहाद” जैसे खतरों पर चुप्पी साध लेती है
और हिंदू आस्था की रक्षा को “विभाजनकारी” बताती है
स्पष्ट है कि यह सब वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित है, न कि किसी सिद्धांत से।
हिंदुत्व पर निर्णायक फैसला — स्वागत योग्य
राज्य सरकार का यह निर्णय यह दर्शाता है कि अब हिंदू समाज की आस्था के साथ खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा।
यह कदम केवल एक नियम नहीं, बल्कि एक संदेश है—
आस्था सर्वोपरि है, और उसका सम्मान अनिवार्य है।
ऐसे फैसलों से यह भरोसा मजबूत होता है कि परंपराओं की रक्षा के लिए सरकार इच्छाशक्ति रखती है। इस दृष्टि से यह निर्णय वास्तव में ऐतिहासिक और सराहनीय है।
लेकिन… भ्रष्टाचार पर सरकार पूरी तरह विफल
जहां एक ओर सरकार को हिंदुत्व के इस निर्णय पर 100 में 100 नंबर मिलते हैं,
वहीं दूसरी ओर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी उसे 100 में 100 नंबर मिलते हैं—लेकिन नकारात्मक अर्थ में।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जिस स्तर के आरोप और अनियमितताएं वर्तमान व्यवस्था में देखने को मिली हैं, वह चिंताजनक हैं।
भर्तियों में घोटाले
योजनाओं में पारदर्शिता की कमी
जमीन और ठेकों में अनियमितताएं
यह सब उस सच्चाई को उजागर करता है कि व्यवस्था के भीतर भ्रष्टाचार गहराई तक जड़ें जमा चुका है।
दो सच्चाइयाँ, एक फैसला जनता का
आज उत्तराखंड की जनता के सामने एक स्पष्ट तस्वीर है—
✔️ हिंदुत्व की रक्षा — मजबूत और सराहनीय
❌ भ्रष्टाचार पर नियंत्रण — पूरी तरह असफल
सवाल यह नहीं है कि कौन सा पक्ष सही है,
सवाल यह है कि क्या जनता इन दोनों सच्चाइयों को एक साथ स्वीकार करेगी?
निष्कर्ष: चेतावनी और संतुलन
यह संपादकीय स्पष्ट कहना चाहता है—
हिंदू आस्था से खिलवाड़ अब सहन नहीं किया जाएगा
वोट बैंक की राजनीति करने वालों को जनता जवाब देगी
और धार्मिक स्थलों की पवित्रता बनाए रखने के हर प्रयास का समर्थन होगा
लेकिन साथ ही—
सरकार को यह समझना होगा कि केवल धार्मिक निर्णयों से विश्वास नहीं टिकता,
जब तक शासन ईमानदार, पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त न हो।
यदि आस्था की रक्षा करनी है,
तो व्यवस्था को भी उतना ही पवित्र बनाना होगा।




