संपादकीय लेख“भाषा से जीवन तक – कुमाऊँनी सम्मेलन में नेत्रदान का उजाला”✍️ अवतार सिंह बिष्ट

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रुद्रपुर में आयोजित राष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन 2025 केवल भाषा, साहित्य और संस्कृति तक सीमित नहीं रहा — इस बार यह मानवीय संवेदनाओं, जीवनदायिनी सोच और सामाजिक उत्तरदायित्व का भी उत्सव बन गया। सम्मेलन के मंच पर जब नेत्रदान संगठन रुद्रपुर को उत्कृष्ट सामाजिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया, तो यह स्पष्ट संदेश गया कि कुमाऊँनी अस्मिता केवल बोली तक सीमित नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण की भावना से भी जुड़ी है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

सम्मेलन के दौरान डॉ. एल.एम. उप्रेती, डॉ. दीपक भट्ट, हेम पंत और विक्की पाठक जैसे सेवाभावी कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया, जिन्होंने नेत्रदान केंद्र रुद्रपुर को क्षेत्र में एक आदर्श संस्था के रूप में स्थापित किया है। मंच से पूर्व स्वास्थ्य निदेशक एवं वर्तमान में नेत्रदान केंद्र के डायरेक्टर डॉ. एल.एम. उप्रेती ने जो बात रखी, वह केवल एक व्याख्यान नहीं, बल्कि एक जनजागरण का शंखनाद थी।
उन्होंने कहा — “अंगदान से कोई मरता नहीं, बल्कि किसी दूसरे को जीने की नई रोशनी मिलती है।”

डॉ. उप्रेती का यह संदेश सभागार में उपस्थित सैकड़ों शिक्षाविदों, साहित्यकारों और छात्रों के हृदय तक पहुँचा। नेत्रदान के महत्व पर उनके सजीव उदाहरणों ने यह एहसास कराया कि किसी भी समाज की सच्ची प्रगति केवल ज्ञान-संरक्षण में नहीं, बल्कि मानवता के उत्थान में निहित होती है।

डॉ एल,एम उप्रेती डायरेक्टर नेत्रदान केंद्र रूद्रपुर

यह अपने आप में एक प्रेरक संयोग था कि जिस सम्मेलन में कुमाऊँनी भाषा को पाठ्यक्रम और राजभाषा दर्जे की दिशा में ठोस विमर्श हुआ, वहीं मंच से नेत्रदान जैसे जनकल्याणकारी कार्य को भी प्रतिष्ठा दी गई। इसने यह साबित किया कि हमारी मातृभाषा की आत्मा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि करुणा और सह-अस्तित्व की भावना में बसती है।

आज जब समाज भौतिकता की दौड़ में संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है, तब ऐसे आयोजनों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। नेत्रदान केंद्र रुद्रपुर का कार्य वास्तव में कुमाऊँ की उसी मानवीय परंपरा को आगे बढ़ा रहा है, जहाँ दूसरों के लिए जीना ही सबसे बड़ी साधना मानी गई है।

यह दृश्य दिल को छू गया कि भाषा-संरक्षण के मंच से जीवन-संरक्षण का संदेश भी दिया गया। इससे बड़ा संगम शायद ही कोई हो सकता है — जब संस्कृति, सेवा और संवेदना एक साथ खड़ी हों।

कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन में नेत्रदान केंद्र रुद्रपुर का सम्मान केवल एक संस्था का गौरव नहीं, बल्कि समूचे समाज की सोच में बदलाव का प्रतीक है। यह हमें यह भी याद दिलाता है कि अगर हम अपनी बोली, अपनी जड़ों और अपने मानवीय कर्तव्यों के प्रति सजग रहें, तो उत्तराखंड ही नहीं, पूरा भारत “अंधकार से प्रकाश” की राह पर चल सकता है।

समापन में बस इतना ही —
“भाषा आत्मा की पहचान है, और नेत्रदान मानवता की रोशनी।
जब दोनों मिल जाएँ, तो समाज सच में जागृत हो उठता है।”



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