

लाल सलाम से भगवा तक: जब पत्रकारिता विचारधाराओं की कैदी बन गई
(निष्पक्ष पत्रकारिता के पतन का वैचारिक विश्लेषण)

देवभूमि उत्तराखंड और कम्युनिस्ट पत्रकारिता: एक वैचारिक टकराव,उत्तराखंड केवल भौगोलिक राज्य नहीं, यह आस्था, संस्कृति और राष्ट्रचेतना की भूमि है। लेकिन कम्युनिस्ट पत्रकारिता इस देवभूमि को भी वर्ग-संघर्ष, ब्राह्मणवाद और कथित वंचना के चश्मे से ही देखने की ज़िद पर अड़ी रही है। मंदिर, तीर्थ, सेना, सीमांत सुरक्षा और लोकपरंपराएँ—सब इनके लिए संदेह के विषय हैं। यह पत्रकारिता विकास, पलायन और रोजगार जैसे असली मुद्दों से ज़्यादा सांस्कृतिक विघटन में रुचि लेती है। देवभूमि में विचारधारात्मक ज़हर घोलना पत्रकारिता नहीं, समाज को तोड़ने का प्रयास है—और यही उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
✍️ अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी
भारतीय पत्रकारिता कभी सत्ता से सवाल करने का साहस थी, समाज का दर्पण थी और आम जन की आवाज़ हुआ करती थी। लेकिन आज वही पत्रकारिता तीन खेमों में बंटी हुई दिखाई देती है—कम्युनिस्ट ‘लाल सलाम’ पत्रकारिता, कांग्रेस समर्थित कथित उदार पत्रकारिता, और हिंदुत्व की झंडाबरदार पत्रकारिता। इन तीनों के बीच जो टकराव है, उसमें सबसे ज्यादा घायल हुई है—निष्पक्ष, जनपक्षधर और सत्यनिष्ठ पत्रकारिता।
आज सवाल यह नहीं है कि कौन-सी विचारधारा सही है, बल्कि यह है कि क्या पत्रकारिता का काम किसी विचारधारा का प्रचार करना है, या सच को सामने लाना?
पत्रकारिता और विचारधारा: स्वाभाविक रिश्ता या खतरनाक गठजोड़?
यह सत्य है कि कोई भी पत्रकार पूर्णतः विचारधाराहीन नहीं होता। समाज, परिवेश, शिक्षा और अनुभव किसी न किसी दृष्टिकोण को जन्म देते हैं। लेकिन जब विचारधारा समाचार से ऊपर बैठ जाए, तब पत्रकारिता मरने लगती है।
आज भारत में पत्रकारिता तीन स्पष्ट खेमों में सिमटती जा रही है—
कम्युनिस्ट / वामपंथी (लाल सलाम) पत्रकारिता
कांग्रेस-केन्द्रित ‘लिबरल’ पत्रकारिता
हिंदुत्व-समर्थक राष्ट्रवादी पत्रकारिता
इन तीनों ने अपने-अपने तरीके से पत्रकारिता की आत्मा को चोट पहुंचाई है।
1. लाल सलाम पत्रकारिता: वर्ग संघर्ष से सत्ता संरक्षण तक
वामपंथी पत्रकारिता का जन्म शोषण, असमानता और पूंजीवाद के विरोध के नाम पर हुआ था। शुरुआती दौर में इसने मजदूरों, किसानों और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद की।
लेकिन समय के साथ यह पत्रकारिता विचारधारा की कठोर कैद में फंस गई।
मुख्य लक्षण
राष्ट्रवाद शब्द से चिढ़
सेना, पुलिस और सुरक्षा बलों पर लगातार संदेह
हर परंपरा को ‘ब्राह्मणवादी षड्यंत्र’ बताना
इस्लामी कट्टरता पर मौन, लेकिन हिंदू परंपराओं पर आक्रामकता
चुनाव हारने पर जनता को ‘अशिक्षित’ बताना
यह पत्रकारिता आज जनपक्षधर कम और सत्ता-विरोध के नाम पर चयनित विरोध ज्यादा बन गई है। सवाल यह नहीं कि सरकार गलत नहीं करती, सवाल यह है कि गलतियाँ केवल एक ही तरफ क्यों दिखाई जाती हैं?
जब कश्मीर में आतंकवाद हो, बंगाल में वाम हिंसा हो, या केरल में राजनीतिक हत्याएँ हों—तब लाल सलाम पत्रकारिता का कैमरा अक्सर बंद क्यों हो जाता है?
2. कांग्रेससी पत्रकारिता: ‘उदारता’ की आड़ में राजनैतिक एजेंडा
कांग्रेस समर्थित पत्रकारिता स्वयं को “लिबरल”, “सेक्युलर” और “बुद्धिजीवी” कहती है। लेकिन इसकी निष्पक्षता पर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—
क्या यह पत्रकारिता सत्ता में रहते हुए कांग्रेस से सवाल करती थी?
आपातकाल, 1984 के सिख दंगे, बोफोर्स, 2G, कोयला घोटाला—इन सब पर यह पत्रकारिता या तो चुप रही, या बहुत नरम।
मुख्य विशेषताएँ
गांधी परिवार को लोकतंत्र का पर्याय दिखाना
विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस को ‘नैतिक विकल्प’ बनाना
हिंदू पहचान पर सवाल, लेकिन अल्पसंख्यक राजनीति पर मौन
चुनावी हार के बाद EVM, मीडिया और जनता को दोष
यह पत्रकारिता राजनीतिक हार को वैचारिक संकट में बदलने की कला में माहिर है। सत्ता से सवाल कम और सत्ता की वापसी की रणनीति ज्यादा दिखाई देती है।
3. हिंदुत्व पत्रकारिता: राष्ट्रवाद या अंधभक्ति?
हिंदुत्व पत्रकारिता का उदय कांग्रेस-वाम गठजोड़ के प्रतिरोध में हुआ। इसने राष्ट्रवाद, संस्कृति और बहुसंख्यक समाज की उपेक्षा जैसे मुद्दों को उठाया—जो जरूरी भी थे।
लेकिन धीरे-धीरे यह पत्रकारिता भी सत्ता के अत्यधिक समीप चली गई।
मुख्य समस्याएँ
सरकार की हर नीति को सही ठहराना
आलोचना को देशद्रोह बताना
सत्ता समर्थित नेताओं को संत और विपक्ष को राक्षस दिखाना
सवाल पूछने वाले पत्रकारों को “एंटी नेशनल” ठहराना
जब पत्रकार सत्ता का प्रवक्ता बन जाए, तब वह पत्रकार नहीं, प्रचारक बन जाता है।
तीनों का साझा अपराध: सच से विश्वासघात
लाल सलाम, कांग्रेससी और हिंदुत्व पत्रकारिता—तीनों ने मिलकर—
खबर को विचारधारा का हथियार बनाया
पत्रकारिता को युद्धभूमि बना दिया
आम पाठक और दर्शक का भरोसा तोड़ा
तथ्य से ज्यादा भावना और नफरत बेची
आज न्यूज़रूम में सवाल यह नहीं होता कि सच क्या है, बल्कि यह होता है कि—
“इस खबर से हमारी विचारधारा को फायदा होगा या नुकसान?”
निष्पक्ष पत्रकारिता: सबसे बड़ा शिकार
सबसे दुखद स्थिति उन पत्रकारों की है जो न लाल सलाम हैं, न कांग्रेस के प्रवक्ता, न सत्ता के भक्त।
ये पत्रकार—
नौकरी खोते हैं
विज्ञापन से वंचित रहते हैं
सोशल मीडिया पर ट्रोल होते हैं
‘दोनों तरफ से गालियाँ’ खाते हैं
लेकिन यही पत्रकारिता की अंतिम उम्मीद हैं।
पत्रकारिता के गिरते स्तर के कारण
कॉरपोरेट और राजनीतिक नियंत्रण
टीआरपी और क्लिकबेट की भूख
सोशल मीडिया की अफवाह संस्कृति
प्रशिक्षित पत्रकारों की जगह कार्यकर्ता
नैतिक शिक्षा का अभाव
समाधान: क्या अभी भी कुछ बचा है?
हाँ, अगर—
पत्रकार सवाल पूछने का साहस लौटाएँ
पाठक विचारधारा से ऊपर सच को चुनें
विज्ञापन नहीं, विश्वसनीयता को पूंजी माना जाए
पत्रकार संगठन सत्ता के नहीं, पत्रकारों के हों
पत्रकारिता किसी पार्टी की बपौती नहीं
पत्रकारिता का धर्म न लाल है, न सफेद, न भगवा।
उसका रंग केवल सच होना चाहिए।
जिस दिन पत्रकार यह तय कर ले कि—
“मेरा धर्म मेरी विचारधारा नहीं, मेरी जिम्मेदारी है”
उसी दिन भारतीय लोकतंत्र फिर से मजबूत होगा।
उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की हिंदुत्व विचारधारा से प्रभावित पत्रकारिता अक्सर सत्ता-समर्थक, भावनात्मक और चयनित मुद्दों पर केंद्रित दिखाई देती है। यह पत्रकारिता विकास, धर्म और राष्ट्रवाद को एक ही फ्रेम में प्रस्तुत करती है, जबकि जनसमस्याओं, बेरोजगारी, पलायन और भ्रष्टाचार जैसे सवाल कई बार हाशिये पर चले जाते हैं। आलोचनात्मक दृष्टि की जगह प्रचारात्मक भाषा हावी रहती है, जिससे पत्रकारिता की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े होते हैं।
उत्तराखंड में कांग्रेस पार्टी की पत्रकारिता प्रायः सत्ता-विरोध तक सीमित दिखाई देती है। पार्टी से जुड़े कई कथित पत्रकार स्वतंत्र रिपोर्टिंग के बजाय राजनीतिक एजेंडा आगे बढ़ाते नजर आते हैं। जनहित के मुद्दों पर गहन खोजी पत्रकारिता कम और प्रेस विज्ञप्तियों, आरोप-प्रत्यारोप व बयानबाजी पर अधिक निर्भरता दिखती है। इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं और जनता तक तथ्यात्मक, संतुलित सूचना पहुंचने में बाधा आती है।
उत्तराखंड राज्य के संदर्भ में उत्तराखंड क्रांति दल की पत्रकार विचारधारा जनपक्षधर, संघर्षशील और मूल राज्य आंदोलन की भावना से जुड़ी है। यह पत्रकारिता सत्ता, सरकार और तंत्र से प्रश्न पूछने का साहस रखती है तथा पलायन, बेरोजगारी, भूमि-जल-जंगल, मूल निवास और स्थानीय अधिकारों जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देती है। उत्तराखंड क्रांति दल की पत्रकार सोच विज्ञापन या दबाव नहीं, बल्कि सच, संवेदना और राज्यहित को केंद्र में रखकर जनचेतना जगाने का कार्य करती है।
उत्तराखंड में निष्पक्ष पत्रकारिता को राज्य आंदोलनकारी पत्रकारों ने नैतिक साहस, जनपक्षधरता और सत्यनिष्ठा से दिशा दी। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने सत्ता, प्रशासन और माफिया के दबाव में झुके बिना जनआंदोलन, शोषण और लोकहित के मुद्दों को निर्भीकता से उजागर किया।




