उत्तराखंड में 17 अगस्त को घी त्यार,घी संक्रांति । सिंह संक्रांति ,ओगली संक्रांति , पर्वतीय आंचल में देसी घी से बनाए जाएंगे पकवान, किसी न किसी रूप में घी खाना होता है अनिवार्य।

Spread the love

किसी न किसी रुप में घी खाना अनिवार्य माना जाता है। ऐसी भी पीखाता वह अगले जन्म में गण्याल(घोंघा) बनता है। गाय के घी को प्रसाद स्वरुप सिर पर रखा जाता है और छोटे बच्चों की तालू (सिर के मध्य) पर मला जाता है। इसे घृत संक्रान्ति, सिंह संक्रान्ति या ओलगी संक्रान्ति भी कहा जाता है।

पहाड़ों में बरसात के मौसम में पर्याप्त मात्रा में हरी घास और चारा पशुओं को दिया जाता है। जिसके फलस्वरुप पर्याप्त मात्रा में पशुधन (दूध-दही-घी) प्राप्त होता है, इस त्यौहार में उनसे प्राप्त पशुधन को भी पर्याप्त इस्तेमाल किया जाता है। इस दिन दाल की भरवां रोटियां विशेष रुप से तैयार की जाती है और कटोरे में शुद्ध घी के साथ डुबोकर खाई जाती हैं, पिनालू (अरबी) की और गाबे की सब्जी भी इस दिन विशेष रुप से बनाई जाती है। घर में घी से विभिन्न पारम्परिक पकवान बनाये जाते हैं।

निवेदक उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद journalist from Uttarakhand group

स्थानीय बोली में इसे ओलगिया भी कहते हैं। पहले चन्द राजवंश के समय अपनी कारीगरी तथा दस्तकारी की चीजों को दिखाकर शिल्पकार लोग इस दिन पुरस्कार पाते थे तथा अन्य लोग भी साग-सब्जी, फल-फूल, दही-दूध, मिष्ठान्न तथा नाना प्रकार की उत्तम चीज राज दरबार में लाते थे। यह ’ओलगे’ की प्रथा कहलाती थी। राजशाही खत्म होने के बाद भी गांव के प्रधानों के घर में यह सब चीजें ले जाने का प्रचलन था, लेकिन अब यह प्रथा विलुप्ति की कगार पर है।

इस दिन घर के मुख्य दरवाजे पर अनाज की एक बाली को गोबर से थापने की भी परम्परा है, जो इस बात का द्यौतक है कि यह त्यौहार प्रकृति, कृषि, पशु और मानव सभ्यता के बीच स्थाई संबंध को परिलक्षित और मजबूत करने वाला ऋतु आधारित लोक त्यौहार है। पहले समय में जब मनोरंजन के भौतिक साधनों की कमी थी तो उस समय इन्हीं छोटे-बड़े त्यौहारों के माध्यम से मनुष्य के जीवन में प्रसन्नता का संचार होता था। अंत में आप सभी को कल सत्रह अगस्त को आने वाली घृत संक्रांति की अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं। उत्तराखंड , पौराणिक समय से यहाँ की सभ्यता जल , जंगल और जमीन से मिलने वाले संसाधन पर निर्भय रही है | प्रकर्ति और किसानो का उत्तराखंड के लोक जीवन में अत्यधिक महत्व रहा है | सौर मासीय पंचांग के अनुसार सूर्य एक राशि में संचरण करते हुए जब दूसरी राशि में प्रवेश करता है तो उसे संक्रांति कहते हैं।

इस तरह बारह संक्रांतियां होती हैं .इस को भी शुभ दिन मानकर कई त्योहार मनाये जाते हैं । और इन्ही त्यौहार में से एक है “घी तयार” | घी त्यार क्यों मनाया जाता है | उत्तराखंड में “घी त्यार” क्यों मनाया जाता है ? उत्तराखण्ड में हिन्दी मास (महीने) की प्रत्येक १ गते यानी संक्रान्ति को लोक पर्व के रुप में मनाने का प्रचलन रहा है। उत्तराखंड में यूं तो प्रत्येक महीने की संक्रांति को कोई त्योहार मनाया जाता है।

भाद्रपद (भादो)महीने की संक्रांति जिसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं । इस दिन सूर्य “सिंह राशि” में प्रवेश करता है और इसलिए इसे सिंह संक्रांति भी कहते हैं। उत्तराखंड में भाद्रपद संक्रांति को ही घी संक्रांति के रूप में मनाया जाता है। यह त्यौहार भी हरेले की ही तरह ऋतु आधारित त्यौहार है, हरेला जिस तरह बीज को बोने और वर्षा ऋतू के आने के प्रतीक का त्यौहार है | वही “घी त्यार” अंकुरित हो चुकी फसल में बालिया के लग जाने पर मनाये जाने वाला त्यौहार है | यह खेती बाड़ी और पशु के पालन से जुड़ा हुआ एक ऐसा लोक पर्व है | जो की जब बरसात के मौसम में उगाई जाने वाली फसलों में बालियाँ आने लगती हैं ।

तो किसान अच्छी फसलों की कामना करते हुए ख़ुशी मनाते हैं। फसलो में लगी बालियों को किसान अपने घर के मुख्य दरवाज़े के ऊपर या दोनों और गोबर से चिपकाते है | इस त्यौहार के समय पूर्व में बोई गई फसलों पर बालियां लहलहाना शुरु कर देती हैं। साथ ही स्थानीय फलों, यथा अखरोट आदि के फल भी तैयार होने शुरु हो जाते हैं। पूर्वजो के अनुसार मान्यता है कि अखरोट का फल घी-त्यार के बाद ही खाया जाता है ।

इसी वजह से घी तयार मनाया जाता है | उत्तराखंड का पर्व “घी त्यार ” उत्तराखंड में “घी त्यार” का महत्व | उत्तराखंड में घी त्यार किसानो के लिए अत्यंत महत्व रखता है | और आज ही के दिन उत्तराखंड में गढ़वाली , कुमाउनी सभ्यता के लोग घी को खाना जरुरी मानते है | क्युकी घी को जरुरी खाना इसलिए माना जाता है क्युकी इसके पीछे एक डर भी छिपा हुआ है | वो डर है घनेल ( घोंगा ) (Snail) का | पहाड़ों में यह बात मानी जाती है कि जो घी संक्रांति के दिन जो व्यक्ति घी का सेवन नहीं करता वह अगले जन्म में घनेल (घोंघा) (Snail) बनता है । इसलिए इसी वजह से है कि नवजात बच्चों के सिर और पांव के तलुवों में भी घी लगाया जाता है । यहां तक उसकी जीभ में थोड़ा सा घी रखा जाता है । इस दिन हर परिवार के सदस्य जरूर घी का सेवन करते है ।

जिसके घर में दुधारू पशु नहीं होते गांव वाले उनके यहां दूध और घी पहुंचाते हैं | बरसात में मौसम में पशुओं को खूब हरी घास मिलती है । जिससे की दूध में बढ़ोतरी होने से दही -मक्खन -घी की भी प्रचुर मात्रा मिलती है |पहाड़ों में पलायन की स्थिति एवं शहरी क्षेत्र में निवास कर रहे पहाड़ी जनमानस अब पशुधन की तरफ नई पीढ़ी विमुख होती जा रही है।। इसी के परिणामस्वरूप इस बार घी त्यौहार डेरी उत्पादकों पर निर्भर रहेगी।। चमोली जनपद पर अपने पशुओं के लिए चारा ला रही है महिलाओं पर जिस तरह से उत्तराखंड सरकार के नुमाइंदों ने घसियारी महिलाओं को थाने पर पाठ 10 घंटे उत्पीड़न किया उससे भी आने वाली नई पीढ़ी पशुधन की तरफ मुख मोड़ चुकी है।।

दूसरी ओर पहाड़ के जंगलों में आए दिन जंगली जानवरों के द्वारा इंसानों पर हमले बढ़े हैं।। वही पशुधन पर निर्भर रहने वाले परिवार पशुओं को जंगल ले जाने में चारागाह कतर आने लगे हैं।। जब पशु ही नहीं रहेंगे घी त्यौहार विलुप्त के कगार पर पहुंच जाएगा।।


Spread the love