

उत्तराखंड,धन सिंह रावत द्वारा 30 नए विशेषज्ञ चिकित्सकों की तैनाती को मंजूरी—कागज़ों पर यह खबर उम्मीद जगाती है। स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि इससे पर्वतीय जिलों में चिकित्सा सेवाएं मजबूत होंगी और आम जनता को राहत मिलेगी। लेकिन सवाल वही पुराना है—क्या ये नियुक्तियां धरातल पर दिखेंगी भी, या फिर यह भी एक और “घोषणात्मक उपलब्धि” बनकर रह जाएगी?

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
2017 के बाद का सच: वादों का पहाड़, सुविधाओं का अभाव
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2017 के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर बड़े-बड़े वादे किए गए थे। हर जिले में विशेषज्ञ डॉक्टर, हर ब्लॉक में बेहतर अस्पताल और पहाड़ों में आधुनिक सुविधाओं का सपना दिखाया गया। लेकिन आज 2026 में भी हकीकत यह है कि—
पर्वतीय अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी बनी हुई है
कई जगहों पर विशेषज्ञ तो दूर, MBBS डॉक्टर तक उपलब्ध नहीं
उपकरण हैं, लेकिन उन्हें चलाने वाला स्टाफ नहीं
मरीजों को मजबूरी में देहरादून या हल्द्वानी रेफर किया जाता है
मैदान बनाम पहाड़: दो अलग-अलग स्वास्थ्य व्यवस्थाएं
राज्य के मैदानी जिलों—हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर, देहरादून—में स्वास्थ्य सेवाएं अपेक्षाकृत बेहतर हैं। लेकिन जैसे ही आप बागेश्वर, पिथौरागढ़, चमोली या उत्तरकाशी की ओर बढ़ते हैं, तस्वीर बदल जाती है।
डॉक्टरों की तैनाती तो होती है, लेकिन जॉइनिंग के बाद ट्रांसफर या अनुपस्थिति आम बात
कई डॉक्टर पहाड़ों में सेवा देने से कतराते हैं
भवन हैं, लेकिन सेवाएं नहीं
“यूनिट तैनाती” मॉडल—व्यवहार में कितना कारगर?
सरकार ने इस बार विशेषज्ञों को “एक यूनिट” के रूप में तैनात करने का दावा किया है, ताकि समन्वय बेहतर हो। लेकिन जमीनी अनुभव कहता है—
टीम तैनात तो होती है, लेकिन स्थायित्व नहीं होता
कुछ महीनों में ही स्थानांतरण या प्रतिनियुक्ति हो जाती है
स्थानीय जनता को स्थायी स्वास्थ्य सेवा का लाभ नहीं मिल पाता
चारधाम यात्रा बनाम स्थानीय जनता
हर साल चारधाम यात्रा के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सरकार सक्रिय दिखती है। अस्थायी व्यवस्थाएं, अतिरिक्त डॉक्टर, मेडिकल कैंप—सब कुछ होता है।
लेकिन सवाल यह है— क्या स्थानीय ग्रामीणों को भी उतनी ही प्राथमिकता मिलती है?
क्या यात्रा खत्म होते ही स्वास्थ्य सेवाएं फिर से भगवान भरोसे नहीं हो जातीं?
घोषणाएं बनाम जवाबदेही
डॉक्टरों की नियुक्ति के आंकड़े हर साल बढ़ते हैं। लेकिन यदि इनकी मॉनिटरिंग, उपस्थिति और कार्यप्रणाली पर नियंत्रण नहीं, तो यह सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह जाता है।
क्या कभी यह सार्वजनिक किया गया कि—
कितने डॉक्टर वास्तव में तैनात स्थान पर कार्यरत हैं?
कितने ने जॉइनिंग के बाद स्थान छोड़ दिया?
कितने अस्पतालों में विशेषज्ञ सेवाएं नियमित रूप से चल रही हैं?
निष्कर्ष: अब “घोषणा” नहीं, “निगरानी” की जरूरत
उत्तराखंड के पहाड़ सिर्फ वादों से नहीं, व्यवस्थित और स्थायी स्वास्थ्य ढांचे से मजबूत होंगे।
सरकार को चाहिए कि—
डॉक्टरों की तैनाती के साथ कड़ी निगरानी प्रणाली लागू करे
पहाड़ी क्षेत्रों में सेवा देने वाले चिकित्सकों को विशेष प्रोत्साहन और सुरक्षा दे
स्थानीय स्तर पर जवाबदेही तय करे
क्योंकि सच यही है—
जब तक पहाड़ों के अस्पतालों में डॉक्टर स्थायी रूप से नहीं बैठेंगे, तब तक हर नई नियुक्ति सिर्फ एक खबर बनेगी, हकीकत नहीं…




