ऊर्जा प्रदेश और बिजली का बढ़ता बोझ : उपभोक्ताओं की जेब पर हर महीने नई आपदा

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ऊर्जा प्रदेश की विडंबनाउत्तराखंड को देशभर में ऊर्जा प्रदेश कहा जाता है। जलविद्युत परियोजनाओं की अपार संभावनाओं और बिजली उत्पादन के लिए अनुकूल भूगोल के बावजूद, यहां के उपभोक्ता लगातार महंगे बिजली बिलों की मार झेल रहे हैं। सितंबर 2025 की शुरुआत में ही ऊर्जा निगम ने लगभग 30 लाख उपभोक्ताओं पर फ्यूल एंड पावर परचेज कास्ट एडजस्टमेंट (FPPCA) के नाम पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। यह बढ़ोतरी आठ पैसे से लेकर 33 पैसे प्रति यूनिट तक की है।


✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी

विडंबना यह है कि यह फैसला ऐसे समय में लिया गया जब प्रदेश बारिश, भूस्खलन और आपदाओं से जूझ रहा है। आम जनता, खासकर गरीब तबका और किसान, पहले से ही महंगाई और प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त हैं। ऐसे माहौल में बिजली दरों में बढ़ोतरी किसी राहत की बजाय नई आपदा के समान है।


सितंबर की दर वृद्धि का विवरण?ऊर्जा निगम की ओर से मुख्य अभियंता (कमर्शियल) डी.एस. खाती द्वारा जारी आदेश के मुताबिक, विभिन्न श्रेणियों के उपभोक्ताओं पर अलग-अलग दर से बोझ डाला गया है—

  • बीपीएल उपभोक्ता – 8 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त।
  • घरेलू उपभोक्ता – 22 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त।
  • कमर्शियल उपभोक्ता – 31 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त।
  • सरकारी संस्थान – 29 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त।
  • निजी ट्यूबवेल (किसान) – 10 पैसे प्रति यूनिट अतिरिक्त।
  • कृषि आधारित उपभोक्ता
    • 25 किलोवाट वाले – 13 पैसे प्रति यूनिट।
    • 25 से 75 किलोवाट – 14 पैसे प्रति यूनिट।
    • 75 किलोवाट से ऊपर – 15 पैसे प्रति यूनिट।
  • एलटी और एचटी इंडस्ट्री – 29 पैसे प्रति यूनिट।
  • मिक्स्ड लोड उपभोक्ता – 27 पैसे प्रति यूनिट।
  • रेलवे और ई-व्हीकल चार्जिंग स्टेशन – 27 पैसे प्रति यूनिट।
  • अस्थायी कनेक्शन – 33 पैसे प्रति यूनिट।

इससे साफ है कि कोई भी श्रेणी बची नहीं है। आम घरों से लेकर किसान, छोटे व्यापारी, उद्योग और परिवहन तक, सभी को इस नई दर वृद्धि का असर झेलना पड़ेगा।


गरीब और किसानों पर दोहरी मार?सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि इस बढ़ोतरी का सीधा असर गरीब परिवारों और किसानों पर पड़ेगा।

  • बीपीएल उपभोक्ता, जिन्हें सरकार बार-बार मुफ्त और सस्ती बिजली का आश्वासन देती है, अब आठ पैसे प्रति यूनिट अधिक देंगे। यह राशि सुनने में भले कम लगे, लेकिन महीने भर का बिल जब बढ़ेगा तो गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की रसोई पर सीधा असर पड़ेगा।
  • किसानों के निजी ट्यूबवेल पर 10 पैसे प्रति यूनिट और कृषि आधारित उपभोक्ताओं पर 13 से 15 पैसे प्रति यूनिट का बोझ डाला गया है। इससे सिंचाई महंगी होगी और पहले से महंगे बीज, खाद व डीजल के बीच किसानों की लागत और बढ़ेगी। परिणामस्वरूप खाद्यान्न व सब्जियों की कीमतों में और बढ़ोतरी होगी, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ता पर ही आएगा।

घरेलू उपभोक्ता और महंगाई का दंश?घरेलू उपभोक्ताओं को 22 पैसे प्रति यूनिट की दर वृद्धि झेलनी होगी। आम परिवार पहले ही महंगाई, स्कूल फीस, सिलेंडर और रोजमर्रा की बढ़ती जरूरतों से परेशान हैं। अब बिजली बिल भी जेब ढीली करेगा।

गांवों और कस्बों में रहने वाले लोग, जहां आय सीमित है, वहां यह बढ़ोतरी और भी ज्यादा महसूस होगी। शहरों में रहने वाले मध्यम वर्गीय परिवार, जिनके पास फ्रिज, कूलर, पंखे, वॉशिंग मशीन, गीजर जैसी मूलभूत सुविधाएं हैं, उन्हें भी महीने के अंत में बिजली बिल भारी लगने लगेगा।


व्यापार और उद्योग पर असर?छोटे व्यापारी (31 पैसे प्रति यूनिट) के बोझ तले दबेंगे। दुकानें चलाना, छोटी फैक्ट्रियां चलाना और उत्पादन लागत सब महंगा हो जाएगा।

  • एलटी और एचटी इंडस्ट्री पर 29 पैसे प्रति यूनिट की दर वृद्धि का मतलब है कि उद्योगों की उत्पादन लागत बढ़ेगी। इससे रोजगार सृजन की संभावना घटेगी और पहले से जूझते उद्योगों पर संकट गहराएगा।
  • मिक्स्ड लोड उपभोक्ता (27 पैसे) और अस्थायी कनेक्शन वाले उपभोक्ता (33 पैसे) भी राहत से वंचित हैं।

यह दर वृद्धि निवेशकों के लिए भी नकारात्मक संदेश देती है। प्रदेश में पहले से ही औद्योगिक निवेश की स्थिति संतोषजनक नहीं है। अगर बिजली महंगी होती रही तो नए उद्योग स्थापित होने की बजाय पुराने उद्योग भी धीरे-धीरे बाहर का रुख करेंगे।


ऊर्जा प्रदेश की सच्चाई : उत्पादन बनाम उपभोग?उत्तराखंड को ‘ऊर्जा प्रदेश’ कहा जाता है क्योंकि यहां नदियों पर कई जलविद्युत परियोजनाएं हैं। यहां की जलविद्युत उत्पादन क्षमता 25,000 मेगावाट से अधिक आँकी जाती है, लेकिन राज्य इस क्षमता का बहुत छोटा हिस्सा ही उपयोग कर पा रहा है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि—

  • जलविद्युत परियोजनाओं को समय पर पूरा नहीं किया जाता।
  • ट्रांसमिशन लॉस (बिजली के वितरण में नुकसान) बहुत ज्यादा है।
  • कई बार बिजली निजी कंपनियों से ऊंचे दामों पर खरीदी जाती है।

इन सबका परिणाम यह होता है कि उत्तराखंड जैसे राज्य, जो खुद बिजली पैदा करता है, वहां के उपभोक्ता महंगे बिल भरने को मजबूर हैं।


निगम घाटा और उपभोक्ताओं पर बोझ?ऊर्जा निगम बार-बार घाटे का हवाला देता है। लेकिन सवाल यह है कि यह घाटा आखिर क्यों हो रहा है?

  • क्या ट्रांसमिशन लॉस की जिम्मेदारी उपभोक्ता की है?
  • क्या भ्रष्टाचार और कुप्रबंधन का बोझ जनता पर डाला जाना उचित है?
  • क्यों हर बार बिजली की दरें बढ़ाकर घाटा पाटा जाता है, जबकि निगम और सरकार अपनी जवाबदेही तय करने से बचते हैं?

यह स्थिति उस डॉक्टर की तरह है जो अपनी लापरवाही से मरीज को बीमार कर दे और फिर इलाज का पूरा खर्च उसी मरीज से वसूल ले।


ई-व्हीकल और हरित ऊर्जा पर चोट?उत्तराखंड सरकार पर्यावरण और हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने के दावे करती है। लेकिन इलेक्ट्रिक व्हीकल चार्जिंग स्टेशन पर 27 पैसे प्रति यूनिट की बढ़ोतरी हरित परिवहन को बढ़ावा देने की दिशा में उलटा कदम है। इससे ई-वाहनों की चार्जिंग महंगी होगी और लोग फिर से पेट्रोल-डीजल की ओर लौट सकते हैं।


विकल्प और समाधान?अगर सरकार वास्तव में उपभोक्ताओं को राहत देना चाहती है तो उसे केवल दरें बढ़ाकर घाटा पूरा करने की बजाय दीर्घकालिक समाधान ढूंढने होंगे—

  1. ऊर्जा प्रबंधन में पारदर्शिता – निगम को साफ बताना चाहिए कि घाटा कहां और क्यों हो रहा है।
  2. स्थानीय उपभोक्ताओं को प्राथमिकता – प्रदेश से बाहर बिजली बेचने से पहले यह सुनिश्चित किया जाए कि राज्य के उपभोक्ताओं को सस्ती दर पर आपूर्ति मिले।
  3. जलविद्युत परियोजनाओं का समय पर पूरा होना – अधूरी परियोजनाएं जनता के पैसों की बर्बादी हैं।
  4. नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान – सौर और पवन ऊर्जा से स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
  5. किसानों और गरीब उपभोक्ताओं को सब्सिडी – बीपीएल और कृषि वर्ग को विशेष राहत मिलनी चाहिए।

ऊर्जा प्रदेश का सपना बनाम हकीकत?उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश कहकर गर्व तो जताया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि यहां का उपभोक्ता हर महीने बिजली के बढ़ते बिलों से परेशान है।जब गरीब परिवार, किसान और उद्योग सभी बढ़ती दरों से जूझ रहे हों, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि “ऊर्जा प्रदेश” का असली फायदा आखिर किसे मिल रहा है?बिजली सस्ती, सुगम और भरोसेमंद तभी होगी जब सरकार और ऊर्जा निगम अपने प्रबंधन में पारदर्शिता लाएंगे। वरना उपभोक्ताओं के लिए बिजली का बिल हर महीने एक नई आपदा की तरह दस्तक देता रहेगा।



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