संपादकीय | रुद्रपुर-देहरादून का सच: जब आपदा चेतावनी बन जाए सत्ता की सुविधा

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देहरादून के मालदेवता और सहस्रधारा क्षेत्र में बीते मानसून की भयावह तबाही ने प्रशासन की आंखें खोल दीं—या यूं कहें कि मजबूरन खोलनी पड़ीं। सौंग नदी के किनारों पर उगे रिजार्ट, कैफे, होटल और पक्के निर्माण जब पानी की गुस्साई धारा में कुछ ही मिनटों में बह गए, तब जाकर सिस्टम को याद आया कि नदी भी अपना अधिकार रखती है। अब 11 दिसंबर तक अवैध कब्जे खुद हटाने का अल्टीमेटम जारी कर दिया गया है, और उसके बाद बुलडोजर चलेगा। यह स्थिति बताती है कि यदि विकास के नाम पर प्रकृति के गले में ही फंदा डाल दिया जाए तो किसी न किसी दिन उसका प्रतिकार भी उतना ही कठोर होता है।

✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

देहरादून की रिस्पना से लेकर बिंदाल, टोंस, सुसवा, सोंग और तमसा तक—कुल 12 नदियां… लेकिन हर ओर एक ही कहानी: नदियों की प्राकृतिक चौड़ाई पर कब्जा, धारा मोड़कर होटल, पक्के निर्माण, पेड़ों की कटाई और हर मानसून में दोगुने जोखिम की सरकार-निर्मित स्थिति। टिहरी में सौंग नदी पर निर्माण पर पूरी तरह रोक—और देहरादून में उसी नदी के किनारे ‘अबाध निर्माण’—यह दोहरी नीतियां प्रशासन को कठघरे में खड़ा करती हैं।


रुद्रपुर—उधम सिंह नगर,जहाँ देहरादून की कहानी दोहराई जा रही है, पर उससे भी अधिक खतरनाक रूप में

देहरादून की समस्या जितनी गंभीर है, उतनी ही चिंताजनक तस्वीर रुद्रपुर के आसपास भी उभर रही है। यहाँ भी नदियों, नालों और जलधाराओं का स्वाभाविक प्रवाह लगातार अतिक्रमण और अवैध निर्माणों से बाधित किया जा रहा है। शहर की तेज़ी से बढ़ती आबादी और भूमि कारोबारियों की भूख ने रिंग रोड से लेकर जगतपुरा ट्रांजिट कैंप, खेड़ा, गदरपुर कल्याणी नदी, मटकोटा, अमाऊं, बरखेड़ा और शेरवानी, खटीमा सहित कई इलाकों को जल-जोख़िम का क्षेत्र बना दिया है।

जिस तरह देहरादून में रिजार्ट और कैफे नदी की धारा में अड़ंगा डाल रहे हैं, उसी तरह रुद्रपुर में नाले पटे जा रहे हैं, जलधाराएँ मूड़ी जा रही हैं, और जहां पानी का निकलना ही असंभव हो गया है, वहाँ बहुमंज़िला कंक्रीट का जंगल उगाया जा रहा है।

2023 और 2024 के मानसून में रुद्रपुर जो बहाव झेल चुका है, वह कोई सामान्य घटना नहीं थी। अमाऊं में पानी घरों में घुसा, ट्रांजिट कैंप में सड़कें तालाब बनीं, और पुराने रिंग रोड किनारे कई परिवारों को ऊँचे स्थानों पर शरण लेनी पड़ी। समस्या वही है—प्रकृति की जमीन पर कब्जा और प्रशासन की ‘आपदा के बाद सक्रियता’ वाली आदत।


रुद्रपुर में भी चाहिए देहरादून जैसी सख्ती—वरना खतरा और बढ़ेगा

देहरादून में सिंचाई विभाग कम-से-कम जागा तो है। नोटिस दिए हैं, मुनादी कराई है, और 11 दिसंबर के बाद बुलडोजर की घोषणा कर दी है।

लेकिन रुद्रपुर में?

यहाँ नगर निगम, जिला प्रशासन और विकास प्राधिकरण की धीमी गति और राजनीतिक संरक्षण ने स्थिति 더 ख़तरनाक बना दी है। जलभराव को रोकने के लिए नालों की चौड़ाई बढ़ाने की योजनाएँ फाइलों में धूल खा रही हैं। अवैध प्लॉटिंग और नाले-पट्टी पर कॉलोनियों का कारोबार चरम पर है, और कई जगह तो प्रशासन स्वयं निवेशकों के आगे बेबस दिखाई देता है।

जब देहरादून के 12 बड़े नदी तंत्र पर अतिक्रमण आपदा की चेतावनी बन चुका है, तब यह समझना चाहिए कि रुद्रपुर के नाले भी कम ख़तरनाक नहीं—क्योंकि यहाँ बाढ़ का पानी सीधे हजारों घरों में घुसता है और नुकसान की तीव्रता कहीं अधिक होती है।


समाधान—घोषणाओं से नहीं, क्रियान्वयन से

  1. रुद्रपुर में भी नदी-नाला सुरक्षा क्षेत्र घोषित किए जाएँ।
  2. नाले-पट्टी पर बनी कॉलोनियों और अवैध निर्माणों की सूची सार्वजनिक की जाए।
  3. देहरादून की तरह समयबद्ध अल्टीमेटम और उसके बाद कठोर कार्रवाई अनिवार्य हो।
  4. जलभराव रोकने के लिए वैज्ञानिक ड्रेनेज मास्टर प्लान लागू किया जाए।
  5. राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अतिक्रमणकर्ताओं पर भी समान रूप से कार्रवाई हो।

निष्कर्ष

देहरादून में अब देर से ही सही—सिस्टम जागा है। लेकिन रुद्रपुर में अभी भी नींद गहरी है। यहाँ भी यदि प्रकृति का रास्ता नहीं छोड़ा गया, तो आने वाले वर्षों में रुद्रपुर का हर मानसून आपदा बनकर आएगा।

प्रशासन को समझना चाहिए—
नदी, नाला, जलधारा—कभी किसी के बाप की जागीर नहीं रही।
वे अपनी राह खुद बनाती हैं—और अगर कोई रास्ता रोकेगा तो उसे बहाकर ले जाएँगी।

रुद्रपुर को देहरादून से सबक लेना होगा—
वरना अगली चेतावनी बाढ़ नहीं, विनाश होगी।


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