

भारतीय कालगणना के अनुसार यह दिन नववर्ष का प्रथम प्रहर है जिसे विक्रम संवत के रूप में मनाया जाता है. सम्राट विक्रमादित्य ने इसी दिन शकों को परास्त कर विजय पताका फहराई थी और इसी स्मृति में विक्रम संवत की नींव पड़ी. यह केवल राजनीतिक विजय नहीं थी बल्कि भारतीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक था.

अवतार सिंह बिष्ट | हिंदुस्तान ग्लोबल टाइम्स, रुद्रपुर ( अध्यक्ष:उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलनकारी परिषद उत्तराखंड)
आज जब हम संवत 2083 में प्रवेश कर रहे हैं, तब यह अवसर हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और उस गौरवशाली परंपरा को नमन करने का निमंत्रण देता है जिसने सहस्राब्दियों से इस राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोए रखा है. रामायण के अनुसार इसी दिन त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ था.
महर्षि वाल्मीकि ने इसी दिन रामायण लिखने का संकल्प लिया था. इस तिथि पर शक्ति की उपासना का विशेष विधान है और चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ भी इसी पुण्य दिवस से होता है. मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना इन नौ दिनों में की जाती है जो शक्ति, साधना और संयम का सम्मिलित उत्सव है. गुड़ी पड़वा, उगादि, नवरेह और चेट्टी चंड जैसे विभिन्न नामों से यह पर्व देश के कोने-कोने में मनाया जाता है.
शालाओं में हिंदी पंचांग पढ़ाया जाने लगा है, सरकारी दस्तावेजों में शक संवत का उल्लेख होता है और युवा पीढ़ी अपनी परंपराओं के प्रति गर्व का अनुभव करने लगी है. यह नवचेतना का उदय शुभ संकेत है. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा इस पुनर्जागरण का उपयुक्त अवसर है. जब हम पंचांग देखकर शुभ मुहूर्त निकालते हैं, घर में गुढ़ी सजाते हैं, नीम की पत्तियां खाते हैं और मां शक्ति की उपासना करते हैं,
तब हम वास्तव में अपनी सभ्यता की उस अखंड धारा से जुड़ते हैं जो युगों से प्रवाहमान है. यह परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, यह जीवनदर्शन है. हमारे पूर्वजों ने इस भूमि पर केवल राज्य नहीं बनाए, उन्होंने एक समृद्ध जीवनदृष्टि विकसित की. उस दृष्टि में समाज, परिवार, प्रकृति और परमात्मा के बीच का संतुलन था.
आज जब पर्यावरण संकट, सामाजिक विघटन और मानसिक अवसाद जैसी चुनौतियां विश्व को घेर रही हैं, तब भारतीय जीवनदर्शन की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है. वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष और सर्वे भवन्तु सुखिनः का संकल्प आज के टूटते विश्व को जोड़ने की सामर्थ्य रखता है.




