

उत्तराखंड,अंकिता भंडारी हत्याकांड, जिसे अदालत ने दोषियों को आजीवन कारावास की सजा देकर कानूनी रूप से एक मुकाम तक पहुंचाया, वह मामला आज भी सामाजिक और नैतिक स्तर पर अधूरा दिखाई देता है। फैसला आ चुका है, लेकिन सवाल अब भी ज़िंदा हैं—और शायद पहले से अधिक बेचैन करने वाले।

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
‘ऑडियो गर्ल’ उर्मिला सनावर प्रकरण से उठी हलचल अभी थमी भी नहीं थी कि अब उषा राणा माही नामक महिला की एंट्री ने इस बहुचर्चित हत्याकांड को एक बार फिर सियासी और वैचारिक भूचाल के केंद्र में ला खड़ा किया है। उषा राणा माही ने स्वयं को “उत्तराखंड की बेटी” बताते हुए दावा किया है कि उनके पास ऐसे साक्ष्य सुरक्षित हैं, जो अंकिता के साथ हुई गद्दारी और साजिश की परतें उधेड़ सकते हैं।
सोशल मीडिया पर साझा की गई एक विवादित तस्वीर के जरिए उन्होंने सीधे तौर पर दर्शन भारती की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। भगवा चोले और ‘कालनेमि’ जैसे प्रतीकों का प्रयोग केवल व्यक्तिगत आरोप नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र पर कटाक्ष है, जहां आस्था, सत्ता और संरक्षण की रेखाएं धुंधली हो जाती हैं।
तस्वीरों में आरती गौड़ की मौजूदगी इस विवाद को और गहरा बनाती है, क्योंकि दर्शन भारती पहले सार्वजनिक रूप से उन्हें पहचानने से इनकार कर चुके हैं। यही विरोधाभास अब संदेह को जन्म दे रहा है—क्या कुछ सच जानबूझकर छिपाया गया?
यह भी स्मरणीय है कि जिस उर्मिला सनावर का पता पुलिस नौ दिनों तक नहीं लगा पाई थी, उसे दर्शन भारती ही दिल्ली से देहरादून लेकर आए थे और कथित तौर पर अपने संरक्षण में रखा गया था। सवाल यह है कि यह संरक्षण व्यक्तिगत था या किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा?
16 जनवरी को कोर्ट परिसर में उर्मिला का फोन जमा कराए जाने के बाद यह कहा गया कि “उर्मिला का अध्याय बंद हो चुका है।” लेकिन उषा राणा माही की एंट्री ने यह संकेत साफ कर दिया है कि अंकिता प्रकरण में कई अध्याय अब भी अनपढ़े हैं।
न्यायिक स्थिति और नया संदर्भ
यह निर्विवाद है कि एसआईटी जांच के बाद अदालत ने मुख्य आरोपियों को सजा सुनाई है, जो न्यायिक प्रक्रिया की सफलता का प्रमाण है। लेकिन हालिया ऑडियो वायरल मामला, सार्वजनिक दावे और अब नए ‘साक्ष्यों’ की बात—यह सब यह सोचने पर मजबूर करता है कि
क्या न्याय केवल अपराधियों की सजा तक सीमित था, या पूरे षड्यंत्र की तह तक पहुंचना अब भी बाकी है?
यदि उषा राणा माही के दावे केवल सोशल मीडिया की सनसनी नहीं, बल्कि ठोस प्रमाणों पर आधारित हैं, तो यह मामला फिर से कानूनी, राजनीतिक और नैतिक समीक्षा की मांग करता है। ऐसे में जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे व्यक्ति नहीं, प्रणाली की जांच करें।
असली सवाल
क्या अंकिता केवल एक अपराध की शिकार थी या एक संरक्षित तंत्र की?
क्या कुछ चेहरे आज भी ‘भगवा’ या ‘सफेदपोश’ आवरण में सुरक्षित हैं?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या उत्तराखंड की बेटी को पूरा न्याय मिला?
अंकिता भंडारी अब लौटकर नहीं आएगी, लेकिन यदि सच का एक अंश भी आज दबा रह गया, तो यह सिर्फ एक परिवार नहीं, पूरे उत्तराखंड की आत्मा के साथ अन्याय होगा।
न्याय तभी पूर्ण होगा, जब हर वह चेहरा बेनकाब होगा—




